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खानदान 35

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खैर! जो भी हो प्रहलाद दादी-दादा के लाड़ में दिन रोज़ बड़ा हो रहा था। अब क्योंकि रमेश दर्शनाजी का ख़ास था.. इस हिसाब से तो कहना चाहये कि प्रहलाद का लालन-पालन एकदम शाही ढँग से हो रहा था। फैक्ट्री में से रमेश कबाड़ा बेच कर रुपये-पैसों का इंतेज़ाम तो कर ही रहा था.. आमदनी के विषय में रमेश से सुनीता ने कभी पूछ-ताछ नहीं की थी। रमेश ने भी सुनीता के आगे कभी-भी घर में क्या काम होता है.. और किस तरह फ़िर आमदनी का बटवारा किया जाता है.. इस तरह की कोई भी बात सुनीता के आगे नहीं करी थी। जो आमदनी का रास्ता दर्शनाजी रमेश को दिखाती चल रहीं थीं.. उसी रस्ते पर रमेश चलता चल रहा था। अभी खाना-पीना और सभी कुछ शामिल था.. जो रामलालजी की तरफ से होता था। कहने का मतलब दर्शनाजी की ज़ुबानी यह हुआ करता था, कि” हरियाणे मैं  एक आदमी के हाथ में सारा खर्च -पानी होता है, वही सबको देता है”।

ख़र्चा-पानी से मतलब केवल दर्शनाजी उनके बेटों और पीते-पोतियों के ख़र्चे से था.. ख़र्चे में परिवार की बहुएँ शामिल नहीं थीं। बहुओं का खर्चा हरियाणे वालों में उनके मायके वाले ही चलाते हैं। बस! ससुराल वाले बहु को रोटी-पानी दे देते हैं.. क्योंकि वो तो सीधी सी बात है.. की मायके से सप्लाई नहीं हो सकता था.. नहीं तो दर्शनाजी जैसे लोग यह भी रिवाज़ पक्का लगा देते।

आमदनी ही तो घर बसाने का जरिया होती है.. जिसको लेकर उस घर में अपनी आमदनी और दूसरों की आमदनी को लेकर मुहँ खोलकर पता करना चाहये था। यदि आप किसी भी माहौल में कुछ भी विशेष महसूस कर रहे हो.. अपने लिये या फ़िर औरों को लेकर तो अपनी खुद की आवाज़ बिना डरे उठानी पड़ती है। अब सुनीता उस घर में पैसे को लेकर कुछ महसूस तो करती थी.. सुनीता का दिल कहता था,” इस घर में आमदनी का जरिया चोरी है”।

सुनीता के मन ने इस बात को बखूबी ढँग से भाँप लिया था.. कि रामलालजी के घर में आमदनी का जरिया उन्हीं की फैक्ट्री में चोरी है.. जो चोरी करने में प्रवीण है, उसी की बल्ले-बल्ले थी.. उस घर में। आपने कितना पैसा फैक्ट्री में खड़े होकर दबा लिया और फ़िर उस पैसे को किधर डाइवर्ट कर दिया इस मामले में विनीत और रमा हिसाब से ज़्यादा होशियार थे। पूरे घर में दोनों पति-पत्नी ने अपनी गरीबी का झण्डा लहरा रखा था। हालाँकि विनीत फैक्ट्री में अच्छा पैसा दबा रहा था.. पर जो सरकारी खर्चा-पानी रामलालजी घर में दे रहे थे.. उसी में दोनों विनीत और रमा और उनकी दोनों लड़कियाँ गुज़ारा कर रहे थे। विनीत फैक्ट्री में किस हिसाब से क्या कर रहा है.. यह रामलालजी बखूबी जानते थे.. पर अनजान बन कर कहीं पर विनीत के साथ थे। अब आदमी अपना कोई न कोई तो सहारा ढूंढता ही है.. रामलालजी ने विनीत और रमा को अपना सहारा दर्शनाजी और रमेश के ख़िलाफ़ चुन रखा था।

एक बेटा माँ के साथ था, तो दूसरा पिता के साथ था। बस! यूहीं सबकी गाड़ी घर में सबके अलग-अलग हिसाब से चल रही थी। इस चलती हुई गाड़ी में अब बच्चों के बीच भी रिश्तों ने नहीं राजनीति ने जगह ले ली थी। हालाँकि विनीत पैसों के मामले में बेहद तेज़ आदमी था, फ़िर भी रमा प्रहलाद की तुलना में अपनी दोनों लड़कियों की परवरिश से संतुष्ट नहीं थी। अब सुनीता प्रहलाद को अपने ढँग से पाल रही थी.. तो रमा को हर बार लगता ही था.. कि” काश! मैंने भी यही सब करके इनको पाला होता”।

अब मीना और टीना की परवरिश को लेकर अक्सर रमा दर्शनाजी से झगड़ा कर बैठती थी,” आपने हमनें बच्चों ख़ातिर कुछ भी न करने दिया!”।

रमा ने अपने निजी डर के कारण ही दर्शनाजी से ऊपर होकर कुछ भी न किया था.. अपने डर को ही अपनी सास के ऊपर मढ़े जा रही थी। अब यह थोड़ी ही दिखाना था.. विनीत और रमा को कि उनके पास भी पैसे हैं, नहीं तो सासु-माँ सब कुछ जानते हुए भी इन्क्वायरी बिठा सकतीं थीं। परिवार में कौन सा सदस्य कितने पानी में है, और क्या कर रहा है.. यह बड़ों को भली-भाँति पता होता है.. भले ही वे बोलें कुछ नहीं।

अब इधर इस परिवार में मामला बेहद पेचीदा था.. सबको सब कुछ पता होते हुए भी अनजान बने जा रहे हैं, और ही कोई नाटक चालू कर रखा है.. पता नहीं भई! जैसे ही पैसों की बात आया करती.. कोई न कोई दर्शनाजी धाँसू आईडिया निकाल ही लिया करती थीं। कुछ भी कहो दर्शनाजी का दिमाग़ तो नाटकों में कम्प्यूटर से भी तेज़ काम किया करता था।

समय बीत रहा था, प्रहलाद अब एक साल का होने वाला था.. जन्मदिन आ रहा था.. प्रहलाद का। मुकेशजी का सुनीता के पास फ़ोन आया था,” बेटा! प्रहलाद के जन्मदिन पर कैसे क्या करना है, अपनी अम्माजी से पूछ कर हमारे लिये जो हुक्म हो बता देना”।

सज्जन पुरुष थे.. मुकेशजी। अब प्रहलाद का पहला जन्मदिन था, और फैक्टरी वालों का पोता था.. तो नाना का अपनी बेटी व दामाद से पूछना बनता ही था.. आख़िर मुकेशजी भी हैसियत में कम थोड़े ही थे।

प्रहलाद का जन्मदिन किस धूम-धाम से रामलालजी के परिवार में मनाया जायेगा.. अब यह देखना था। अपने घर में आई पहले पोते की खुशी को किस तरह समाज के साथ बाटेंगे उद्योगपति श्री रामलालजी।