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कुर्बानियाँ तो देश-भक्तों का गहना हैं ! दो न कुर्बानियाँ ?

khudiram bose

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा- नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश :-

मैंने पूजा-अर्चना कर ली थी ! मैंने अपने इष्ट को भी मना लिया था !!

फिर मैंने दादा जी को याद किया था ….और गुरु जी को, प्रणाम किया था ! और हाँ, अपनी माँ और माँ-भारती से आशीर्वाद प्राप्त किया था ! अब मेरे मनोरथ मेरी बाँहें पकड़ मुझे दिल्ली ले जा रहे थे ….!!

सूरज निकल आया था . उजास ने पूरे आकाश को आंदोलित कर दिया था ! हल-चल थी …क्रिया-कलाप थे …और लोगों की दिन-चर्या चल पड़ी थी ! लेकिन मैं था …कि अभी तक ठिठका खड़ा था …? मुझे एक इंतज़ार था ! सन्देश अभी आना था ? आया नहीं था ! उम्मीद थी – जो मेरे पास ही बैठी थी ….और मुझे इंतज़ार करने की ही सलाह दे रही थी !!

केवल ….केवल ….एक कदम दूर था मैं …आज १३ सितम्बर २०१३ दिन शुक्रवार को अपने अभीष्ट से …अपनी आकांक्षाओं से ….और अपने उद्देश्य से ! आज दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग ११ अशोक रोड , पार्टी के आँफिस में होने वाली थी ! आज एक बहुत ही महत्व पूर्ण निर्णय लिया जाने वाला था ! १२ सदस्यों के इस बोर्ड ने आज आगामी २०१४ के चुनावों से पहले एक नाम को स्वीकृति देनी थी ? उस नाम को …जिस ने …२०१४ का लोक सभा चुनाव जीतना था …और भारत देश का प्रधान मंत्री बनना था ….?

संभावना थी …नहीं,नहीं ! पूरी उम्मीद थी …कि नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा होगी …और ……

और मैं – नरेन्द्र मोदी मात्र इस खबर से …इस विचार से …और इस सामने खड़े …मूर्त हुए भविष्य से …हाथ मिलाने से भी डर रहा था ….?

मुझे अपनी हालत बिगडती लगी थी !

ऐसा नहीं था कि मैं …सफलता-विफलता का स्वाद पहली बार चखने जा रहा था ? और न ही ऐसा था कि …आशा-निराशा से मेरी ये पहली मुलाक़ात थी …? लेकिन कुछ ऐसा अवश्य था – जो मर्मभेदी था …मोहक भी था …असहय था …पर था अत्यंत आवश्यक ? सच मानिए ! मुझे अपने इस भारत देश का प्रधान मंत्री बनना …अति आवश्यक लगा था …और अब मैं आप को अपना मंतव्य भी बता देता हूँ !

अबोध शिशु ही तो था ,मैं जब मैंने पूज्य दादा जी के चरणों में बैठ कर …उस जुगांतर के मटमैले आफिस में स्वतंत्रता संग्राम का वृतांत सुना था …और राजनीति की जीत-हार के हथकंडे -सुने-समझे थे ? स्वतंत्रता पाने में माँ-भारती को कितना कष्ट हुआ ….मुझ से ज्यादा कौन जानता है ? जो दादा जी के बूढ़े चहरे पर लिखा था ….उसे मैंने ही तो पढ़ा था ? आपसी फूट …बंटबारे ….वैमनस्य …कलह…अशिक्षा …और ….और …हाँ ! गद्दारी -हमारे अपने दुश्मन थे ! और आज …आज़ादी के सत्तर सालों के बाद भी …वही दुश्मन जिन्दा थे …और हमें सता रहे थे ….???

वास्तव में तो …अंग्रेजी -राज भारत से गया ही न था ….?

गुजरात में हुए ‘गोधरा’ को ही मैं प्रमाण के रूप में पेश कर सकता हूँ ! और ….और …हाँ ! देश में होती लूट ….देश से विदेश जाते भारतीय ….बाहर जाता हमारा -धन-जन …और अंग्रेजों की दी व्यवस्था की जंजीरों में जकड़ा …समग्र भारत …? क्या था – जो आज़ाद हुआ था ….? क्या है -जो अंग्रेजी राज में नहीं था …? कौन है – जो देश का शुभचिंतक है ….? जो अंग्रेजों के भक्त थे …वही आज के शाशक हैं …सत्ता पर काबिज हैं …और वही सब कर रहे हैं -जो अंग्रेज कर रहे थे ….? ‘डिवाईड एंड रूल ‘ बदला कहाँ है ?

काश ! आज अगर दादा जी जिन्दा होते ….तो ….

“बिना धर्म,भाषा और संस्कृति के क्या देश बनेगा,बेटे …?” गुरु जी आज भी मुझे बताते लग रहे हैं . “समाज की संरचना के लिए ये तीन तो आवश्यक अंग हैं ! जुड़ने के लिए कुछ तो अपनापन चाहिए ….? धुरीहीन आदमी ….विचारशून्य युवक …और संस्कार रहित समाज …किस काम का …?” उन के प्रश्न थे -जो आज भी प्रासंगिक हैं !

