घर का खाना रेहड़ी को बड़े मनोयोग से आगे धकेलते कालू ने यूं ही के मन से ढोलू शिव के मंदिर पर नजर डाली थी। मंदिर की सीढ़ियों पर कोई दरवेश बैठा दिखा था। कालू ने बड़े ही श्रद्धा भाव से रेहड़ी को रोक उस दरवेश से आशीर्वाद लेने उसके चरण स्पर्श किए थे।
“पाएं लागों महाराज!” कालू ने बड़े ही विनम्र स्वर में कहा था।
लेकिन जैसे ही उस दरवेश ने गर्दन घुमाई थी कालू को उसका चेहरा नजर आ गया था।
“त .. त .. तुम! नहीं-नहीं .. अ .. अ.. आप?” घबराते हुए कालू ने राम चरन से पूछा था।
राम चरन तनिक सा हंसा था। मैं ही हूँ भाई, उसने सहज स्वर में स्वीकार किया था। तुम चलो मैं आता हूँ – राम चरन ने कालू का संताप हरा था। वह उठा था और मंदिर के अंदर चला गया था। कालू कई पलों तक राम चरन को जाते देखता रहा था।
कालू के होश उड़ गए थे। वह समझ ही न पा रहा था कि ये खेल कौन सा चल रहा था? राम चरन तो हर रोज ही उसी के कुर्ते पाजामे पहन कर झूठे बर्तन धोता था और जी तोड़ कर काम करता था। लेकिन ये कौन था .. जो ..
भगवा परिधान में किसी फिल्म ऐक्टर जैसा सजावजा राम चरन आज कालू को एक अजूबा लगा था। वह आदमी जो कोई दरवेश लग रहा था रोज उसकी रेहड़ी पर झूठे बर्तन साफ करता था। लेकिन क्यों?
और जब राम चरन उसी के कुर्ते पाजामे पहने काम पर लौटा था तो कालू सकते में आ गया था।
“मैं .. मैं .. शर्मिंदा हूँ – महाराज!” कालू गिड़गिड़ाया था। वह राम चरन के पैर छूने को झुका था। लेकिन राम चरन पीछे हट गया था।
“ग्राहक पहुंच रहे हैं!” राम चरन ने कालू को सूचना दी थी। “काम आरंभ करते हैं।” उसने कालू का ध्यान बांटा था। “कपड़े बदलने से आदमी नहीं बदलता भाई! किस्मत कराती है सब काम!” उसने सीधा कालू की आंखों में घूरा था। “मंदिर बिन आश्रय नहीं और कालू बिन भोजन नहीं!” वह तनिक मुसकुराया था। “मेरी तो तुम दोनों ही गंगा जमुना हो!” उसने कालू का संदेह निवारण किया था।
“नहीं-नहीं!” कालू उसकी बात मानने को तैयार न था।
“क्यों नहीं?” राम चरन ने दमदार आवाज में पूछा था। “पंडित जी खाना नहीं देंगे और तुम आश्रय नहीं दे सकते!” मुसकुरा रहा था राम चरन।
“घर में जगह नहीं है।” कालू बोल पड़ा था। “पहले से ही हम चार प्राणी हैं। बस, किसी तरह से गुजर बसर होती है!”
“मुझे सब कुछ पता है कालू!” राम चरन ने उसके कंधे पर हाथ रख आत्मीयता जताई थी। “मैं तो तुम्हारा आभारी हूँ ..” राम चरन कहता रहा था।
“चलो! मैं कुछ करता हूँ!” कालू ने एक इरादा पक्का कर लिया था। “ये सब तुम्हारे कारण हुआ है – राम चरन!” कालू ने स्वीकारा था। “तुम्हारे आने से पहले तो ..” कालू की आंखों में बेबसी झांकने लगी थी।
“लेकिन तुम जैसे लोग भी कम हैं कालू!” राम चरन कहने लगा था। “मैंने तो नंगी भूखी इन आंखों से जगत को देखा है, कालू भाई! बहुत ही बेरहम लोग हैं!” राम चरन की आवाज में एक गहरी टीस उग आई थी। “जहां भी गया, जिससे भी मांगा – जूता ही पड़ा! यहां कोई किसी का नहीं है – कालू!”
शाम का खाना राम चरन के साथ बैठ कर खाने में आज कालू को एक अजब सा आनंद आया था! राम चरन भगवान का भेजा ही कोई दूत था – जो उसे कभी भी छोड़ कर जाने वाला नहीं था।
“तेरा भी संसार बसेगा कालू!” ढोलू शिव को प्रणाम किया था कालू ने तो उसे आवाज सुनाई दी थी।
कालू के सपनों को फिर से पंख लग गए थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड