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खानदान 24

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दर्शनाजी प्रहलाद को गोद में लेकर” मेरा जीतू! हाय! मेरा जीतू कहकर रोने लगीं थीं”।

“इसने मुझे गोद दे देना आज से ये मेरा बेटा हो गया..हाय! जीतू!”।

दर्शनाजी के बार-बार जीतू पुकारते हुए रोने पर अनिताजी ने उन्हें चुप कराते हुए पूछ ही लिया था,” दीदी! अपने आप को संभालिये, चुप हो जाइये.. वैसे अगर आप बुरा न मानें तो यह जीतू है.. कौन!”। अनिताजी ने दर्शनाजी से पूछा था।

“ अरे! मेरा बेटा था! क्या बताऊं उसने तो भगवान के घर जान की जल्दी लाग री थी.. तो चला गया, और मने अकेला छोड़ गया”।

“ ओहो! यह तो बहुत बुरा हुआ आपके साथ!”। अनिताजी ने दर्शनाजी को सहानुभूति दर्शाते हुए कहा था। दर्शनाजी ने अपने आँसू पोंछ कर यह कहानी खुद ही शुरू कर दी थी..

“ तीन-तीन बेटे थे, मेरे.. लोग कहते थे, हाय! इसके तीन.. लोगों की हाय मेरे बेटे को ले गई। तीनों बाप-बेटा भाई लगा करते थे। कोई कहता ही नहीं था.. कि ये तीनों बाप और बेटे हैं। आख़िरी पेपर था, मेरे जीतू का.. पापा तो मना करे था.. कि ना जा हरियाणे.. पर कोनी मान्या.. जबरदस्ती ट्रैन में चढ़ गया था..”। और दर्शनाजी फूट-फूट कर रोने लगीं थीं। इतने में रमेश ऊपर के कमरे से नीचे आ गया था..

“ क्यों न रोवे है, फ़ालतू की बात कर-कर”। अपनी माँ से रमेश बोला था.. फ़ालतू में क्यों रोने लगी हुई है।

दर्शनाजी की अधूरी बात रमेश ने मुकेशजी और अन्य परिवार के सदस्यों के आगे पूरी की थी।

“ बात! यह है, कि हम तीन भाई थे, बापू आपको बताने ही वाला था, पर मैने ही मना कर दिया था। मैं सबसे छोटा हूँ, विनीत तो आपको पता ही है, कि सबसे बड़ा है। जीतेन्द्र हमारा बीच का भाई था। दअरसल हुआ यह कि, उसके बी .कॉम के पेपर चल रहे थे.. आख़िरी पेपर बचा था, हम सब हरियाणे शादी में गए हुए थे.. उसका भी हमारे साथ चलने का बहुत मन था, पर अपने इम्तेहान के कारण न चल सका था। जीतू का आख़िरी पेपर था.. बापू ने रोकने की बहुत कोशिश की थी, कहा था,” पेपर ख़त्म हो लेने दे, चला जाना”।

“ पर जीतन्द्रे ने बापू की एक भी न सुनी, और आख़िरी पेपर वाले दिन भरी ट्रैन में खड़े होकर हरियाणे पहुँच गया था। गाँव में तो आप जानते ही हैं, कि ब्याह शादी में लोग पीना-पिलाना कर देते हैं। बस! जीतू को भी किसी ने पिला दी होगी। नीचे घर के आँगन में शादी की तैयारियाँ हो रहीं थीं, जीतू छत पर खड़ा था.. पता नहीं किस ने धक्का दिया, और बस छत्त से नीचे सीधे ही घर के आँगन में आकर गिरा था। जीतू के रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी.. फ़ौरन उसे हमनें रोहतक अस्पताल दाख़िल करा दिया था.. बापू भी बैग भर कर नोट लेकर पहुँचा था. बापू डॉक्टर से कहने लगा,” मेरे लड़के के वज़न के बराबर पैसे रखवा ले, पर कुछ भी कर के इसे बचा ले”।

रमेश ने आगे बात पूरी करते हुए कहा था,” हमनें जीतू को रोकने की बहुत कोशिश की थी.. पर अफ़सोस! हम अपने भाई को बचा नहीं पाए.. दस बारह दिन अस्पताल में रखने के बाद वो हमें हमेशा के लिये छोड़ कर चला गया”।

“ सारे परिवार को जीतू के जाने का बेहद दुख था। गाँव में चाचा और दादी तो दीवार से सिर मार-मार कर रो रहे थे”।

वाकई रामलालजी के परिवार में यह बेहद दुखद घटना थी।

दर्शनाजी अपने अतीत और बेटे के ख्यालों में अभी भी खोई हुईं थीं। अनिताजी ने प्रहलाद को सुनीता की गोद में वापिस थमा दिया था.. और दर्शनाजी को संभालने में लग गईं थीं।

बीते हुए कल को लेकर आने वाली खुशी का स्वागत कुछ इस तरह से करना.. यह बात कुछ जमी न थी। माना दर्शनाजी को जीतू और अपने अतीत का बेहद दुख था, पर प्रहलाद तो अभी परिवार में नई खुशी थी। दर्शनाजी का चरित्र एक मायावी औरत के रूप।में सामने आ रहा था.. किस प्रकार की महिला है.. दुखी है! सुखी है! या फ़िर सही मायने में चाहती क्या है।

खैर! जो भी हो,अब दर्शनाजी और रमेश सुनीता को प्रहलाद की वजह से नानी के यहाँ ही छोड़ कर अब इंदौर वापस जाने को थे।

मुकेशजी ने एक बार फ़िर दोनों माँ बेटों की टिकट करवा दी थी। मुकेशजी का यूँ दरिया दिल होना कुछ समझ से बाहर की बात थी.. जिसका फ़ायदा आगे चलकर और आगे तक दोनों शातिर माँ बेटे उठाने को तैयार थे।

क्या इंदौर जाकर प्रहलाद के आगमन की तैयारियाँ की जायेंगी या फ़िर कोई और नाटक की प्लांनिंग होगी । दर्शनाजी का हरियाणे का नो मन का घाघरा पहन कर प्रहलाद के आने की खुशी में नाच-गाना होगा.. या फ़िर प्रहलाद का इंदौर आगमन एक नए नाटक को रामलालजी के परिवार में जन्म देगा।