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समूचा मेरा भारत -आहत था !!

shiva

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश:-

मरणासन्न व्यक्ति भी एक सुंदर स्त्री पाने की लालसा से मुक्त नहीं होता …? हाँ..! म्रत्यु के बाद क्या है – मैं नहीं जानता …? पर जब तक हम सास लेते हैं …ये ..’सुंदर स्त्री’ का स्वप्न …हमारे साथ-साथ चलता है ……

“इश्वर की बिना कृपा के …कोई संयोग भी नहीं बनता ,नरेन्द्र ?” क्रिस्टी मुझे बता रही थी .

“तुम मेरे दूसरे बेटे हो !” अम्मां कह रही हैं . “रकीब में और तुम में मैं कोई भेद नहीं कर पाती …?” उन का कहना है .

और मेरे ये संस्कार …मुझ से भी दो कदम आगे चलते हैं …..!!

“देख रहे हो,आसमान को …?” रकीब मुझे इशारे से पास बुला , पूछ रहा था . “गुलाबी-गुलाबी हो गया है ?” वह बता रहा था . “”इस का मतलब जानते हो ….?” उस ने मुझे पूछा था .

“नहीं,तो …..?” मैंने बुद्धू की तरह तौला-सा सर हिला दिया था .

“अब खुलेगा,मौसम !” रकीब ने बताया था . “हवा को नहीं महसूसा …? वो तीखा पन जाता रहा है . सुहाने लगी है ….?”

“तो ….?”

“तो-क्या …? चलते हैं ….!” उस ने घोषणा की थी . “यही मौका है, दोस्त !” वह प्रसन्न था . “फिर तो ….काम ….”

“मैं समझा नहीं,रकीब ….?”

“यही कि …ये महीना ठल्वार का समझो ! और अब मौसम भी मस्त है …? चलते हैं ….?” उस ने सुझाव रखा था . “तुम्हें सब दिखलाता हूँ .” उस ने वायदा किया था .

मैं प्रसन्न हो गया था . कब से चाह रहा था कि चलूँ …शिव के पास …दर्शन करू…आशीर्वाद लूं ….और आज रकीब ने स्वयं ही प्रताव रख दिया था …? और मैं यह जांन कर कि घर पर भी हमारे जाने की तैयारियां मुकम्मल थीं -हैरान था …? रास्ते के लिए अम्मी ने लड्डू तक बना दिए थे ….?

“सोमवार को निकलेंगे ….?” रकीब ने कहा था .

“लो ….!!” अब अब्बा ने मुझे नोटों की गड्डी पकडाई थी .

“क्यों …? इत्ते पैसे मैं क्यों लूँगा ….?” मैंने प्रतिकार किया था .

“इसलिए कि …ये तुम्हारे …बनते हैं, नरिंदर ….?” अब्बा ने प्रसन्न हो कर कहा था . “तुम्हारे आने के बाद ….इतनी कमाई हुई है …कि …?” वो रुके थे . उन्होंने मुझे अपांग देखा था . “कोई किस्मत वाले हो ….? तुम्हारे सितारे बुलंद हैं …!! तुम ……”

“बहू के लिए कुछ लेते जाना ,बेटे ….?” अम्मा ने आदेश दिए थे .

अचानक ही मेरी आँखों के सामने जसोदा का चहरा आ कर ठहर गया था …..!!

मेरा इंतज़ार करती -जसोदा एक पतिब्रता नारी थी ….मुझे आज महसूस हुआ था ! और फिर मैंने अम्मीं की आँखों में भी पढ़ा था – कि हिन्दू नारियां अपने सतीत्व की साधना के लिए …जगत-प्रसिद्ध थीं …? ये सती नारियां …धर्मपरायण स्त्रियाँ …और पतिब्रताएं …हमारी भारतीय संस्कृति की धरोहर थीं -ये तो ज़माना जानता था …?

“मुझे क्या देते हो ….?” निक्की कूद कर बीच में आ खड़ी हुई थी .

“ये लो ….! सब तुम्हारा …!!” मैंने सारे नोट निक्की की हथेली पर धर दिए थे .

“नहीं,ये नहीं ….?” नांट गई थी,निक्की . “वायदा करो कि …मुझे …सलीमा ….?”

“वा-य-दा रहा ….!” मैंने निक्की की हथेली पर हथेली दे मारी थी . “अगर मैं कुछ बना ….निक्का …तो ….”

“बड़े तो ….तुम …बनोगे,भैया ….!” सहज में कहा था ,निक्की ने और फिर रो पड़ी थी . “तुम ….जा रहे …हो …? सहा …न जाएगा …..????'” वह कहती रही थी .

अम्मीं और अब्बा की आँखें भी गीली हो आईं थीं . मैं तो रो ही पड़ा था …? आज मैंने महसूस था कि …हमीं नहीं …मेरे जाने के शोक में शायद …भेड़-बकरियां ज़रूर रोएंगी …और वो पाजी …कुत्ते ….मुझे कभी न भूल पाएंगे ….? सच में मेरी आत्मा …यहाँ आ कर …इन में …रम गई थी ! शायद मुझे ऐसा पवित्र प्रेम पहली बार मिला था ….?

