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मैं रास्ता बदलना न चाहता था !

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी !

उपन्यास अंश .

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

“न्याय मित्र नियुक्त हुए तो ….शत्रु का पर्दाफाश कर दो !” राजू रामचंद्रन एक आती आवाज़ को ध्यान से सुन रहे थे . “मौका है , सर ! चूक मत जाना ….?”साथ एक चेतावनी भी उन्हें मिली थी . “और हाँ ! मैंने नासिर चिप्पा को बता दिया है कि ….आप का ख्याल रखेगा ….!!” आवाज़ कट गई थी .  

“कौन नासिर चिप्पा ….?” राजू रामचंद्रन ने स्वयं से प्रश्न पूछा था . “अरे, रे …! यह कहीं ….अमेरिका में रहता ….वही चिप्पा है,क्या ….?” उन का दिमाग जागा था . “ये चिप्पा ….तो ….?” वह प्रसन्न हुए थे . पर साथ ही डर भी गए थे !  

राजू रामचंद्रन को सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मित्र नियुक्त किया था ! उन का दायित्व था कि वो ‘नरेन्द्र मोदी’ -चीफ मिनिस्टर गुजरात पर लगे उन तमाम आरोपों की जांच करें – जिन में मुझे सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने का दोषी बताया गया था ! और कहा गया था कि मैंने ही …हिन्दू-मुसलामानों के प्रेमिल मनों में ….नफ़रत की फाड़ पैदा की ….और मैंने ही पुलिस को कहा कर – दंगे ….हत्याएं ….और न जाने क्या-क्या कराया …..?

न्याय मित्र राजू रामचंद्रन पर मुझे भरोसा था ! मैं जानता था कि वो कभी भी गलत रिपोर्ट नहीं लगाएंगे . मैं तो सच का दामन थामे ….समाज के सामने निहत्था खड़ा था ! 

न्याय मित्र की पड़ताल में शामिल होने वाले …एन जी ओज ….पत्रकार …..राज नेता …और समाज सेवकों की कतार कड़ी हो गई थी . सब के पास सबूत थे …कहानियां थीं …और उन के फैसले थे . लेकिन थे सब के सब मेरे बरखिलाफ !! 

क्यों था – ये मेरा घोर विरोध – मैं समझ ही न पा रहा था …?

मैंने तो किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा था …? जो भी किया था …सब के भले के लिए ही तो किया था ….? और ये सब जन मत के सामने था ! मेरा कोई भी मंसूबा बुरा न था ….और …न मैं किसी एक समुदाय के लिए ही लड़ता था …?

“नफ़रत के बीज ही नहीं बोये , सर ! हत्याएं भी कराई हैं !” तीस्ता सीतलबाड कह रहीं थीं . “जो नरसंहार हुआ है ….बेजोड़ है ! जो नर-बलि हुई है ….ह्रदय विदारक है ….! मैं क्या-क्या बताऊँ आप को सर …? कि मिमियाती …गर्भवती औरतों के साथ ……?” सीतलबाड रो रहीं थीं . उन की आँखें आंसूओं से लबालब भरीं थीं . उन में मानवीय पीड़ा का पुट था .  उन के स्वर काँप-काँप उठे थे ! “इस ….हत्यारे मोदी को तो ……” वो हिचकियाँ ले ले कर कह रही थीं . “आप ..इस की किसी चाल का शिकार मत हो जाना , सर ? बड़ा चालाक है ! चीते-सा चालाक !! वार करता है ….तो किसी …..”

“चश्मदीद …गवाह ….?” न्याय मित्र की मांग थी . 

“है ….! संजीव भट्ट स्वयं गवाह हैं ! उन्हीं के अफसर हैं ! वहां मौजूद थे . उन्होंने सब होते देखा है ! और क्या चाहिए ….?” सीतलबाड  ने अंतिम वाक्य कहा था ! 

राजू रामचंद्रन को कहीं दाल में काला नज़र आया था ! 

“कैसे मानूं , भाई कि ….?” राजू रामचंद्रन हिमांशु ठाकुर और लिओ सल्दाना से खोज-बीन कर रहे थे . ये दोनों पत्रकार थे . लोकल पत्रकार अलग से एक दखल रखते हैं . इन्हें सब सही-सही जानकारी होती है . “ये देखिए सर, छपी खबर ! ये कहानियां ….और ये हैं – लोगों के बयान !” वो दोनों अब अपनी दी दलीलों को सही साबित करने में जुटे थे ! “हम झूठ क्यों बोलने लगे ….? हम तो आप की ही तरह न्याय मित्र हैं !”

नरेन्द्र मोदी अचानक ही एक प्रश्न चिन्ह बन कर ….उन के सामने आ खड़ा हुआ था ! फिर भी वह यह सब मानने को तैयार न हुए थे ! 

