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खानदान 40

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घर में गेट का डिज़ाइन सुनीता के सामने रोज़ रमेश के द्वारा दिखाया जाता था। रमेश गेट को लेकर काफ़ी सीरियस था। आख़िर एक दिन सुनीता ने पूछ ही लिया था,” किस के घर के लिये बन रहा है.. गेट!”।

“ अरे! वो अपनी है! न सेतू! बस! उन्हीं के लिये बना रहा हूँ। अरे! इतनी क्या पूछताछ कर रही है! हैं.. ग़रीब लोग हैं, बहुत सीधे-साधे.. भलाई में चलते हैं, सही का साथ देते हैं”। रमेश ने सुनीता से कहा था।

“ सीधे-साधे हैं!.. ग़रीब लोग हैं..  आख़िर क्या ड्रामा है! यह आदमी कब से लोगों की भलाई में चलने लग गया है.. समाज सेवा का नया नाटक!”। सुनीता को रमेश की बातें कुछ हज़म नहीं हो रहीं थीं.. “ चलो! खैर!”। सुनीता ने इस बात पर यहीँ विराम लगा इस बात पर ज़्यादा ज़ोर नहीं डाला था।

रामलालजी की फक्ट्री में अब कारपेंटर बाबू का लोहे का अच्छा-ख़ासा वज़नदार गेट बनना शुरू हो गया था। रमेश का पूरा दिमाग़ अब इस गेट की डिज़ाइनिंग में लगा हुआ था। फैक्ट्री के अन्दर किसी और का गेट बन रहा था.. इस बात की ख़बर अब दर्शनाजी द्वारा विनीत और रामलालजी को भी लग गई थी.. पर दोनों बाप-बेटा में से किसी ने भी कोई सवाल गेट को लेकर नहीं उठाया था.. क्या है!, किसका है.. वगरैह। समाज के सामने बनी हुई नई रिश्तेदारी से जुड़े हर मामले पर तो ये लोग पच्चीस तरह के सवाल उठाते थे.. और अब कोई भी उठाया-गिरा घर में घुस आया था.. उस पर तो जैसे कान पर जूं तक न रेंग रही थी। अजीब ही क़िस्म की नोटंकी पार्टी निकली… सुनीता ने मन ही मन सोचा था। “ रमेश ने मेरे घर वालों के लिये तो अभी तक कुछ भी न किया है”।

रमेश आराम से फैक्ट्री में गेट बनाने में बिजी हो गया था। घर में भी सब आराम से खुश थे.. गेट को लेकर रामलालजी जैसे पैसा प्रेमी परिवार ने मोल-भाव भी न किया था। अब गेट का बनना पूरा हो चुका था.. और सेतू के घर के द्वार पर रमेश द्वारा खुशी-खुशी गेट को लगवा दिया गया था।

सेतू सुनीता के दिमाग़ में पूरी तरह से घर कर गई थी। सेतु से संबंधित एक बार दर्शनाजी ने सुनीता को इशारा भी किया था,” कहीं रमेश पापे की तरह तो नहीं! पर आप अपनी जगह सही रहना!”।

दर्शनाजी ने रामलालजी की तरफ़ इशारा करते हुए सुनीता को समझाया था। दर्शनाजी का सुनीता को समझाना भी अजीब ही ढँग का ढोंग वाले तरीके से समझाना था.. दर्शनाजी की आँखों में सुनीता से बात करते वक्त एक अजीब सी शरारत झलक रही थी.. सब कुछ जानते हुए भी सुनीता के साथ एक अनजाना सा मज़ाक करने में लगी हुई थीं। आख़िर सेतू नाम के नाटक की रचियता दर्शनाजी ही तो थीं। समझदार लोग बच्चों को समझा-बुझा गलतफहमी दूर करते हैं.. और बच्चों का गृहस्थ बसाने में उनकी मदद करते हैं। पर यहाँ तो दर्शनाजी का मक़सद ही दूसरा था.. “ मेरा लड़का मस्तमौला घूमता रहेगा, और ये मेरे घर के काम करने के काम आएगी”।

आख़िर पैसे वाली पार्टी थे.. रामलालजी लोग!.. रमेश के शौक पूरे करने के लिये ही तो इतना कमा रखा था.. पिता ने.. ताकि उनका सुपुत्र अपना जीवनयापन आराम से बिना किसी परेशानी के कर सके।

सुनीता के दिमाग़ में सेतू नाम की कशमकश लगातार चल रही थी, और अब मायके जाने का वक्त भी हो आया था। सुनीता इस कश्मकश को अपने संग लेकर अब दिल्ली आ गई थी। सुनीता ने सेतू वाला क़िस्सा अनिताजी के आगे खोला था.. जिसे सुनकर अनिताजी ने सुनीता को सलाह दी थी,” कोई बात नहीं, करने दे जो कर रहा है! लेकिन तू आराम से रहना!”।

आराम से रहने का मतलब क्या था.. अनिताजी का सुनीता से इसका मतलब तो यह हुआ कि सब लोग” फिंगर ऑन योर लिप्स “ करके बैठो.. और एक आदमी है.. रमेश! जिसको कुछ भी करने का परमिट मिला हुआ है। वो कुछ भी कर सकता है.. जो उसकी मर्ज़ी.. बाकी सब बेवकूफों की तरह से आराम करो!। क्यों! आख़िर क्यों! ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाना भी उतनी ही बड़ी ग़लती होती है। अगर कोई समस्या है. तो उसका समाधान निकालना ज़रूरी हो जाता है.. नहीं तो फ़िर किसी भी बात को समस्या का नाम ही नहीं देना चाहिए।

चलो! माँ ने आराम से रहने के लिये कह दिया था.. तो आराम से ही हो गई थी.. सुनीता। पर उस आराम में अभी भी सुनीता के संग सेतू थी।

“ मैं उससे शादी कर लूँ क्या! “ रमेश ने सुनीता से पूछा था। किस से शादी करनी थी.. रमेश को.. क्या! और कहाँ! कह रहा था .. सुनीता से।