“दो दिन से दिखे नहीं पंडित जी?” कालू पंडित कमल किशोर से सामना होते ही पूछ बैठा था। “राम चरन कह रहा था कि ..” उसने पंडित कमल किशोर के गुलाब से खिले चेहरे को पढ़ा था।

“हां भाई!” पंडित कमल किशोर ने स्वीकारा था। “दो दिन से सुमेद के एडमीशन को लेकर उलझे रहे!” पंडित जी ने बताया था। “राजेश्वरी की जिद थी कि सुमेद का एडमीशन मैरी एंड जॉन्स कॉन्वेंट स्कूल में हो जाए!” पंडित जी ने वजह बताई थी।

“क्यों?” कालू जिज्ञासा वश पूछ बैठा था।

“इसलिए भाई कि .. कि सुमेद अगर अंग्रेजी सीख जाएगा तो कहीं ठौर ठिकाने बैठेगा। तुम भी जानते हो कि बिना इंग्लिश के ..” पंडित कमल किशोर ने बहुत दूर देखा था। “पंडिताई में क्या धरा है कालू!” पंडित जी उदास हो आए थे। “कुंवर साहब की कृपा है। गुजारा चल रहा है। वरना तो ..”

“हो गया एडमीशन?” कालू ने बीच में ही पूछ लिया था।

“हो तो गया भाई!” पंडित जी ने लंबी उसांस छोड़ी थी। “लेकिन अगर कुंवर साहब न होते तो फिर तो असंभव ही था।”

“क्यों?”

“इसलिए कालू भाई कि ये लोग बच्चे के पेरेंट्स का भी इंटरव्यू लेते हैं। कहते हैं कि पेरेंट्स बच्चे के होम वर्क में मदद कर सकते हैं कि नहीं!” मुड़ कर पंडित कमल किशोर ने कालू की जिज्ञासु आंखों को पढ़ा था। “अब राजेश्वरी ने प्रथमा किया है और हमने संस्कृत में आचार्य, क्या मदद कर सकते हैं सुमेद की?” पंडित जी ने अपनी विवशता बताई थी। “अगर कुंवर साहब फोन न करते तो हैडली हरगिज न मानता!” उन्होंने कालू को सूचना दी थी। “उसूलों के पक्के हैं – ये अंग्रेज, कालू!”

“लेकिन कुंवर साहब?” कालू कहीं और जा उलझा था।

“अरे भाई! सीधा समीकरण है। मैरी एंड जॉन्स कुंवर साहब की जायदाद में ही तो खुला है। बड़े सस्ते किराए पर इन लोगों ने बिल्डिंग हथिया ली है। पुराना पैलेस है। और अब मोटा कमा रहे हैं।”

“दिमागदार लोग हैं!” कालू ने सर हिलाया था। “लेकिन पंडित जी ..”

“अरे भाई! मैं जानता हूँ कि तुम पूछोगे – पैसे, फीस और खर्चा? कुंवर साहब ने ही मेहरबानी कर दी है। वरना हमारे बस की बात कहां थी कालू!” पंडित जी प्रसन्न थे।

लेकिन कालू एक गहरी चिंता में जा डूबा था।

अरुण वरुण – उसके दोनों बेटे किसी ऐरे गैरे स्कूल में जा रहे थे। क्या पढ़ते थे – न उसे पता था न श्यामल को। वो दोनों भी तो अनपढ़ थे। लेकिन अगर अरुण वरुण को मैरी एंड जॉन्स में दाखिल करा दिया जाए तो?

“तुम्हारे लिए कुंवर साहब क्यों फोन करने लगे?” कालू ने स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा लिया था। “कोई और ही तरकीब सोचनी होगी।” कालू ने समस्या को सुलझाने का निर्णय कर लिया था।

अचानक ही कालू की आंखों के सामने एक अनूठा साम्राज्य उठ खड़ा हुआ था।

अंग्रेजी पढ़ने के बाद अरुण वरुण दोनों साहब बन गए थे। मोटी पगार घर आ रही थीं। श्यामल ने नया घर बार बसा लिया था। नौकर चाकर भी उसे डोलते नजर आ रहे थे। उसे दिखने लगा था – अरुण वरुण का रुतबा रुबाब .. अदल और अहंकार!

“रेहड़ी खींचने से निजात मिल गई कालू?” पंडित कमल किशोर हंस कर पूछ रहे थे।

“राम चरन की कृपा है ..!” कालू कहना चाहता था पर रुक गया था।

कालू जानता था कि राम चरन हर मर्ज की दवा न था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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