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मैं इस नरसंहार की निंदा करता हूँ !

rabindra nath tagore

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा .

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास अंश ;-

“लोगों के मनों ने मान लिया था , नरेन्द्र कि अंग्रेज झूठे हैं …फरेबी हैं …मक्कार हैं ! जो लोग अपने निजी स्वार्थ वश अभी तक उन के साथ थे …अब वो भी छिटकने लगे थे !”

“कैसे …?”

“महान विचारक रविन्द्र नाथ टैगोर ने ‘नाईट’ की पदवी अस्वीकार करते हुए अंग्रेजों का साथ छोड़ा था ! ‘मैं इस नर संहार की निंदा करता हूँ ‘ उन की ये घोषणा पूरे देश में गूंजी थी ! “ये देश के प्रति दुर्व्यवहार है ! जनता का इतना बड़ा अपमान ….?” वो स्वयं भी हैरान थे . 

“और ….और …वो लोग …जो उन के साथ थे …?”

“सभी नाराज़ थे ! यहाँ तक कि सैनिक भी ….जिन्होंने अंग्रेजों को विश्व विजेता बनाया था ….जिन्होंने खून बहाया था ….जानें दीं थीं ..अंग्रेजों से नाखुश थे !”

“कारण  ….?” 

“कारण कि अंग्रेजों ने सिपाहियों के साथ भी ठगी की थी ! उन्हें चंद मैडिल पकड़ा कर …उपाधियाँ दे कर …खुश कर दिया था ! पूरे देश को समझ आई थी कि …अंग्रेज जो मैडिल बाँट रहे हैं …वो गुलामी के प्रतीक के आगे और कुछ नहीं हैं ! अंग्रेज उन्हें बेबकूफ बना रहे थे – लोग समझ गए थे !”

“देर …आए …दुरुस्त आए …!” मैंने नारा जैसा लगाया था . मैं प्रसन्न था कि देश जाग्रत हो रहा था ! “लेकिन अंग्रेजों ने …..?”

“खूब जुल्म ढाए  थे !  जलियाँ वाला बाग के बाद …गुजरा वाला में हुए प्रदर्शनों पर तो ….तोप ,टेंक …और हवाई हमले हुए थे ! उन्हें डर था कि कहीं ….सत्तावन वाला ग़दर फिर से चालू न हो जाए …? लोग मरे थे ….घायल हुए थे ….पर …हिले न थे ! पूरा देश अब मुड कर अंग्रेजों की आँखों में देख रहा था !”

मैं अब बहुत प्रसन्न था . मेरा रोम-रोम खिल उठा था . न जाने क्यों इस तरह के प्रसंग मुझे बहुत भले लगते हैं …? न जाने क्यों मैं …मरने-मिटने के लिए हमेशा ….ही तैयार रहता हूँ …? न जाने क्या है कि …जब भी …देश,धर्म की बात आती है …तो मैं एक विशेष तरह से जाग्रत हो जाता हूँ !

“आसमान के बेटे हो ….!!” किसी ने मेरे कान में कहा था . 

“डायर शैतान का बेटा था !” दादा जी संयत स्वर में बोल रहे थे . “इस शैतान के बेटे ने ही अंग्रेजी साम्राज्य के चलते जहाज में कील ठोकी थी ! ये पहला कदम था …जो अंग्रेजों के पराभव का मार्ग प्रशस्त कर गया था !” कह कर दादा जी गहरे सोच में डूब गए थे .

तब मेरी समझ में ये बात न बैठी थी . मैं तो डायर को अंग्रेजी सरकार का एक …परं बहादुर और वफादार  सेवक …मान कर चल रहा था . तब मैं नहीं समझा था कि आखिर डायर से ऐसी कौनसी गलती हुई …जिस ने अंग्रेजी राज का जहाज डुबो दिया ? 

“अंग्रेजों ने हमारे साथ भाईचारा नहीं बनाया !” दादा जी टीस आये थे . “जब कि हमने उन्हें बराबरी पर स्वीकार लिया ! वो तो व्यापारी बन कर आए थे ? फिर वो सत्ता में साझा कर बैठे …और फिर वो ….देश के मालिक बन गए …? हमने उफ़ तक न की . सोचा- ये भी तो अपने जैसे ही हैं ! अपने लोग हैं ! सब मिल-जुल कर …रह लेंगे …! लेकिन …..”

“वो ठग थे !” मैंने अपना मत दे दिया था . 

“हाँ,नरेन्द्र ! तुमने ठीक कहा ! वो ठग थे . ठगी का माल भारत से ढो -ढो कर ले जा रहे थे ! भारत को कंगाल बना रहे थे …और इंग्लेंड को आबाद कर रहे थे ! यहाँ लोग भूख से मर रहे थे ….बीमारियों से तंग थे ….बे-रोज़गार थे …अशिक्षित थे ….और …वहां एक अलग ही दुनियां बस गई थी …?”

“कौनसी दुनियां, दादा जी ….?”

“एशो-आराम की दुनियां …! एक ऐसी दुनियां जहाँ केवल स्वयं को ही पोषा जाता है ! एक ऐसी दुनियां जहाँ अयाशियों की आराधना की जाती है ! एक इस तरह का समाज …जहाँ हर आदमी एक हैसियत ले कर चलता है ! जहाँ हर किसी के पास जायदाद होती है …ओहदा होता है ….और गुरूर होता है ! एक ऐसा देश जो …अन्य सब देशों का सिरमौर होता है ….उन पर शाशन करता है ….और हुक्म चलाता है !!”

