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खानदान 70

indian wedding

सुनीता का थोड़े से दिनों के लिये बीच में दिल्ली जाना हुआ था.. सुनीता ने एक बार फ़िर अपनी माँ अनिताजी को रंजना के विषय में बता दिया था।” माँ!.. रमेश कहता है.. मेरा रिश्ता है.. रंजना के साथ!”।

अनिताजी ने पूरी विस्तार से कहानी सुनी थी..  कहानी सुनने के बाद अनिताजी मुस्कुराईं थीं, और सुनीता से कहा था,” रमेश और उस लड़की के रिश्ते में कुछ भी गहराई नहीं है। बिना सिर पैर का रिश्ता है.. रमेश घर लौट आएगा”।

यही क़िस्सा सुनने के बाद मुकेशजी ने अपनी बात को अलग ढँग से रखा था,” रमेश चाहे हज़ार लड़कियाँ क्यों न  पाले.. पर लीगल हिस्सेदार तुम्हीं हो.. ठाठ से उसी घर में रह.. अपना ध्यान रखना .. बस! मरना मत!”।

मुकेशजी ने रामलालजी की संपत्ति को और हिस्से को ध्यान में रखते हुए सुनीता को समझा दिया था।

रंजना वाली ख़बर पूरे घर में आग की तरह फैल गई थी.. जो की फैलनी ही थी।” पहले ज़माने में राजाओं की कई रानियाँ हुआ करतीं थीं.. और सभी प्यार से रहतीं थीं.. ठीक उसी तरह रंजना को भी अपनी छोटी बहन समझ कर आराम से और प्यार से रहो!”। सुनीलजी ने अपनी बहन को समझाते हुए कहा था।

“ जो कुछ भी जाना होता है.. वह जाकर ही रहता है.. रुकता नहीं है.. परमात्मा के भरोसे इंदौर चली जाओ!”।

मुकेशजी ने सुनीता को समझाकर विदा कर दिया था।

“ अगर सुनीता घर वापिस दो बच्चों को लेकर आ गई.. तो समाज में हमारी इज्ज़त उछल जाएगी.. और सुनीता बदनाम होगी.. बुढापा ख़राब मत करो!.. इसे इंदौर ही जाने दो”। मुकेशजी ने अनिताजी को भी समझाते हुए कहा था।

सबकी सीख लेकर एक बार फ़िर सुनीता इंदौर के रंगमंच पर आकर खड़ी ही गई थी.. जहाँ सभी कलाकर अपने-अपने डॉयलोग के साथ तैयार खड़े थे।

इंदौर आने के बाद वही नज़ारा था.. रामलालजी बीमार बिस्तर में पड़े थे। रमेश सुनीता को स्टेशन से ऐसे घर लाया था. . जैसे सुनीता कोई अजनबी हो। अब तो नया ही नाटक देखने को मिला था.. सुनीता को!.. रमेश रंजना उसकी माँ और उसकी और दो बहनों को सफ़ारी में लिये सुबह से शाम तक भागा फिरता था.. रात को ग्यारह बज जाया करते थे.. रमेश को घर लौटने में। रमेश से पलट कर सवाल करने वाला उस घर में कोई भी न था.. मतलब एकदम साफ़ था.. परिवार वालों की शय पर ही रमेश बाबू की नाटक कंपनी चल रही थी। सबसे बड़ा मुद्दा हिस्से का था.. इस हिस्से से बेदखल करना रमेश को.. विनीत और दर्शनाजी का मक़सद था। मकसद तो रमेश का भी जायदाद में हिस्सा पाना ही था.. पर रमेश अपनी माँ की अक्ल से काम कर रहा था.. जो ख़ुद उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी।

रमेश रंजना के साथ अब बहुत आगे निकल चुका था। घर में सुनीता और रमेश के रंजना को लेकर झगड़े होने लगे थे। सुनीता ने एकबार फ़िर परेशान होकर अनिताजी को फ़ोन लगाया था” अगर पति अपने सुख के लिये वैश्या की माँग करता है.. तो उसे वैश्या के पास भेजने में कोई बुराई नहीं है”। अनिताजी ने सुनीता को बात को अब इस तरह से समझा दिया था।

“ अपने आगे देखो!.. क्या है!.. रमेश पीछे रह गया!.. अपना काम मत ख़राब करना.. रमेश नहीं मानेगा!.. वो बहुत आगे निकल चुका है”। पास खड़े सुनीलजी ने एक बार फ़िर सुनीता को समझाने की कोशिश की थी।

पर यह मामला कुछ ऐसा ही था.. कि साथ रहते हुए.. पति-पत्नी मे झगड़ा रुकना नामुमकिन था। अब रमेश को देखते ही सुनीता का ग़ुस्सा बेक़ाबू हो जाया करता था।

“ रखैल पाल रखी है!.. तूने!”

सुनीता ने अब रमेश के लिये शब्दों की सीमा को भी लाँघ दिया था।

“ पालूंगा!!!”.. मेरी है!.. वो!. अपना सब-कुछ दूँगा उसको!.. कर ले.. जो करना हो!”।

अब रमेश जैसे आदमी से तो ऐसा ही जवाब बनता था.. इसमें तो कोई हैरानी की बात नहीं है।

“ मैं थाने से बोल रही हूँ.. पुलिस-स्टेशन आ जा!”।

बेचारी!.. सुनीता!.. खैर!.. दूसरी औरत को देख कर कोई भी पत्नी अपने ऊपर काबू नहीं रख पाती.. फ़िर चाहे पति-पत्नी के आपसी संबंध कैसे भी हों। अबकी बार यह रंजना नाम का कांटा बहुत ही बुरा फँसा था.. सुनीता के  गृहस्थ में। मदद तो सुनीता को इस काँटे को हटाने के लिये मिलनी मुश्किल थी.. सुनीता इस रंजना नाम के काँटे से कैसे जूझती है.. इसको जीवन से निकाल फेंकने के लिये.. क्या-क्या प्लान करती है.. आख़िर कहाँ से मदद  मिलती है.. सुनीता को!.. जानने के लिये पढ़ते रहिये.. खानदान।