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खानदान 4

indian wedding


माँ व पिताजी ने सुनीता को सुबह से लेकर शाम तक कुछ भी न बताया था। शाम होते ही सुनीता की माँ ने सुनीता को कहते सुना था”अभी तो यह लोग अपने बेटे के लिये इस तरह की बात कर रहे हैं, कल को हमारी बिटिया को कुछ हो गया तो ये लोग सीधा ही मिठाई का डिब्बा हमारे यहाँ भिजवा देंगें”। यह बात सुनीता के बड़े भाई साहब सुनील जी के कानों में भी पड़ गई थी,घर के सभी लोग माँ बापू के चारों तरफ इठठा हो गए थे। सुनीता के घर की ख़ास बात यह थी,कि घर में कोई भी बात किसी भी विषय पर क्यों न हो किसी से भी छुपाई न जाती थी..सब के सामने खुल कर की जाती थी। रामलाल जी के फ़ोन पर हुए वार्तालाप को भी सभी के सामने खोल दिया गया था..घर की बड़ी बहू यानी के सुनीता भाभी ..सुनील जी पत्नी अनु भी शामिल थीं। पिताजी का कहना हुआ था,”आज जब में दफ़्तर में था,तो रामलालजी का इंदौर से मेरे लिए फ़ोन आया था, कहने लगे थे कि इस रमेश को घर से भगा दूँगा और हड्डी तुम्हारे गले पड़ जाएगी। पर मैं भी चुप न बैठा था,और इस बात का मैने भी मुहँ तोड़ जवाब दिया था… कहा कि ब्याह किया है,कोई मज़ाक नहीं एक-एक को सीधा कर दूँगा”। सभी लोग पिताजी की बातों को ध्यान से सुन रहे थे,कि बड़े भाईसाहब सुनीलजी ने पिताजी की बात ख़त्म होते ही कहा था,”मैंने तो आपसे पहले ही कहा था,लौट चलते हैं, यहाँ से पर आप न माने,यह लोग तो पहले दिन से ही नाटक बाज हैं”। सुनीता वहीं खड़ी सब सुन रही थी,सोच में पड़ गई थी,”कौन से नाटक की बात कर रहें हैं, ये लोग”। हाँ! एक वाक्या तो सुनीता को भी याद आया था,कि ब्याह से पहले इन लोगों ने कुण्डली पर थोड़ा सा नाटक किया था,पर यह कोई हैरानी वाली बात तो न थी, क्योंकि कुण्डली-शुण्डली के नाटक तो ब्याह से पहले घर-घर में होते रहते हैं। रमेश के घर वालों का ब्याह से पहले कहना था,कि लड़की यानी के सुनीता मंगली है,मांगलिक दोष होने के कारण सुनीता और रमेश का यह गठबंधन नहीं हो सकता। परन्तु सुनीता के पिताजी श्री मुकेश जी ने दिल्ली में किसी कुण्डली दरबार नामक संस्था से कुंडली बनवा कर व रामलाल जी को दिल्ली आमंत्रित कर पूरी तरह से संतुष्ट कर दिया था, कि लड़की का मांगलिक दोष लड़के के लिए हानिकारक सिद्ध नहीं होगा,बल्कि आगे चलके लड़की के भाग्य में धन योग तथा पुत्र योग दोंनो ही हैं। धन योग और पुत्र योग वाली बात सुनकर रामलाल जी खुश हो गए थे, और सुनीता का रिश्ता लेकर स्वयं ही दिल्ली आए थे, उनके संग और कोइ भी घर का सदस्य नहीं आया था। रामलाल जी जिन दिनों अपने सुपत्र रमेश का रिश्ता तय करने आये थे, वो महीना मार्च का आखिरी था,और नवरात्रे चल रहे थे, रामलाल जी एक छोटा सा शगुन सुनीता के हाथ पर रख मुकेश जी से रिश्ता पक्का करके चले गए थे। रमेश जी की कोई फोटो या फ़िर लड़का,लड़की का पहले मिलना यह कुछ भी न हुआ था। फ़ोन पर ही सुनीता और रमेश की गोद भराई पक्की कर दी गई थी। गोद भराई वाले दिन इंदौर से रमेश की माताजी दर्शना देवी और पिताजी