हमारे पास अपना तो कुछ भी नहीं है ….?

अंग्रेजी भाषा से हम काम चला रहे हैं ! उन्ही की रीति-नीति पर चल रहे हैं . उन्ही के संस्कार और शिक्षा हमारी संतानें ग्रहण कर रही हैं . पश्चिम की हवा ही हम पर हावी है ? उन का रहन-सहन हमें आकर्षक लगता है ! धनपतियों …नेताओं …समाज सुधारकों के ..बच्चे विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं . हमने अपना कुछ बनाया कहाँ है …? उधार खरीद रहे हैं ….और कर्जे पर जी रहे हैं !! अपनी रक्षा -सुरक्षा के लिए भी …हम उन्हीं के मुहताज हैं ….?

और …अब्बा …? उन का वो साम्राज्य -जो हर-हर मईनों में स्वतंत्र है ..उन का अपना है …? भेड़ -बकरियों का पालन-पोषण ….और अपनी जीविका के लिए स्वयं उत्तरदाई उन की वो संस्था …स्वतंत्र है !! वो स्वतंत्र हैं …तभी सुखी हैं …अपने उस स्वर्ग में ….जहाँ से मैं …लौटना ही न चाहता था ….?

और हाँ ! अब्बा के दिए उस धन को मैंने जब गुरु-दक्षिणा के दिन शाखा के कोष में जमा कराया था – …और गुरू दक्षिणा का ऋण चुकाया था …तो अब्ब्बा को ही मैंने अपना इष्ट माना था ! मैंने -उसी देने की ….कमाने-खाने की …और एक पारदर्शी जीवन जीने की शपथ ली थी ! मैंने उसी दिन निर्णय लिया था कि …मैं …भारतीय स्वयं सेवक संघ में ..रह कर …समाज की सेवा करते हुए …उन सोपानों को चढूँगा …जिन की मेरे दादा जी को मुझ से उम्मीद थी …और जिन के लिए मेरे गुरु जी ने मुझे आशीर्वाद दिए थे ….?

सच में ही भारतीय स्वयं सेवक संघ ने मुझे मेरा वांछित भविष्य पकड़ा दिया है ! जो जीवन-मूल्य मैंने संघ में रह कर ग्रहण किए हैं …वही मेरी संम्पत्ति हैं …वही मेरा आधार हैं ….और उन्ही के भरोसे आज मैं …यहाँ आ कर …हाथ फैला कर …प्रधान मंत्री के पद का आग्रही हूँ ….!!

मैं भूला कहाँ हूँ -उस इमरजेंसी की घटना को -जब श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश के सारे गणमान्य नेताओं को …जेल भिजवाया था …? सारे विचारक और विरोधी पत्रकार भी अंदर थे ! और तो और मेरा भी नंबर आ ही जाना था …पर मैंने तो भेस ही बदल लिया था ! सरदार बन गया था – मैं …? हा हा हा …! सच बड़ा ही आनंद रहा …? मैं टूटी-फूटी पंजाबी बोलने लगा था ! और जब चुपके से …नेताओं से जेलों में मिलाता …उन के सन्देश देता ….उन की बात लेता …तो एक अलग ही शुगल -सा हो जाता ….?

सौभाग्य था मेरा …जो मैं इतनी विभूतियों के …संपर्क में आया …और मैंने उन के विचार जाने …मनोदशा पढ़ी …उन के देश के प्रति लगाव ….और देश-हित के लिए छेड़े संघर्ष की …जानकारी मुझे मिली ….!!

एक प्रकार का अंग्रेजी राज ही लौट कर आ गया था ….?

मुझे दादा जी की सुनाई सारी कहानियां याद थीं …जब तिलक जेल में थे …अरविंदो पर मुकद्दमा चला था …फांसी की सजाएं भी सुनाई जातीं थीं …और देश-भक्तों को देश-द्रोही कहा जाता था ..? और आज भी जेल में बंद ये नेता -देश-द्रोही ही तो थे ….???

एक ….सिर्फ …एक परिवार ही देश-भक्त था – गाँधी परिवार !!

बड़ी उस्तादी से ….बड़ी ही चालाकी से …नेहरू जी की बेटी -इंदिरा गाँधी ने ….नेहरू-गाँधी की टोपी पहन कर …सत्ता अपने हाथ में ले ली थी ! अब उन्हीं के दो बेटे सत्ता के दाबेदार थे …? संजय गाँधी का आतंक तो पूरे देश पर छा गया था ! लोग उन के नाम से ही भय खाने लगे थे ….???

गाँधी परिवार सत्ता का केंद्र था -यह बात विदेशियों को समझते देर न लगी थी !