“मानेंगे ….क्यों नहीं , सर …..?” अब हसन जौहर ने जौहर दिखाए थे . “अमेरिका तक की रिपोर्ट मैं आप के सामने रखता हूँ ! जितने लोग हैं …सब से पूछ लो ! मिलो – कांग्रेस के नेताओं से ! पूछो उन से कि सच क्या है …..? शक क्यों है ….?” उस ने राजू रामचंद्रन को आँखों में घूरा था . “इतने लोग झूठ बोलेंगे , क्या ….?” उस का प्रश्न था . 

“हाँ ! इतने लोग झूठ क्यों बोलेंगे ….?” राजू रामचंद्रन ने भी स्वयं से पूछा था . 

लेकिन झूठ तो बोला ही जा रहा था ! सरासर झूठ बोलना ….और उसे सच का जामा पहनाना – यही हो रहा था ! तीन बार बोलने के बाद ही झूठ सच बन जाता है – पर यहाँ तो झूठ को तीसों बार बोला जा चुका था …..?  

  न्याय मित्र – राजू रामचंद्रन फिर स्वयं संजीव भट्ट से मिले थे . वो जानना चाहते थे कि आखिर सच क्या था ….?

“ये मेरी ईमानदारी ….और वफादारी का इनाम मिला है , मुझे ! सर, मैं …अपने बच्चों की कसम खा कर कहता हूँ …..कि …मैं ….मैं …..” संजीव भट्ट रो पड़ना चाहता था . “आप न्याय करें ! नरेन्द्र मोदी गुनाहगार है !! सब इन के कहने पर हुआ .” वह रुका था . “वरना आप ही सोचें कि ….बिना चीफ मिनिस्टर के इशारे के ….स्टेट में पत्ता भी हिलेगा …?” 

“नहीं हिलेगा …..!” 

“फिर यहाँ तो धरा हिल गई ….! भूचाल आया !! नर संहार हुआ …..!!!” उस ने आँखें फाड़ -फाड़ कर बयान किया था . “मैंने इतना …वीभत्स द्रश्य …अपनी जिन्दगी में पहले कभी नहीं देखा ? सर, हत्याएं ….खून-खराबा ….जघन्य अपराध …..”

“लेकिन भट्ट साब ! आप की नौ साल की चुप्पी ….?” सहसा प्रश्न दागा था , राजू रामचंद्रन ने . 

“मरजाता , मैं !” वह तड़के थे . “आप को जिन्दा इस लिए मिल गया हूँ …..कि ….” उन्होंने रुक कर प्रश्न करते राजू को परखा था . “आप घबराइये मत ! आप के साथ ….पूरा का पूरा तंत्र है ! आप सिर्फ ….अपनी रिपोर्ट में …’मोदी’ को कानून के कठघरे में खड़ा कर दीजिए ! फिर तो …….”

राजू रामचंद्रन होती साजिश को ताड़ गए थे ! वो अबोध न थे . वो भी तो खिलाड़ी ही थे ! सब समझ चुके थे . वो जान चुके थे कि ….संजीव भट्ट के साथ ….मिल कर कोई एक गम खेला जा रहा था ….जिस का उद्देश्य …’मोदी’ को ही मिटाना था !! 

“चूकना मत, सर !” आवाज़ चिप्पा की थी . राजू रामाचंद्रन गहरे सोच में पड गए थे . उन्हें आभास हुआ था कि वो ….गहरी मुसीबत में फंसे थे ! “मैंने आप के लिए …..” वह कहता ही रहा था !

रिपोर्ट लिखी थी – न्याय मित्र राजू रामचंद्रन ने – 

“एक ईमानदार पुलिस अधिकारी से बढ़ कर ….कोई और चश्मदीद गवाह क्या होगा ….? संजीव भट्ट के कथन पर विश्वास होता है ….क्यों कि …वो वहां हाज़िर थे ? घटनाओं में स्वयं शामिल थे ! वो अधिकारी हैं , अतः ….विश्वसनीय हैं ! उन का कहना है …कि ….जो भी कुछ हुआ ….वह स्वयं चीफ मिनिस्टर नरेन्द्र मोदी के इशारे पर हुआ ! वरना उन की बिना मर्जी के ….उन की स्टेट में ….पत्ता भी हिल सकता है , भला ….?

अलग-अलग समूहों के बीच …शत्रुता फैलाने के मामले में ….नरेन्द्र मोदी पर मुकद्दमा चलाया जा सकता है !”

