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खानदान 95

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अब तीन हिस्सेदार तैयार थे.. विनीत, रमेश और दर्शनाजी। दर्शनाजी हालाँकि माँ थीं, देखजाय तो उन्हें हिस्से की क्या ज़रूरत थी.. पर अब विनीत के सामने खड़े होकर कहने लगीं थीं,” विनीत! मेरा फैसला कर दे! मन्ने मेरा तीसरा दे! दे!”।

दर्शनाजी अब विनीत के सामने खड़े होकर अपने तीसरे हिस्से की माँग करने लगीं थीं। विनीत तो चुप रहता था.. पर यह बात सुनकर रमा तुरंत बोल पड़ती थी,” ये कहाँ से देंगें आपको तीसरा हिस्सा! ये फैसला तो आपको ही करना है!”।

“ मैं कित्ते करूँगी, मन्ने बाप किमे देकर जा रया से के!”

दर्शनाजी का जवाब में यही कहना होता था.. वो कोई भी फैसला नहीं कर सकतीं.. रामलालजी उन्हें कुछ भी देकर नहीं गए हैं।

“ फ़िर इनके पास ही क्या है!’।

रमा विनीत की तरफ़ से सफ़ाई पेश करते हुए.. यही कहा करती थी.. कि विनीत के पास भी कुछ नहीं है। अभी मामला परिवार में गोल-मोल ही चल रहा था। किसी भी तरह का फ़ैसला इस वक्त होने की कोई भी उम्मीद नहीं थी। सिर्फ़ अभी रमेश ही एक ऐसा परिवार में सदस्य था. जिसे फटाफट बटवारा करवाना था। रोज़ के खर्चे अब रमेश के पूरे नहीं पड़ पा रहे थे, अपने ख़र्चों को पूरा करने के लिये.. अब रमेश ने रामलालजी के गाँव वाली ज़मीन का सहारा लिया था। रामलालजी के भाई उन्हीं की ज़मीन के हिस्से पर खेती कर रहे थे.. और साल भर का जो भी हिस्सा बनता था.. वो कायदे से रामलालजी के परिवार को देना बनता था.. जो कि वे कभी देते नहीं थे। गाँव की ज़मीन के सालाना हिस्से को लेकर भी अब परिवार में बातें होने लगीं थीं,” एक लाख ते भी ऊपर हिस्सा बन रया है! देंदे कोनी!”

तीनों माँ-बेटा आपस में यही कहते थे.. कि साल भर का हिस्सा एक-लाख से भी ऊपर निकल रहा है.. पर देने का नाम ही नहीं है। इसी हिस्से का रमेश ने फायदा उठाया और अपने लिये गाँव फ़ोन कर-कर के पैसे माँगने लग गया था। एक बार में कम से कम दस हज़ार रुपये माँगता और अपना और रंजना का ख़र्चा चलाता था। “ मेरे गेल बहुत बुरा काम कर राख्या से! कम ते कम महीने के पच्चीस से तीस हज़ार बने हैं! देंदे तो कोनी!”।

अब तो रमेश गाँव फ़ोन करके अपने पिता के भाई भतीजों से साफ़-साफ़ कहने लगा था.. कि फैक्ट्री में उसके महीने के पच्चीस से तीस हज़ार रुपये बनते हैं.. पर उसे उसका हिस्सा सही नहीं मिलता। गाँव वालों की सहानुभूति हासिल कर, अब रमेश ने पैसे मँगाने का तरीका निकाल लिया था। रमेश को फ़ोन पर ऐसे बात करता देख.. और हर बार दस-दस हज़ार रुपये मँगाकर लडक़ी पालने का तरीका सुनीता को पता चल गया था.. जिसकी चुगली उसनें फ़ौरन जाकर दर्शनाजी से कर दी थी।

“ अम्माजी! इन्होंने कई बार गाँव से उस लड़की को पालने के लिये, दस-दस हज़ार रुपये मँगवाए हैं!”।

“ पेल्या बताना था! न.. हम इलाज करते! चलो! देखांगे!”।

दर्शनाजी को जैसे ही सुनीता ने बताया और उन्हें पता चला, कि गाँव से पैसे रंजना के लिये मँगवाए जा रहे हैं, तो उन्हें बात का ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा था.. क्योंकि वो तो चाहतीं ही थीं, कि रमेश आराम से लड़की के चक्कर में पड़ा रहे.. नहीं तो फ़ालतू दिमाग़ लगाएगा.. और हो सकता है.. कि सुनीता का घर ही बस जाए। यह बात सुनीता के दिमाग़ में भी आ गई थी.. कि सासु-माँ को बताने से कुछ नहीं होगा.. रमा को इस बात की चुगली करनी पड़ेगी, क्योंकि विनीत और रमा रमेश के सख़्त ख़िलाफ़ थे, और उसे हरगिज़ हिस्से तक नहीं पहुँचने देते!

सुनीता की चुगली का असर सही हुआ था, अब रमेश के फ़ोन करने पर भी गाँव से उसके बैंक में पैसा ट्रांसफर होना बंद हो गया था। रमेश के फ़ोन लगाने पर भी वहाँ से अब कोई भी जवाब नहीं आता था। इसलिये रमेश ने अब गाँव जाने का फ़ैसला लिया था.. पर उससे पहले रमेश के दिमाग़ में अपनी सफ़ारी गाड़ी बेचने का आईडिया आ गया था.. जो वह अब रखना ही नहीं चाह रहा था, भलि भाँति जानता था.. गाड़ी चोरी की है.. और रखने में रिस्क है।

“ सफ़ारी गड्डी दे के मारी! थाने में रिपोर्ट हो री से!”।

चलिये फ़िर आप और हम अब रमेश की सफ़ारी गाड़ी को बेचने की प्लानिंग के साथ आगे बढ़ते हैं.. खानदान में।