रामलाल जी ही आये थे। अपनी गोद भराई वाले दिन सुनीता ने गोल्डन कलर का बहुत ही सुन्दर लहँगा पहना हुआ था,अच्छी प्यारी लग रही थी। गोद भराई की रस्म में मुकेशजी ने भी ज़्यादा मेहमानों को आमंत्रित न किया था,बस,उनके एक करीबी दोस्त और उनकी पत्नी ही शामिल हुए थे। जिस तरह के उद्योगपति होने की रामलाल जी की चर्चा थी,उस तरह की गोद भराई न हुई थी। गोद भराई में रमेश की माताजी ने ही दोनों लड़के व लड़की को अंगूठी पहनाई थी,न कि लड़का लड़की ने एक दूसरे को। गोद भराई की रस्म के बाद मेहमानों के जाने के बाद शाम के समय सुनीता के पास रमेश का फ़ोन आया था,फ़ोन पर रमेश सुनीता से पूछ बैठा था,”सॉरी! बुरा तो न लगा है, आपको मेरे माँ और बाबूजी का बर्ताव”। “नहीं, नही”कहकर सुनीता ने फ़ोन रखा था। किस बरतावे की बात कर रहे थे,रमेशजी। कुछ समझ न पा रही थी,सुनीता। फ़िर माँ, पिताजी और अपने भाई के मुहँ से ही सुना था, कि सुनीता की गोद में जो पाँच हज़ार रुपये रखे थे, उसका पाँच गुना ज्यादा माँग रहे थे, रामलाल जी के परिवार वाले। पिताजी ने पाँच गुना देने से बिल्कुल भी इनकार न किया था, और रामलाल जी के हाथ मे पूरे पच्चीस हजार रुपये पकड़ा दिये थे। बीस साल की उम्र में दुनिया दारी की बहुत ज़्यादा समझ न होती है, जिसमें की घर में खराब माहौल न देखा हो।खैर!इसमें मुकेशजी की भी कोई गलती नहीं कही जा सकती, क्योंकि उन्होंने अपनी बिटिया का रिश्ता एक उधोगपति परिवार में तय किया था, तो भई हो सकता था,कि पैसे वाले परिवारों में यह सब चलता हो। हर बाप अपनी बिटिया का हर तरह से सुख चाहता है,इसलिए मुकेशजी ने भी ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर जानते हुए कुछ फ़ैसले लिये।और फ़िर गोद भराई में पाँच गुना ज़्यादा लेना लड़के वालों की तरफ से कोई रिवाज़ भी तो हो सकता था। खैर ! गोद भराई तो अच्छी खासी हो ही गई थी,और रिश्ता पक्का होने के बाद दोनों ही परिवार खुश लग रहे थे, कोई ऐसी बात भी नज़र न आ रही थी।
अब सब लोग चुप-चाप खड़े थे,कि सुनीलजी ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा था,”इंदौर में जब हम सगाई के लिए पहुँचे थे,तब भी इन लोगों ने अजीब सा नाटक कर के दिखाया था”। अरे!हाँ! सुनीता को याद आया था, की सगाई पर जाने से पहले पिताजी की इंदौर वाले बाबूजी से बातचीत हुई थी,और उन्होंने पिताजी से केवल इतना कहा था, कि हमारे यहाँ हरियाणे में केवल पाँच ही लोग सगाई पर आते हैं। सो पिताजी घर के चुनिंदा पाँच सदस्यों के साथ ही दहेज में दी जाने वाली मारुति कार से दिल्ली से इंदौर तक गए थे। इंदौर से सगाई करके आने के बाद वो राज़ की बात पिताजी ने केवल माँ को ही बताई थी। क्या थी,वो राज़ की बात और क्या हुआ था,सगाई वाले दिन इस सारी बात का खुलासा सुनीता के भाई सुनील जी ने किया था, सुनील जी भी देखने में सुन्दर नोजवान थे..सुनीलजी मुहँ पर बोलने वालों में से थे,चाहे किसी को बुरा लगे या भला ।