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मुझे तो विदेश भी देश निकाला दे बैठा था ?

lutyens delhi

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश :-

चुनाव के परिणाम आए थे तो बी जे पी ने ११५ सीटें जीतीं थीं ! कांग्रेस को कुल ६१ सीटें मिलीं थीं . लेकिन कांग्रेस का कहना था कि बी जे पी की हार हुई है …? मोदी को दो सीटें कम मिली हैं ….जब कि कांग्रेस ने बढ़त हासिल की है ! चिदंबरम बोले थे – हार गई, बी जे पी …? कांग्रेस मुक्त -गुजरात का नारा दे कर अब अपनी जांन बचा रही है ….! अब क्या मूं दिखाओगे , मोदी जी …..?

“सरकार तो बी जे पी ही बनाएगी -गुजरात में …?” अमित शाह का उत्तर था . “अगर ९३ सीटें भी आतीं … तब भी बी जे पी की ही सरकार बनती …?” वो कांग्रेस पर हंस रहे थे .

कांग्रेस की टीम …एक बार फिर गुजरात में शिकश्त खा कर …लौट गई थी ….!!

और न जाने क्यों और कैसे ……कांग्रेस पार्टी का रंग बदली होने लगा था …?

लाल से पीले होते इस रंग को हर बुद्धिजीवी,पत्रकार ,समाजसेवी …और मीडिया ने भी देख लिया था . एक और स्कैम हवा में सन्नाने लगा था ! ‘टू -जी’ के बाद अब ‘कोल-गेट’ …का शोर सुन लोग हैरान थे . ‘एक दशमलव छिअत्तर लाख करोड़ ….!’ के बाद फिर ‘एक दशमलव छिआसी लाख करोड’ का घुटाला …?” लोग अब पूछ रहे थे …कि ‘देश में ये कैसी लूट चल रही है?’ आम भ्रांतियां जनता में फैलने लगीं थीं !

दिल्ली अफवाहों की आग में दहकने लगी थी ….?

“हो क्या रहा है ….?”हाई कमान ने चौंक कर पूछा था . “हमने तो गुनहगारों को जेल भेजा है ….?” उन का एक एलान था . “लिखें आप …! बताएं लोगों को कि …क़ानून अपना काम कर रहा है …?” उन के आदेश थे .

“अमित है !” शिकायत सामने थी …और साथ में गुनहगार का नाम भी था . “पानी में आग …ये लगा रहा है ….?” स्पष्ट कहा था -अनुचरों ने . “हमने तो पहले ही कहा था कि …इसे जेल से रिहा ही न किया जाए …? लेकिन …..”

“हमने मनमोहन जी को बता दिया है …! विकल्प जल्दी ही सामने आएगा ….?” उन का कहना था .

लेकिन दिल्ली जैसे हर रोज सुबह उठ कर ….एक नए घोटाले को ईजाद कर देती थी -ऐसा लगने लगा था ….? लगाने लगा था कि देश – खाली हो जाएगा ….लुट कर रहेगा ….और चोर यहाँ से …दिल्ली छोड़ कर जाते रहेंगे ….?

और मैं भी तो दिल्ली ही जाने की सोच रहा था …? मैं भी तो निश्चय कर बैठा था कि अब …दिल्ली ही जाना है ? मैंने तो लोगों को सूचना भी दे दी थी …उन से आशीर्वाद भी ले लिया था …और अब मैं और अमित …दिल्ली पहुँचने के लिए …उतावले थे …कटिबद्ध थे …!!

“बंगाल को लूट कर ….दिल्ली भाग गए थे – अंग्रेज !? मैं अचानक ही दादा जी की आवाजें सुनने लगा था . “दिल्ली को अपने ढंग से बसाया …अपने लिए बसाया …और देश के राजे-महाराजों को भी …दिल्ली बुला कर अपने पास ही बसाया …?

