रमा आई थी तो राजेश्वरी का तन मन खिल उठा था।
दोनों कॉलेज की सहेलियां थीं। रमा ने अब अपना काम जमा लिया था। उसके अब ठाठ-बाट थे। आमदनी का ठिकाना न था। पहले तो लगा था कि रमा डूब गई। शादी के बाद राजा – उसका पति भी तो उसे छोड़ कर बंबई भाग गया था। लेकिन रमा ने अपना ही फैशन डिजाइनर का काम शुरू कर दिया था।
“दर्जी का काम है?” राजेश्वरी को याद है जब उसने रमा को छोटा करना चाहा था। “कहते हैं – फैशन डिजाइनर ..” राजेश्वरी मुसकुराई थी।
“मेरे पास और कोई चारा नहीं बचा है राजे!” रमा का उत्तर था। “मरूं या बचूं अब तो मैं यहां से हिलूंगी ही नहीं!” रमा ने अपना इरादा बताया था।
और वही पक्का इरादा था रमा का जिसने उसकी नइया पार लगा दी थी।
“क्रेजी डॉल हिट हो गई .. राजे!” एक दिन रमा का फोन आया था। “ऑडर्स एंड ऑडर्स!” रमा चहकी थी। “बेबी फ्रॉक है। मलेशिया की एक अकेली फर्म ने ..” रमा कहती रही थी लेकिन राजेश्वरी का सुनना बंद हो गया था।
एक गंदे संदे कमरे में पड़ी रमा का यों भग्योदय होगा – राजेश्वरी ने तो कभी सोचा ही नहीं था। उसका पति राजा भी अब लौट आया था। और अब तो आमदनी – जायदाद के ठौर ठिकाने न थे।
“किस लिए याद किया?” रमा ने मुसकुराते हुए राजेश्वरी से पूछा था।
राजेश्वरी तनिक सी घबरा गई थी। वह राम चरन के बारे कुछ बताना तो न चाहती थी लेकिन मजबूरी थी कि उसे बताना पड़ रहा था।
“वो .. वो .. एक कोई राम चरन है!” राजेश्वरी ने बयान किया था। “मंदिर में आ गया है।” वह संक्षेप में बोली थी। “क्या है रमा कि उसके आने से वो तुम्हारे वाला ही करिश्मा – क्रेजी डॉल ..”
“इस में मेरा क्या रोल है?” रमा ने बीच में पूछ लिया था।
“कपड़े!” राजेश्वरी संभल कर बोली थी। “कुछ इस तरह के कपड़े डिजाइन कर दे कि .. बस राम चरन ..” राजेश्वरी ने रमा की आंखों में सीधा देखा था। “देखा तो मैंने भी नहीं है उसे। आ रहा है – शाम को!”
“आने दे!” रमा सहज थी। “मेरे पास तो करिश्मों की कुंजी है – अब! सुना तूने – मैंने ही तो इस मधुलिका के कपड़े डिजाइन किए हैं। ये प्रेमी फिल्म की हीरोइन ..”
“अच्छा ..?” राजेश्वरी उछल पड़ी थी। “फिर तो मुझे उम्मीद है कि राम चरन भी हिट होगा!” राजेश्वरी ने रमा को बाँहों में भर लिया था। “बस एक बार मंदिर चल जाए, रमा! फिर तो ..”
“क्यों नहीं चलेगा यार?” रमा चहकी थी। “आज कल तो ऐरे गेरे नत्थू खैरे भी माल कमा रहे हैं। तुम्हारा तो ढोलू शिव का मंदिर – प्राचीन मंदिर है।”
बातों में न जाने कब वक्त गुजरा! राजेश्वरी को लगा कि घर के बाहर रिक्शा आ कर रुका है। समय देखने पर आश्चर्य हुआ उसे। पंडित जी आन पहुंचे थे। लेकिन राम चरन ..? एक बार मन आया कि बाहर भागे और राम चरन का स्वागत करे। लेकिन रमा को साथ खड़ा देख वह ठिठक गई। फिर सोचा – उसे राम चरन का इंतजार करना चाहिए।
लेकिन पंडित जी आजू बाजू माल असबाब से लदे फदे अकेले ही अंदर चले आए थे।
राजेश्वरी का हलक सूख गया था। कहां था राम चरन – वह सोच ही न पा रही थी। उसने रमा को देखा था और आंखें फेर ली थीं। फिर हिम्मत बटोर कर उसने पंडित जी से ही प्रश्न किया था।
“राम चरन ..?”
“नहीं आया!” पंडित जी ने सपाट स्वर में कहा था।
“कोई बात नहीं राजे!” रमा बोल पड़ी थी। “मैं अपना मास्टर भेज कर माप मंगवा लूंगी!” उसने उपाय बताया था। “मैं चलती हूँ।” उसने क्षमा मांगी थी। “प्रणाम पंडित जी!” कहते हुए वह घर से बाहर निकल गई थी।
राजेश्वरी के भीतर भरा ज्वालामुखी अब फूट पड़ना चाहता था।
“हर मौके पर ये आदमी हारा है।” राजेश्वरी ने पंडित कमल किशोर को कोसा था। “आज तक इसने कोई काम सीधा नहीं किया!” वह भीतर से भर आई थी। “क्या सोचेगी रमा ..”
“लो!” पंडित कमल किशोर ने एक बेहद मोटी नोटों की गड्डी राजेश्वरी को थमा दी थी।
आहिस्ता-आहिस्ता राजेश्वरी के मन प्राण में अब उठा ज्वार भाटा शांत होता चला गया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड