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खानदान 94

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रामलाल विला में अब सभी पैसों से संवंधित चीज़ों का ठेकेदार अब विनीत ही हो गया था.. कारण यह था, कि बाबूजी कोई भी बटवारा नहीं करके गए थे.. फैक्ट्री का सारा financial control अब विनीत के ही हाथ मे था। रमेश को तो फैक्ट्री के पैसों के बारे में थोड़ा बहुत बस, उड़ती सी ख़बर थी। रमेश अपने दिमाग़ की बात को अपनी माँ के संग बोलता भी था,” कम ते कम बापू! एक करोड़ रुपया छोड़ के जा रया से! सब इस धोरे से!”।

“ मन्ने सब कायीं का बेरा से!”।

रमेश और दर्शनाजी अब अक्सर यही बात किया करते थे.. कि रामलालजी कम से कम अपने पीछे एक करोड़ रुपये छोड़ कर जा रहे हैं, सब इस विनीत के हाथ लग गये हैं। रमेश की इस बात से दर्शनाजी पूरी तरह से सहमत थीं। माँ-बेटों को पता तो सब था.. पर यहाँ भी दर्शनाजी गेम खेल रहीं थीं। “ आप इस पर पूरी नज़र रखो! यह कहाँ जाता है! और किससे मिलता है!”।

रंजना ने रमेश को विनीत के बारे में पूरी तरह से होशियार रहने के लिये कह दिया था.. विनीत के ऊपर पूरी नज़र रखने के लिये कहा था। जैसे-जैसे रंजना रमेश को समझाती जा रही थी.. रमेश ठीक उसी तरह से चल रहा था।” यो के से! मेँ थाने में जाऊं हूँ!”।

रमेश ने घर आकर चिल्लाते हुए कहा था.. असल में रमेश के हाथ कंपनी के सैंतालीस लाख के पेमेंट का स्टेटमेंट हाथ लग गया था.. जो पैसा विनीत के बैंक में ट्रांसफर हो गया था। इस बात पर दर्शनाजी के सामने अच्छा-खासा नाटक शुरू हो गया था। रमेश और विनीत आगे पीछे भागते हुए.. फैक्ट्री से घर आए थे। रमा भी वहीं खड़ी थी.. हल्ला-गुल्ला सुन सुनीता भी वहीं आ खड़ी हुई थी।

“ अरे! ये मेरे  पैसे कोनी! इन्हें तो कोई और फैक्ट्री वाला मेरे बैंक में धर रया से!”।

विनीत ने अपनी माँ के आगे सफ़ाई देते हुए कहा था।

“ अच्छा! बक़वास करे है! यो! ये पैसे हमारे सें.. कोई और क्यों धरेगा! तूं बता!”।

रमेश ने विनीत की बात को काटते हुए, साफ़ शब्दों में कहा.. कि ये पैसे हमारे हैं.. कोई और इतने सारे पैसे इस विनीत के बैंक में क्यों रखेगा!

इस वक्त रमेश बिल्कुल सही कह रहा था,.पर दर्शनाजी एकदम चुप-चाप खड़ीं दोनों में हो रहे तमाशे को देख रहीं थीं.. सब कुछ जानते समझते हुए.. चुप रहना भी दर्शनाजी की चाल में ही शामिल था। चिल्ला चोट करते हुए.. रमेश के मुहँ से निकल ही पड़ा था,” चोर है, ये!”।

रमेश का विनीत को जैसे ही चोर बोलना हुआ था, रमा ने सासू-माँ को देखते हुए.. तुरंत ही बाजी पलट दी थी.. और पीछे न हटते हुए, चिल्लाकर बोली थी,” तू भी तो इसकी सारी ज़मीन खा गया!”।

बस! फ़िर क्या था.. दर्शनाजी की ज़मीन का नाम आते ही.. कंपनी कहीं की कहीं रह गई थी, और नाटक का मुद्दा अब माँ वाली ज़मीन हो गया था।

सैंतालीस लाख के स्टाटमेंट यहीं कहीं रह गया था.. और यह बात आई-गई हो गई थी।

“ मुझे तो रंजना ने कहा था, आप बोलो! कि मैं थाने जा रहा हूँ.. और तुरन्त तेज़ी से निकल जाओ! देखना! डर के मारे आपके पीछे-पीछे भागेगा!”।

रमेश ने सुनीता को बताया था, कि उसनें जैसे ही फैक्ट्री में विनीत के टेबल पर सैंतालीस लाख का स्टेमेन्ट देखा.. उसनें तुरंत रंजना को फ़ोन लगाकर बताया, और बाकी का आईडिया क्या और कैसे करना है.. उसे रंजना ने दे ही दिया था। वैसे इस विषय पर नाटक करने का फ़ायदा कोई भी नहीं हुआ.. चिल्ला-चोट कर सभी अपने में एक बार फ़िर से मस्त हो गये थे।

रमेश का निशाना बटवारे पर था.. और गाइड कर रहीं थीं.. रंजना देवी। लेकिन समस्या एक और थी, और वो ये.. कि रंजना को संभालने के लिये भी रमेश को लगातार पैसों की ज़रूरत पड़ती थी.. अब विनीत पैसे देता तो था, पर इतने भी नहीं.. अपनी बाहरी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये.. अब रमेश ने फैक्ट्री से लोहा उठाना शुरू कर दिया था.. थोड़ा नहीं गाड़ी भरकर.. जिसने एकबार फ़िर एक नए झगड़े को दावत दी थी।

“ दिखा गाड़ी में क्या रखा है.. नहीं दिखाऊंगा..!!”।

“ रख! हिस्सा!”।

रमेश की पैसा खाने की गति अब चार गुना बढ़ गई थी.. अब वो अकेला न था.. रंजना रमेश के साथ थी। रमेश अपनी पैसे की और रंजना के साथ झूठी शान की भूख मिटाने के लिये अब चारों तरफ़ दौड़ रहा था.. आइये रमेश के साथ रमेश के ही रास्तों पर चलते हैं.. और जुड़े रहते हैं.. खानदान के साथ।