“ये बस ..जम्मू तक ले जाएगी,नरेन्द्र !” रकीब मुझे बता रहा था . “वहां से दिल्ली के लिए दूसरी बस ले लेना ….फिर तो घर पहुँच ही जाओगे …?” वह हंसा था . “भूल मत जाना ,भाई …?” उस का भोला आग्रह था . “तुम ….से….” काँप गया था ,रकीब का स्वर . रो पड़ा था -वह ! “तुम से …पता नहीं क्यों ….?”

“मैं भी कहाँ भूल पाऊंगा,तुम्हें …रकीब …?” भावुक था ,मैं ! “अब्बा …और मम्मी को मेरा …चरण -स्पर्श कहना ….और उस निक्का को मेरा प्यार कहना ….?” कह कर मैंने रकीब को विदा किया था .

और फिर यही दिल्ली मेरे दिल में आ बसी थी …! पहली बार मैंने दिल्ली को देखना था …? मेरी कल्पना में अब कलकत्ता था …लेकिन दिल्ली न थी ? मैं अंग्रेजों की बसाई …और मुग़लों की लूटी ….दिल्ली को देखने के लिए बे-ताब था ! पूरे रास्ते मेरे ज़हन में दिल्ली ही आती रही थी ….बनती रही थी ….बिगडती रही थी …उजडती रही थी …और बसती रही थी ….!!

“कमरा चाहिए ….?” मुझे स्टेशन से बाहर आते ही प्रश्न खड़े मिले थे .

“नहीं …!” मैंने दो टूक उत्तर दिया था .

“कहाँ जाना है ….?” फिर प्रश्न आया था .

“कहीं नहीं …!” मैंने भी विरस उत्तर दिया था .

दिल्ली वालों ने ताड़ लिया था कि मैं उन के वश की बात न था ….?

पर सच में तो मेरा मन था कि मैं दिल्ली को देखूं …? मैं वाद नगर लौटने से पहले दिल्ली को निरख-परख लेना चाहता था . मैं चाहत था कि मैं दिल्ली में छुट्टा …घूमूं-फिरूं …..मैं दिल्ली के चप्पे-चप्पे के पास पहुंचूं …मैं दिल्ली को स-शरीर …छू-छू कर देखूं …उस की कहानी सुनूं …और उस की राय भी लेता चलूँ …..कि मैं कभी दिल्ली लौटूं ….या कि रहने दूं ….?

और मैंने वही किया था ….!!

पैसों से तो मेरी जेबें भरीं थीं ! अब्बा ने मुझे खूब सारे पैसे दे कर भेजा था ! लेकिन इस घन को अब मैं …एक सूझ की तरह खर्चना चाहता था . मुझे एहसास हो गया था कि …यहाँ से आगे अब मुझे …न तो दादा जी मिलेंगे …न गुरु जी ….और न ही अब अब्बा से मेरी मुलाक़ात होगी …? अब मेरी टक्कर फिर से …बे-रोजगारी से होगी …लड़ाई फिर से गरीबी के साथ छिड़ेगी ….और समाज को तो मैं जानता ही था …?

“नई दिल्ली को पहले देखता हूँ !” मैंने इरादा बनाया था . “देखूं तो ….कि अंग्रेजों ने क्या कुछ बना कर तैयार किया था …? और फिर क्या हुआ था कि उन्हें सब छोड़ कर जाना पड़ा था …?” मैं कहीं अंग्रेजों की हुई हार पर प्रसन्न था . “मैंने नई दिल्ली जाने के लिए रिक्शा पकड़ लिया था .

“यही है,नई दिल्ली !” रिक्शे वाला बोला था . “आप को जाना कहाँ है …?” वह पूछ रहा था .

“अरे,यार ! ले पैसे …?” मैंने उसे मुक्त किया था . “मैं चला जाऊंगा ….” कहते हुए मैंने अपना रास्ता गहा था .

और सच में मेरी रूह खिल गई थी . वास्तव में ही बे-जोड़ निर्माण किया था – अंग्रेजों ने …? कलकत्ता से एक दम अलग ही संरचना थी . सब हट कर चुना था …बसाया था …? सब एक दूर-द्रष्टि के साथ स्थापित किया था ! सब उन के लिए था …उन के अपने ही लिए था …? हम – माने कि हिन्दुस्तानी तो गुलाम ही रहने थे …उन के गुलाम ….उन के सेवक ….और अपने राजे-महाराजे भी उन की ड्योढ़ी पर खड़े नज़र आए थे ,मुझे !!