“ऐसा क्यों होता है , दादा जी ….?” मैंने पूछा था . 

“ऐश्वर्य आदमी को अंधा बना देता है , नरेन्द्र !” दादा जी बता रहे थे . 

“कैसे ….?” मैं पूछता ही जा रहा था . 

“अंग्रेजों के पास धन के ढेर लगे थे ! उन का झंडा कहीं झुकता ही न था ! पूरे विश्व में उन की धाक जम गई थी .  इन का गौर-वर्ण इन के लिए एक अलंकार सिद्ध हुआ था ! अनपढ़ अंग्रेज भी हमारे लिए किसी चक्रवर्ती सम्राट से कम न था !”

“कमाल ….ही था …कि ….?”

“हाँ ! कमाल ही कमाल था , नरेन्द्र ! अंग्रेजों के पास अब वो था … जो और किसी के पास न था !”

“मसलन ….कि ….?”

“एक धर्म था ….एक भाषा थी ….और एक संस्कृति थी ! ये उन के तीन पैर थे जिन पर पूरा-का-पूरा अंग्रेजी साम्राज्य खड़ा था ! इन्होने अपने ही धर्म को श्रेष्ठता प्रदान की …और इसे इतना ऊंचा उठा दिया कि …अन्य सभी धर्म इस से निम्न दिखाई देने लगे ! यहाँ तक ,नरेन्द्र कि हमारा भी सनातन धर्म …हमारे वेद  … हमारी गीता और महाभारत …सब के सब इन के नकली धर्म के सामने नकली लगने लगे ! इन्होने कहा – तुम्हारा धर्म ढोंग है ….बकवास है ! और हमने मान भी लिया ….?” 

“और ….?”

“और …इन की भाषा …! इतना उछाला इन्होने अपनी भाषा को …कि आज तक ये भाषा …जाने का नाम तक नहीं लेती …? आज भी पूरे विश्व के लिए एक लिंक बनी है ! जबकि इस में वैसी कोई महानता नहीं …जो  संस्कृत में है …?” 

“और ….?’

“और …इन की संस्कृति ….? इतनी सम्मोहक संस्कृति है – इन की …कि …आदमी को पागल बनाने में कुछ नहीं लगता ! हम अपना पूरे-का-पूरा आध्यात्म भूल कर …इन की इस फ़िज़ूल की संस्कृति से … प्रभावित होने लगे …जहाँ स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध शैतानो के जैसे सम्बन्ध हैं ! और एक तरह से तो ….” दादा जी चुप थे . अब ज्यादा कुछ वो कहना नहीं चाहते थे . 

धर्म,भाषा और संस्कृति के तीन पैरों पर खड़ी …अंग्रेजी सभ्यता मुझे भिन्न तरह से प्रभावित करने लगी थी ! लगा था – इन की ये भाषा …धर्म और संस्कृति ही …इन के ऐश्वर्यवान होने के तीन कारण थे ! यही तीन आकर्षण थे …जिन के ज़रिए अंग्रेजों ने धन कमाया था …नाम कमाया था …और एक ऐसा साम्राज्य स्थापित किया था …जहाँ सूरज गरूव ही नहीं होता था …!! 

“अपने पर अभिमान करना बुरा कब है ….?” मेरा अंतर बोला था . “गलती आप की है ….अगर आप अपने आप को …निम्न मान बैठते हैं …?” 

“गलतियाँ तो सब हमारी ही थीं , नरेन्द्र !” दादा जी कराहने लगे थे . “इस गुलामी के कवच को हमने ही सहर्ष पहना था ! हमारे स्वार्थ …हमारे लालच ….हमारी आपसी फूट ….और वैमनष्य …और हमारे ही आपसी मन-मुटाव …टकराहटें …और दुश्मनियाँ हमें डुबो बैठीं ! और अब भी भारत एक कहाँ था ….? अब भी हम बिखरे हुए हैं ! बंटे हुए हैं …अलग-अलग हैं …! और तब भी हम बंटे हुए थे ! एक होने की कोई सूरत न थी …? जलियाँ वाला बाग की घटना के बाद एक सन्नाटा था जो पूरे देश में छाया हुआ था !”

“अंग्रेजों को तो कोई डर था ही नहीं ….?” 

“नहीं ! वो तो अब भारत के एक छत्र अधिपति थे ! जो चाहें – वो कर सकते थे ! जो मांगें …उन्हें मिलता था !”

“और हमारे नेता ….? हमारे नेता …दादा जी …वो जो आज़ादी के लिए लड़ रहे थे ….वो ….?”

“जेलों में बंद थे ! लड़ाई के दौरान सब को अंदर कर दिया था ! सब को देश-द्रोह की धाराएं बता कर …सजाए -मौत का डर दिखाया गया था !”

“कोई तो बाहर रहा होगा ….?” 

“हाँ ! एक था …! गांधी ….!! गाँधी जी जेल में नहीं थे ….!” 

“क्यों ….?” 

“वो अंग्रेजों के साथ थे ! विश्व-युद्ध में गाँधी जी अंग्रेजों के साथ थे !”

मैं सनाका खा गया था ….मूर्छित हो गया था ….!!

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!