सुनील जी का कहना था, “सगाई वाले दिन जब हम इंदौर पहुँचे तो कोई तैयारी ही नहीं थी,जैसे के लड़के वालों की तरफ़ से होती है,देखकर ऐसा लग ही नहीं रहा था,कि इनके घर में कोई सगाई सिक्का भी है। रामलाल जी ने थोड़ा अजीब सा प्रर्दशन सगाई वाले दिन ज़रूर किया था”। माँ ने पिताजी की ओर देखा था.. अब पिताजी ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पूरी बात का खुलासा किया था,”सगाई वाले दिन हमे रामलालजी से यह उम्मीद न थी, हम तो अपनी तरह ही सोच रहे थे,पर तैयारी ही कोई नहीं थी,यह देखकर थोड़ी सी हैरानी ज़रूर हुई थी,साथ में तोर तरीके भी थोड़ा सा अजीब से ही लग रहे थे,खैर!मैंने रमेश को अलग से होटल के कमरे में बुलवाया था,और पूरी विस्तार से बातचीत भी की थी”। रमेश ने अपने परिवार वालों के बारे में सुन बस इतना ही कहा था,”अगर आप बगैर सगाई करे लौट गए तो में अपने आप को गोली मार लूँगा'”। और पिताजी का कहना हुआ था”मुझे रमेश की आँखों मे एक अजीब सी चमक दिखाई दी थी, लड़का शादी करना चाह रहा था, मैने लड़के यानी के रमेश की बातों और काबिलियत पर भरोसा करते हुए अकेले ही इस रिश्ते को करने का निर्णय लिया था, हालाँकि सुनील तो बार-बार लौटने की जिद्द कर रहा था, कह रहा था, पिताजी लौट चलते हैं, नाटक बाज लोग हैं ये। पर ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर जानते हुए और बिना किसी की बात सुने मेने ही यह रिश्ता करने का पक्का फैसला लिया था,जो केवल मेरा ही था”। पिताजी की पूरी बात खत्म होने के पष्चात माँ का कहना हुआ था,”क्या करते तेरे पिताजी..लगन हो चुका था,और ब्याह के कार्ड रिश्तेदारों में बंट चुके थे,इंदौर से लौट कर आना बहुत ही बड़ी बेइज़्ज़ती का काम था। एक बार सगाई टूट जाती तो कौन करता तुझसे ब्याह सगाई…हमारे समाज में यूँ सगाई टूटना लड़की के लिए बहुत ही बेइज़्ज़ती का काम है”। पिताजी ने कहा था,”बस,रमेश के कहने पर ही मैंने सगाई सिक्का कर दिया था, घर ग्रस्थ का सामान पूरा खरीदवाया था, और गाड़ी तो हम यहाँ से ले ही गये थे”। यह सगाई का क़िस्सा सबने खड़े होकर सुना था, पर कुछ न बोले थे,अभी सुनीता को रमेश का वयक्तित्व पूरी तरह से समझ न आ रहा था। सुनीता का मन कह रहा था, क्या अजीब नाटक और डॉयलोग बोलते हैं, रमेश के घर वाले समझ न आता है।
खैर!चलो कोई बात नहीं ब्याह शादी के मामले को लेकर अक्सर कई नाटक हो जाते हैं, और जहाँ संयुक्त परिवार हो वहाँ तो नाटक बनता ही है, क्योंकि कई तरह के लोग जो शामिल होते हैं। कोई बात नहीं सब अपने-अपने कामों में लग गए थे,और सुनीता आराम से अपने मायके में रहकर अपने आने वाले M.A की परीक्षा की तैयारी में लग गई थी। अब ससुराल जाने की बारी फ़िर से आ गई थी। माँ और पिताजी ने कई तरह का सामान रख बेटी को विदा करने की तैयारी कर ली थी। अगले दिन रमेशजी सुनीता को लेने आने वाले थे।
सुनीलजी रमेश को स्टेशन से घर लेकर आ गए थे। रमेश ने सुनीता को कमरे में बुला कर कहा था,”मुझे वैष्णो देवी तुम्हारे साथ घूमने जाना है,पर मेरे पास पैसे नहीं हैं”। यह सुनकर सुनीता एकदम हैरान रह गई थी, और बाकी सभी घर के सदस्यों के लिए हैरानी वाली बात ही थी..