ठीक ही बताया था – दादा जी ने ….!!

राष्ट्रपति भवन से ले कर कनाट -प्लेस तक ….चांदनी चौक और लाल किले को शामिल करते हुए ….अंग्रेजों का अपना सपना था …जो साकार हो कर ज़मीन पर उतर आया था …और अब नई दिल्ली का नाम ले संचरित हो उठा था …! वायसराय पर बम मारने की घटना …के बारे – मेरा मन हुआ था कि लोगों से पूछूं …? पर में दिल्ली वालों से डर गया था !

फिर मैंने उन खंडहरों को भी देखा था …जहाँ – तुर्क,मुग़ल ,मंगोल और लोधियों से ले कर ….सूरी और तुगलक तक …विराजमान थे …? सब -के-सब यहीं थे ….कहीं न गए थे …और न मरे थे …न खपे थे ….? एक इंतज़ार में बैठे थे ….फिर से अपने विगत को जिन्दा करने के सपने के साथ …रूहें बन कर जी रहे थे …यहीं – हमारी भारत भूमि पर …?

और तभी मेरे स्मृति-पटल पर …दिल्ली में हुए नर-संहार …लूट-पाट …विध्वंस …तोड -फोड़ ..और धर्म-परिवर्तन …के लिए ढाए – जुल्म ….उग आए थे …? अब मैं अपने देश-वासियों की …चिल्लाहटें …बिलबिलाहटे…सुन रहा था ! मैं उन की पुकारें सुन रहा था और देख रहा था कि …उन्हें बचाने वाला हाथ …कोई न था …कहीं भी न था ….?

सदियों तक ….लुटते ही रहे ….पिटते ही रहे …हम हिन्दू …हम भारतीय …और उजड़ता ही रहा -हमारा देश ….!!

वाद नगर लौटने से पहले मेरा तीसरा -शिव का नेत्र खुल गया था !!!

“बहू के लिए कुछ लेते जाना ….?” अचानक अम्मी की आवाज़ आई थी

न जाने क्यों मेरे होठों पर थिरक कर एक छोटी हंसी का कतरा …कहीं जा गिरा था …? लगा – जसोदा बैन इतनी छोटी नहीं थी ? उस की इच्छाएं मैं जानता था ! और मैं जानता था कि …हमारा सरल मन ….और शरीरिक सौंदर्य …दैवीय और दिव्य था और किसी उपहार …या लाभ-अलाभ का मुखापेक्षी न था …? कुछ नहीं खरीदा था – मैंने ! अब्बा की दी पूँजी को मैं तोडना न चाहता था …?

आज फिर से मैं दिल्ली जा रहा था …? हम ने फिर से देश के खजानों की चाबियां …विदेशियों के हाथ में सौंप दीं थीं ….? फिर से देश का धन विदेश जा रहा था …? बैक लुट रहे थे …व्यवस्था लुट रही थी …हम लुट रहे थे …और असहाय आँखों से हम तमाशा देख रहे थे …मात्र दर्शक बने खड़े थे ….?????

“अंग्रेजों का कल्चर अब आ कर ….मेरी समझ में समां गया था …? मैं सोचने लगा था कि ..जाते-जाते …अंग्रेज जो ठीकरा देश में फिट कर गए थे – वही उन का अभी भी …हित देख रहे थे …? उन्ही के दिए काम कर रहे थे …जो उन्ही के हित में थे …और …उन्ही की गुलामी किए जा रहे थे …ख़ुशी-ख़ुशी …!!

और तभी ….हाँ,हाँ …..तभी …अमेरिका ने तो मेरा …वीजा भी रद्द कर दिया था …? देश तो दूर …मुझे तो …विदेश भी देश-निकाला दे बैठा था …?

और एक मैं था कि …दिल्ली जाने की जिद कर बैठा था ….?

और ….हाँ,हाँ ….वो …अमित भी …..????

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!