“आ गया चारों खाने चित ….!” संजीव भट्ट जश्न मना रहे थे . उन के साथ उन की पूरी टीम थी . “अब नहीं बचेगा , बेटा !” उन्होंने आश्वस्त हो कर घोषणा की थी . “चला था , मुझे मात देने …..?” वह विंहसे थे . “ब्राह्मण पुत्र को ….एक तेली ….तेल बेचने चला था ….?” वह हंस रहे थे . “वाह,बेटे ,…वाह …!” उन्होंने अपने आस-पास को देखा था . पूरा का पूरा गिरोह उन की कामयाबी पर मुग्ध था ! “बड़ा बनता है – समाजसेवी  ……और वो क्या ….आर एस एस का …..?” 

“निकर धारी है , सर !”

“हाँ, रे ! वही ………सू….सू……..न ….न …..” ताली पीट-पीट कर हंस रहे थे , सब ! “हम सिखाएंगे बेटे को …..राजनीति !”संजीव भट्ट कह रहे थे . 

मेरी भी हवाईयां उड़ गईं थीं ! क्या सच हारेगा – में स्वयं से पूछ रहा था ! क्या में इस होती साज़िश का शिकार बनूँगा ….? क्या लोमड़ी शेर को शिकश्त दे कर ही दम लेगी ….? क्या मेरा विश्वास मानवीय मूल्यों से उठ जाएगा ….? क्या मुझे अब भिन्न तरह से लड़ना चाहिए ….?

साम….दाम ….दंड …और भेद …राजनीति के चार खम्बे माने जाते हैं ! लेकिन मैंने न जाने क्यों ….एक दूसरा ही रास्ता चुना था ! में शायद उसी रास्ते पर चल पड़ा था ….जिस पर विवेकानंद चले थे …..जिस पर निवेदिता चली थी …..और जिस पर अरविंदो अग्रसर हुए थे !! 

और में अब भी अपना रास्ता बदलना न चाहता था …..!

कमाल ही तो था …..!! 

“कमाल ही तो था कि …अपने ही लोग – जो अंग्रेजों के साथ सत्ता मैं शामिल थे , अपने ही लोगों की जानें ले रहे थे ……जुल्म ढा रहे थे …और आज़ादी की जलती शमा को बुझाए दे रहे थे ! लालच …स्वार्थ …और ….” दादा जी गंभीर थे . 

“और ….?” मैंने पूछा था . 

“गद्दारी …..!!” वो कठिनाई से बोल पाए थे . “एक जन्मजात रोग …जो हमारे खून में है ….! न जाने क्यों है ….नरेन्द्र ये गद्दारी हमारे खून मैं ….?”टीस आए थे दादा जी ! 

“बम नहीं फटा था , क्या …..?” मैं अपनी जिज्ञासा को रोक न पा रहा था . “क्या …किसी मुखब्बर ….ने ….?” मैं भी सोच में पड़ गया था .  

“फटा था , रे ! बम तो फटा था !!” दादा जी तनिक हुलस कर बोले थे . 

“कहाँ ….?” मैंने भी तुरंत ही पूछ लिया था . 

“दिल्ली में ! चांदनी चौक में ….!!” दादा जी ने अब हंस कर अपने पीले दांत मुझे दिखा दिए थे . वह बहुत प्रसन्न थे . 

“अरे, वाह !!” में भी कूदा था . “दिल्ली आ कर बम मारा ….?” में फिर से पूछ रहा था . 

“हाँ ! दिल्ली जा कर ही बम मारा था ! अंग्रेजों को तो उम्मीद ही न थी …..कि ये आज़ादी की सुलगती ज्वाला ….उत्तर भारत तक भी पहुँच जाएगी ….? वो तो आश्वस्त हो कर बैठे थे ….कि अब तो भारत उन का था ….उन के लिए ही था !!”

“पर कैसे ……?” में अब सतर्क था . में न चाहता था कि दादा जी का कहा कुछ भी हाथ से जाने दूं .

“प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो चुका था . भारत से सैनिक लड़ाई मैं भेजे जा रहे थे !  धन-माल भी हमारा ही ….स्वाहा हो रहा था ! हम तो भूखों मर रहे थे ….पर अंग्रेज अपना साम्राज्य सुधारने मैं लगे थे ! जनता मैं रोष था . लोग इन का साथ न देना चाहते थे ! लेकिन जो उन के दलाल थे ….पिट्ठू थे ….वो तो उन के ही साथ थे ….? खुली लूट हो रही थी – भारत की ……”

“फिर ….?” 

“फिर क्या …..? लार्ड हार्दिंग्स पर हमला करने की ठान ठानली ….देश-भक्तों ने ! भारत का बायसराय बना ये लार्ड हार्दिंग्स ….बहुत बड़ा ज़ालिम था ! इसे दया तो आती ही न थी ….? देश को निचोड़े दे रहा था !”

“फिर ….?” अब मेरा धैर्य डूबने लगा था . में बम मारने की कहानी पहले सुन लेना चाहता था . 

पर दादा जी थे कि पहेलियाँ बुझा रहे थे !! 

…………………………….

श्रेष्ठ साहित्य ले लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!