और अब मैं चल पड़ा था …..

“जम्मू के लिए …तुम्हें बस में बिठा कर …लौटेगा,रकीब …!” अम्मीं ने कहा था .

हम ने चढ़ाई के बजाए ..उतराई आरंभ की थी तो मैं रूठ गया था !

“अरे यार ! इस फूल घाटी से ..हमें ..उधर मूल घाटी में जाना होगा …? रास्ता पहले उतरेगा ….और फिर चढ़ेगा …?” रकीब मुझे समझा रहा था . “वहां से मुग़ल लकीर ले कर …हम हिबारे की ओर निकल जाएंगे ! यहाँ तुम अपने शिव के पास पहुँच जाओगे …?”

“लेकिन …..?”

“और कोई रास्ता नहीं है !” रकीब ने हाथ झाडे थे . “पहाड़ पर सीधे-सीधे तो पागल ही चढते हैं ?” वह हंसा था . “जैसे की तुम चढ़े थे ….?” उस ने मुझे मेरी की मूर्खता समझाई थी .”दिन-देर तो लगेगी ….! नरेन्द्र ! आहिस्ता -आहिस्ता … चढ़ेंगे ….चलेंगे ….तो ही …हिबारे पहुँच पाएंगे …?” उस का कहना था .

और जब पहाड़ का परता बदला था …तो हम अचानक ही एक सुरम्य घटी में उतर आए थे !

“इसे नूरी- छम्ब कहते हैं !”रकीब ने बताया था . “वो देखो ! चश्मा -शाही ! इधर से ही स्वरण गंगा निकलती है ! इस चश्मे पर नूर जहाँ नहाने आती थी …?” रकीब ने मुझे बताया था .

“पागल बना रहा है,ब्बे ….?”

“नहीं,यार ! ये सच है …? तू चल कर देखना …पूछना लोगों से …और परखना खुद कि ….नूर जहाँ …..?” उस ने मेरी आँखों में घूरा था . “लगता नहीं …? कितनी खूबसूरत वादी है ….? और देख तो ….उधर …..”

वास्तव में बड़ी ही मनोरम घाटी थी …! तरह-तरह के सुगन्धित फूल …पौधे उगे थे …! हवा में एक भीनी खुशबू भरी थी . चारों ओर घिरे पहाड़ों की गोद में बैठा वो झरना …और उस से बहती स्वरण गंगा …बड़े ही अलौकिक लग रहे थे ….!

“नूर जहाँ को लोग …छुप-छुप कर देखा करते थे ….? कहते हैं,नरेन्द्र कि ….वो इतनी …खूबसूरत थी ….”

“चित्रा …?” मेरी आँखों के सामने द्रश्य लौटा था . “क्रिस्टी ….?” मैंने फिर से नूर जहाँ की तुलना करनी चाही थी .

फिर रकीब ने मुझे संक्षेप में ..मुग़ल इतिहास के मुख्य मुद्दे समझाए थे !

“तुम मानते हो,इस्लाम को ….?” मैंने यूँ ही प्रश्न पूछा था -रकीब से .

“काहेका ,इस्लाम ….? हमें क्या गरज है किसी इस्लाम की ….?” हँसते हुए कहा था , रकीब ने . “हम तो …..हम हैं,नरेन्द्र ! हमें क्या चाहिए,भाई …?” उस का प्रश्न था . “ये सब चौंचले हैं -फुरसत के …..! और हमें फुरसत कहाँ है ….?” उस ने बात ही समाप्त कर दी थी .

तीन दिन की लगातार चढ़ाई के बाद हम हिबारे पहुंचे थे !

“यहाँ …आ कर गले थे – …अर्जुन …भीम …नकुल …सहदेव …युधिष्ठिर …और द्रौपदी ….!” रकीब ने बताया था . “कहते हैं – युधिष्ठिर का तो ..अंगूठा ही गला था ….? वह तो सीधा स्वर्ग गया था …! धर्मराज था ,,,न…?” विहंस कर बोला था , रकीब .

“और मेरे शिव …..?” मैंने पूछा था .

“यहीं रहते हैं ! पता कर लो ….?” रकीब हंस रहा था .

मैं सच में ही उस स्वर्ग में था जहाँ कण-कण में भगवान् बसते हैं ….!!

इस हिमागार की अलग ही भव्यता थी …? झील का एक अलग काम था …? लेकिन मैंने महसूसा था कि … मुग़लों ने आ कर भारत के कौने-कौने में पहुँच …अपने सिक्के जमा दिए थे ….? जम्मू जाती बस में बैठा-बैठा मैं …गिनता रहा था कि …भारत-भूमि पर घावों की तरह उगे …ईसाईयों और मुसलमानों के …किए जुल्म …आज भी ताज़ा थे …? न मरे थे …न भरे थे ….और समूचा मेरा भारत …आहत था …किसी कर्ज में दबा था …और कहीं से भी आज़ाद न था ….?

पर लोगों ने आज़ादी ले ली थी …लड़ कर ली थी ….और अब लोग ही …इन घावों को भी भरेंगे …मुझे अब भरोसा होने लगा था ……!!!!

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए -मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!