by Major Krapal Verma | Oct 15, 2025 | स्वामी अनेकानंद
राम लाल की मंजिल की दूसरी सीढ़ी का नाम था – आनंद बाबू। आदमी की चाहत ईश्वर पूरी करता है – अचानक राम लाल को एहसास हुआ था। उसे बिन मांगे बर्फी मिली, उसे बर्फी से दो बेटे और एक बेटी मिली। तीनों तंदुरुस्त, गोरे चिट्टे और साफ सुघड़ और अब आकर ईश्वर ने ही उसे आनंद...
by Major Krapal Verma | Oct 14, 2025 | स्वामी अनेकानंद
देर रात गए तक आनंद अंग्रेजी में आते समाचार ही सुनता रहा था। कहीं कुछ समझ आता तो कहीं सब छूट जाता। कहीं सर, तो कहीं पैर। पकड़ में जो आता नहीं – सफाचट्ट चला जाता। पर नीलू के कहे अनुसार आनंद लगातार उस वक्त के आते कंठ स्वरों को पकड़ने का प्रयास करता और एक फिनक में...
by Major Krapal Verma | Oct 12, 2025 | स्वामी अनेकानंद
जैसे कोई अहंकार आनंद की जुबान पर आ बैठा था – उसे अंग्रेजी बोलते ही महसूस हुआ था। जुबान मरोड़ कर और मुंह एंठ कर अंग्रेजी के शब्दों को चबा-चबा कर बोलना एक अलग ही कला थी। अचानक उसे पूरा देश दो भागों में बंटा नजर आया था। जो अंग्रेजी बोलते थे वो संभ्रांत लोग थे, सफल...
by Major Krapal Verma | Oct 11, 2025 | स्वामी अनेकानंद
“पर मेरी समझ में तो कमाई करने की बात अभी तक नहीं आई है।” आनंद कहना चाहता था। और वह पूछना भी चाहता था कि वह कब और कैसे कमाएगा? आनंद को पता था – पता ही नहीं एहसास था कि मां को पांच सौ रुपये राम लाल ने जो भिजवाए थे – वो उसके ऊपर कर्ज थे। और अभी तक...
by Major Krapal Verma | Oct 10, 2025 | स्वामी अनेकानंद
अंग्रेजी अखबार से सर मारना था या कि दीवारों में सर दे-दे कर मारना था – आनंद के लिए बराबर ही था। छोटा-छोटा तो जब पढ़ता वह तब मोटा-मोटा पढ़ा जाता। फिर भी वह हर कोशिश कर रहा था। कुछ अक्षर उसने जबरदस्ती उखाड़ लिए थे और उन्हें जोर-जोर से बोल कर देख रहा था। उसे कहीं...