मेरी समझ में भी राजनीति का ये खेल तभी आया था . मैं भी तब एक स्वयं सेवक था ….और देश के गली-कूचों में प्रचारक बन …युवकों को बता रहा था कि …ये देश हमारा है ….हमें जांन से भी ज्यादा प्यारा है ….और जो सत्ता-महत्ता का तंत्र चल रहा है …..वो देश के लिए बे-हद ही हानिकारक है …? गाँधी परिवार में विदेशियों ने सेंध लगा ली है – और छल से…बल से …घात-प्रति-घात से …वो अब भारत को इन से छीन लेंगे ….और हमें फिर गुलाम बना लेंगे …! और अब वो घटेगा जिसे हम सोच भी नहीं सकते …..????

और हुआ भी वही था ….! खालिस्तान का एक शगूफा विदेश से एक छोटी चिंगारी की ररह …लहका था …और पूरा पंजाब आतंक से दहक उठा था ? ये श्रीमती इंदिरा गाँधी के लोग …उन्हीं के सेवक ….उन्हीं के देश-भक्त ….अब उन्हीं के सामने खड़े-खड़े खालिस्तान मांग रहे थे ….???

“काश ! आज संजय जी होते ….?” उन्हें सब ने याद किया था . “हरगिज़ न होती …ये मांग …..और न होते …ये खालिस्तानी ….? राजीव तो देवता हैं …?”

मेरी भी आँखें खुलीं थीं . होती साज़िश को मैंने बड़ी ही बारीकी से सूंघा था ! लेकिन तब मेरा वजूद ही क्या था …? हाँ ! मेरा अनुमान सही था कि ….अब सत्ता इंदिरा जी के हाथ से जाएगी ….? लेकिन कैसे – ये मैं नहीं जानता था ! कारण – इंदिरा जी एक बड़ी ही कुशल राजनीतिज्ञ थीं ! उन की समझ के सामने तो घोड़े दौड़ते थे ….

“आप ने …ये सरदार …पहरे पर बिठा रखे हैं ….?” इंदिरा जी को चेतावनी दी गई थी . ..! “ये भी तो ….खालिस्तानी ही हैं ….?”

“नहीं ! मुझे इन पर भरोसा है !!” उन का हंसमुख चेहरा और भी आकर्षक लगा था . “रहने दें ….इन्हें …?” आदेश उन्हीं के थे .

और वो आश्चर्यजनक घटना घटी थी ….! उन्हें गोलियों से मार गिराया था ! सोनियां जी हाज़िर थीं . अमरीका के लोग फिल्म बनाने आए थे . उन की बुलेट -प्रूफ जैकिट उतरवा दी थी . और …..

और फिर राजीव युग का आरंभ हुआ था ! अब मैं भी तनिक और बड़ा हो गया था ! मैं भी अब भारतीय जनता पार्टी में आ मिला था …? मैं भी अब चुनाव लड़ाने लगा था ! मैं भी अब रथ-यात्राएं संपन्न कराने लगा था ? मैं भी अब राजनीति के जटिल समीकरणों को जोड़ने-तोड़ने लगा था ! मेरी भी एक शाख बनने लगी थी ….!!

राजीव गाँधी बिना किसी विलम्ब के आकाश की ऊंचाईयों तक पहुँच गए थे …..!!

सच ! मैं भी किन्हीं मईनों में …राजीव गाँधी का मुरीद बन गया था ! मैं भी उन्हें चाहने लगा था ! मैं भी डरने लगा था कि कहीं ….वो न हो जाए …जो संजय जी के साथ हुआ ….इंदिरा जी के साथ हुआ ….? बहुत ही भोले आदमी थे – राजीव भाई …! राजनीति की कुटिल चालें समझना उन के वश की बात न थी ? वो थे …एक पाक-साफ़ …आदमी …एक देव-पुरुष -से …अभिशप्त राज कुमार !

और हुआ भी वही ….जो ऐसे अच्छे-सच्चे …लोगों के साथ हो जाया करता है ….???

अन्धकार घिर आया था -देश में ….? दिशाहीन हो गई थी – राजनीति ….? एक ऐसी अभिलाषा उगी थी मेरे मन में …जिस ने मुझे परेशान कर दिया था …? क्यों खट रहा है तू …इस राजनीति में ….? क्या मिला -राजीव को ….क्या ले गया संजय गाँधी ….क्या रह गया इंदिरा जी का …? क्या देता है – देश …और समाज – जिस के लिए जानें दी जाएं ….?

“देश डूब जाएगा ,बेटे !” दादा जी बोले थे . मेरी नीद खुली थी , “कुर्बानियाँ…तो …देश-भक्तों का गहना हैं ! दो कुर्बानी …? डरो मत,नरेन्द्र !” उन का आदेश था !!

“व्यक्ति का भाग्य निश्चित होता है , नरेन्द्र !” गुरु जी कहते लगे थे . “मुझे देख लो ? मैं क्या जानता था कि ‘चित्रा’ का प्रसंग मुझे ‘अवधूत’ बना देगा ….?”

और मैंने फिर से अपना मार्ग चुन लिया था !!!

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!