‌फैक्ट्री वाला आदमी होकर बोलता है,पैसे नहीं हैं…. क्या अजीब बात थी,बेटे की शादी की थी, या फ़िर बेटी की जो कहता है..घर मे पैसे खत्म हो गए हैं।सुनीता के परिवार को यह बात बेहद खटक रही थी,”कमाल है, पैसे वाले घर का लड़का होकर हमारे घर आकर कह रहा है,मुझे वैष्णो देवी घूमनें जाना है,पर घर में पैसे नहीं हैं”। पता नहीं क्यों सुनीता ने इस बात का बिल्कुल भी विरोध न किया था, अजीब सा तो उसे भी लग रहा था..पर बोल नहीं रही थी। यह न बोलना और सही को सही न कहना या फ़िर हो रहे गलत का साथ देना,सुनीता की भी एक बहुत बड़ी कमज़ोरी थी। क्योंकि सुनीता के पिताजी दिल्ली आने से पहले फ़ौज में अफ़सर थे,इसलिए रमेश ने अपने ससुर साहब से सीधा प्रश्न पूछ ही लिया था,”आपके घर मे बंदूक तो होगी ही”। यह प्रश्न और घर से रुपये पैसे के बगैर ही चले आना सुनीता के पिताजी को और बड़े भाई-साहब को बेहद अखर गया था, और रमेश और उसके परिवार वालों पर बहुत बुरा ग़ुस्सा भी आया था, दोनों का कहना हुआ था,”कमरे में बंद करके सीधा करते हैं, इसे यह साधरण दिमाग़ का आदमी नहीं है,बहुत शातिर है”।मुकेशजी और सुनील जी ने रमेश को अपने घर यानी के सुनील की सगाई उन्होंने किस तरह से धूम-धाम से की थी, पर एक अच्छा लम्बा चौड़ा भाषण दिया था,कहा था,”हमारे यहाँ की सगाई देखते,उसे कहते है,सगाई ,जैसे आप के यहाँ दो लोगों को बुला कर अजीब ढँग से सगाई हुई है,वैसे थोड़े ही होती हैं, ब्याह के रीति-रिवाज़।हमारा लड़का सुनील जब अपनी ससुराल जयपुर जाता है,तो हम कार की टंकी पेट्रोल से फुल करवा कर और रुपये पैसे हाथ में देकर भेजते हैं”। सुनीता की माताजी अनिता जी बेहद सीधी दुनिया के चाल चलन से बेख़बर पूजा-पाठ वाली महिला थीं। तो बस, अपने देवी स्वरूप स्वाभाव के रहते अनिता जी मुकेश जी के आगे हाथ जोड़ कर खड़ी हो गईं और कहने लगीं थीं,”बेटी का घर मत बिगाड़ो,बस जाने दो इसे”। दोनों ही बाप और बेटा अनिता जी की बातों में आकर थोड़े कमज़ोर पड़ गए थे,सुनीता का अपना कोई निर्णय था,ही नहीं या तो बात समझ नहीं पा रही थी,या फ़िर रमेश की बातों में आकर बेवकूफ़ बन गयी थी। अगले दिन ब्याह से बचे हुए कुछ रुपये- पैसे मुकेशजी और अनितजी ने सुनील के हाथों में थमा कर कह दिया था,”जाओ सभी लोग वैष्णो देवी घूम आओ”।
रमेश खुश था, सुनीता का परिवार वाक्यई बेहद शरीफ़ था। कभी-कभी क्या होता है, कि सामने वाले का पता ही नहीं लगा सकते हो आप। पर एक बात ज़रूर होती है,कि होता वही है,जो मंजूरे खुदा होता है। हर निर्णय इंसान खुद नहीं ले सकता कुछ निर्णय उसे ऊपरवाले पर भी छोड़ देने चाहिएं।