कुंवर खम्मन सिंह ढोलू चिंता में डूबे हुए थे।
ढोलू शिव का वार्षिक मेला भरना था। दुनिया जहान से ढोलू शिव के उपासकों को आना था। ढोलू शिव का नाम था, उनका यश था और उनकी कृपा पाकर न जाने कितने लोग फल फूल रहे थे। श्रद्धालु ढोलू शिव के इस मेले के मौके पर दिल्ली आते थे और सप्ताहों तक रह जाते थे। आस पास का कुतुब मीनार का कॉम्पलेक्स सैलानियों के लिए एक आकर्षण था। जिज्ञासुओं के अलावा यहां इतिहासकार और पुरातत्व वेत्ता बड़ी संख्या में आते थे। बहुत रौनक रहती थी।
जितना बड़ा मेला लगता था उतनी बड़ी आमदनी न होती थी।
हर साल कुंवर खम्मन सिंह ढोलू खजाने से ही पैसा खर्च करते थे। वह मान कर चलते थे कि उन पर और ढोलू सराय पर ढोलू शिव की कृपा दृष्टि बनी हुई थी। कुंवर साहब की अच्छी आमदनी थी। ढोलू सराय में लोग दौड़-दौड़ कर किराए पर रहने चले आते थे। कुंवर साहब बड़ा ही सोच समझ कर किराया वसूलते थे और किराएदारों की हर तरह से मदद करते थे। कुछ प्लॉट बिक जाते थे तो सुनहरी झील में बनते कॉम्पलेक्स से उनकी करोड़ों की आमदनी थी।
ये सब ढोलू शिव की कृपा से ही संभव था – कुंवर साहब मानते थे।
कुंवर साहब ने ऊंची पहाड़ी पर बने अपने राज महल से आंख उठा कर पूरे ढोलू परिसर को देखा था।
खंडहर थे – भांति-भांति के खंडहर। उनके नाम थे। उनकी पहचान थी। उनकी गिनती थी। वे सरकारी संपत्ति थे। और वो सैलानियों के लिए प्रेरणा का प्रतीक थे, चर्चा का विषय थे और एक जीवंत इतिहास की कहानी थे – जो कभी-कभी उनसे आकर भी उलझ जाती थी।
“कितना पुराना है ढोलू शिव का प्राचीन मंदिर?” प्रश्न आता तो कुंवर साहब नर्वस हो जाते। “पता नहीं!” वह कहते। “पिताजी कहते थे कि ये मंदिर इन सब खंडहरों से पुराना है। ढोलू वंश वालों ने इसे नहीं बनवाया। उन्हें तो ये बना बनाया मिला था। और तब भी ये प्राचीन ही था।”
“मुगल कब आए?” आम प्रश्न था। “क्या उन्होंने ..?”
“अलग-अलग राय है – इतिहासकारों की!” कुंवर साहब का सीधा उत्तर था। “कौन कब आया, किसने किला लूटा, कितने-कितने नरसंहार किए – केवल कयास है। तुक्के मारते हैं, विद्वान जन पर पता किसी को कुछ नहीं है।” कुंवर साहब तनिक हंस जाते।
“आपकी राय ..?” अंत में यही प्रश्न आता।
“वक्त की चाल होती है, हवा होती है। वक्त मेहरबान तो गधा पहलवान!” कुंवर साहब सहज ढंग में कह जाते। “हम कमजोर कभी नहीं थे!” वह बताते। “हमारा इतिहास है। हम – ढोलू कभी कोई युद्ध नहीं हारे। लेकिन .. वक्त .. हवा ..?” वो भावुक हो आते थे। “कलंक है ये – हमारे माथे!” उनका गला भर आता था।
“अब तो ढोलुओं का भी अंत आ जाएगा!” आह रिता कर स्वयं से कहा करते थे, कुंवर साहब। “संतान ही नहीं हुई!” उनकी आवाज सर्द हो आती। “ढोलू शिव भी सहायक न बने!” उनका उलाहना होता।
और अचानक ही उनकी आंखों के सामने सुंदरी आ खड़ी होती थी।
उनकी इकलौती बहन थी – सुंदरी। कॉन्वेंट एजूकेशन और गार्गी कॉलेज की प्रोफेसर थी। विधवा हो गई।
“जो भी हो भाई साहब पर मैं अब शादी नहीं करने की!” सुंदरी के बोल सुन रहे थे कुंवर साहब। “महेन्द्र जैसा पति पुरुष मुझे मिलेगा कहां?” उसकी हर बार यही दलील होती थी।
इतनी बड़ी जायदाद और ढोलू सराय में वो कुल तीन प्राणी रहते थे।
तीनों रहते तो साथ-साथ थे पर हर मौके पर अलग-अलग ही होते थे।
इंद्राणी – उनकी पत्नी ने पूजा पाठ का रास्ता अपना लिया था। उसे दीन दुनिया से अब कुछ लेना देना न था। सुंदरी समाज सेविका थी। सब के दुख दर्द बांटने पहुंचती थी और नारी कल्याण के लिये ट्रस्ट बना लिया था।
कुंवर साहब हर बार स्वतंत्र उम्मीदवार बन कर चुनाव लड़ते थे और आज तक कभी चुनाव हारे न थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड