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खानदान 19

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गर्भवती सुनीता इंदौर में अपना समय रमेश के साथ चुप-चाप बिताने लगी थी,अभी सुनीता के लिये सारे परिवार को समझना थोड़ा मुश्किल हो रहा था.. इस बार सुनीता को सारे परिवार के सदस्य अच्छे लगने लगे थे, बस! दर्शनाजी को छोड़कर। दर्शनाजी ने तो एक अजीब सा आतंक फैला रखा था, सारे घर में। रमा भी सुनीता को दर्शनाजी के ख़िलाफ़ करने में कम बिल्कुल भी न पड़ रही थी। दअरसल बात यह थी, कि हरियाणे में पहले वक्त की यानी के दर्शनाजी के टाइम की औरतों का मिज़ाज़ कुछ इसी तरह का हुआ करता था.. हरियाणे में बहुओं से ज़्यादा बेटियों की पूछ होती है, इस बात से रमा भली भाँति वाकिफ़ थी, पर सुनीता को सही बात समझाने की बजाय वह खुद भी दर्शनाजी को एक मोहरे की तरह ही इस्तेमाल कर रही थी। रमा और विनीत के अन्दर जो चल रहा था, उसका पता लगाना बेहद मुश्किल काम था.. जहाँ प्रॉपर्टी का मामला हो, और लोग बुद्धिहीन हों.. वहाँ बहुत मुश्किल हो जाता है। यहाँ बुद्धिहीन और गिरा हुआ दोनों ही खासियत थीं। बुद्धिहीनता तो एक हद तक समझी जा सकती है, पर जहाँ विचारों और नियत में गिरावट हो, वहाँ शराफत का टिक पाना मुश्किल हो जाता है। शराफत उस हद तक जा ही नहीं सकती, जहाँ गिरावट की पहुँच होती है। इंदौर में सभी पहुँचे हुए खिलाड़ी पहले से ही थे.. एक सुनीता को छोड़ कर।।रमेश भी अपने परिवार के साथ ही शामिल था।

गर्भ होने के कारण सुनीता के सीधे पैर में दर्द रहा करता था.

हुआ यूँ कि एक दिन फैक्टरी के काम से भिलाई से लोहा खरीदने की बात तय हुई थी.. पर भिलाई जाएगा कौन!

विनीत ने घर में चिल्ला कर कहा था,” यो चला जागा”।

विनीत का कहने का मतलब था, रमेश भिलाई लोहा खरीदने चला जायेगा। दर्शनाजी वहीं खड़ीं सब बातों में थीं, और रमेश भी पास में ही खड़ा था। रमेश ने भिलाई का नाम सुनकर कहा था,” मैं! मैं! कुकर जाएंगा”।

मतलब रमेश कहना चाहता था, वो भिलाई काम से नहीं जा सकता। दर्शनाजी ने तुरंत बेटे की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा था,”बहु के पैर में कितना दर्द रहे है, यो नहीं जा सकता”।

दर्शनाजी का कहना था, बहु के पैर में दर्द रहता है, इसलिये ये भिलाई काम से नहीं जा सकता। माँ बेटों की बात सुनकर विनीत ग़ुस्से में भड़क गया और बोला,” तेंतीस साल का हो रया से, इब कब काम करेगा”।

सुनीता वहीं कमरे के कोने में खड़ी हो सारी बातें ध्यान से सुन रही थी। विनीत का कहना था, कि रमेश तेंतीस साल का तो हो गया है, अब कब काम पर जाएगा।

बात सुनीता के पैर में दर्द रहता है, पर ही आकर ख़त्म हो गई थी, सुनीता ने इस बात को कि, रमेश काम पर क्यों नहीं गया..  क्यों पैर दर्द को मुद्दा बना काम पर जाने से साफ़-साफ़ बच गया, को बिल्कुल भी गहराई से न लेकर केवल बात को कानों में ही डाल कर रह गई थी।

ब्याह के बाद चाहे वो लड़की हो या फ़िर लड़का उसकी असल ज़िन्दगी की शुरुआत तभी होती है। पहले तो हम माँ-बाप की छत्र-छाया में होते हैं.. हमारी अपनी पहचान कहीं भी नहीं होती। ब्याह-शादी के बाद एक हम एक नई नींव और एक अलग पहचान का निर्माण करने जा रहे होते हैं.. जिसका लेना-देना सिर्फ़ और सिर्फ़ हम से ही होता है। हर बात का सही मतलब जो हम बोलते हैं, या फ़िर जो हम सुनते हैं.. यह बचपन की दहलीज़ पार कर और माँ -बाप के साये के नीचे से निकलकर ही सामने आता है।

रमेश ने काम पर जाने से क्यों इनकार कर दिया था, इस बात को हल्के से न लेकर सुनीता को इसकी सही वजह तक उसी वक्त पहुँचना चहिये था। बात को उसी वक्त पकड़ लेने में ही फायदा रहता है, नहीं तो छोटी सी बात बहुत बडा रूप ले लेती है, और मामला संभालना मुश्किल सा ही हो जाता है।

खैर! बात ख़त्म हो गई थी, और दोबारा से वही पारिवारिक नाटक शुरू हो गया था,” रमेश! या बिल्ली गेल बात करे है”।

दर्शनाजी का नियमत रूप से रमेश को यह बताना की सुनीता बिल्ली यानी के रमा से बात करती है, जारी था। हालाँकि सुनीता भी रमेश को समझा चुकी थी, कि” अम्माजी भी तो हँस-हँस के रमा से बात करती हैं, पहले उन्हें जाकर रोको”।

पर रमेश तो अपनी माँ का अंधा भक्त था, माँ के ख़िलाफ़ एक शब्द भी सुनने को तैयार न था। इसी बीच एक दिन दर्शनाजी रामलालजी के साथ कहीं बाहर बाज़ार करने निकल गईं थीं, जो वे अक्सर ही उनके साथ सेठानी की तरह से गाड़ी में बैठकर जाया करतीं थीं.. और जाती भी क्यों न, घर में गाड़ियों की कोई कमी थोड़ी थी। एक कार तो रमेश की ही थी, जो उसे दहेज में मुकेशजी ने दी थी, और दो कारें रामलालजी की अपनी थीं। जहाँ लक्ष्मी का वास होता है, वहाँ घमण्ड तो आ ही जाता है..  इस तरह से अगर सोचा जाय तो दर्शनाजी एकदम सही थीं।

सास-ससुर के जाने के बाद सुनीता ने सूजी का हलवा बनाया, जिसकी अनुमति वो दर्शनाजी से पहले ही माँग चुकी थी। हलवा वाकई तारीफ़ के काबिल बना था। सुनीता खाना वगरैह बनाने में शुरू से होशियार थी। सुनीता के मायके में भी माँ और नानी, मौसी सभी भोजन बनाने में उस्ताद थे, सुनीता ने भोजन बनाने में महारत विरासत में हासिल की थी।

सास-ससुर घूम कर वापिस आ गए थे, रामलालजी का स्वभाव बहुत अच्छा था, किसी मामले में दर्शनाजी से बेहतर थे, सुनीता को बाबूजी का बात करने का सलीका और स्वभाव अभी तक पसन्द आ रहा था। पढ़े-लिखे होने से इंसान के विचारों और स्वभाव में फर्क पड़ता ही है.. अब रामलालजी उस वक्त के पढ़े-लिखे इंजीनयर थे, तो स्वाभाविक ही उनका बाकी के परिवार के सदस्यों से भिन्न होना बनता ही था।

बाज़ार से आते ही रामलालजी सूजी का हलवा बना हुआ देखकर बहुत खुश हो गए थे, फटाफट कुर्सी सरका हलवे की कटोरी भर ली थी।” भई! वाह! ये हलवा किसने बनाया है, भइया! हमें भी बताओ”।

रामलालजी अक्सर घर में सभी को “भइया” कहकर ही संबोधित किया करते थे। बाबूजी के मुहँ से हलवे की तारीफ़ सुन सुनीता बहुत खुश हो गई थी.. तभी दर्शनाजी ने पतिदेव के पास आकर हलवे का डब्बा खोलते ही कहा था,” ये कोई हलवा है, ऐसा खिला हुआ थोड़े ही होता है, हलवा! घी डाल इसमें और”।

“ ये लो भईया! थोड़ा सा बटर डाल दो” पास खड़े रामलालजी ने कहा था।

रमेश भी वहीं बैठकर हलवे का आनंद ले रहा था, पर उसनें अपनी माँ को हलवे के लिये एक बार भी न टोका। यह बात सुनीता को बहुत बुरी लगी थी।

“ आपने अम्माजी के सामने हलवे को लेकर कुछ बोला क्यों नहीं, मेरी बिल्कुल भी साइड नहीं ली थी, आपने। उस दिन भी जब अम्माजी साड़ी की कोई बात कर रहीं थीं, तब भी आप बिलकुल न बोले.. आप मुझे सपोर्ट नहीं देते हो”। सुनीता ने रमेश को कमरे में अकेला पा यह सब बोला था।

हलवा तो बहुत ही बढ़िया बना था, फ़िर दर्शनाजी ने हलवे को लेकर यह छोटा सा नाटक क्यों किया था। सुनीता समझ न पायी थी। इसलिए सुनीता ने हलवे वाली बात रमा के आगे चलाकर देखी थी, रमा तो हर वक्त सुनीता को दर्शनाजी के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ बताने को तैयार बैठी रहती थी।

“ हमनें तो ऐसा ही बनाना सीखा है, अम्माजी” रमा ने सुनीता को सिखाया था, ऐसे बोल देना.. अम्माजी को।

वैसे दर्शनाजी भी एक बात को लेकर हिसाब से ज़्यादा ही पीछे पड़ जाया करतीं थीं। रमा की दोनों बेटियाँ तो बचपन से ही दादी को देख रहीं थीं, हलवे का नाटक देखते हुए रमा की बड़ी बेटी ने अपनी चाची से कहा था,” बड़ी मम्मी जलती बहुत है”।

बात तो एकदम सही थी, दर्शनाजी अपने आप को सास न समझ कर दोनों बहुओं की जेठानी समझा करती थी। खाना तो सुनीता अच्छा बनाती ही थी, पर दर्शनाजी सुनीता के खुद से बेहतर भोजन पकाने को लेकर थोड़ा चिढ़ जाया करतीं थीं। वैसे औरतों में एक दूसरे को लेकर जलन तो हर जगह ही होती है.. यह कोई नई बात न है।

इन्हीं दिनों की बात थी.. सभी एकसाथ हॉल में बैठकर टेलीविज़न का आनन्द ले रहे थे, तभी न जाने क्या हुआ कि सुनीता से पानी का गिलास छूटकर नीचे गिर गया था.. जिस पर दर्शनाजी अकड़ कर बोलीं थीं,” गोबर खा रख्या से के”।

अब हरियाणे की बोली में गँवार पने का होना तो स्वाभाविक ही था, पर सुनीता इस बात को समझने की बजाय दर्शनाजी पर ग़ुस्से में लाल-पीली हो जाया करती थी। सुनीता का यूँ बात को समझने की बजाय ग़ुस्से में लाल-पीले होने का सीधा फ़ायदा रमा उठा रही थी। अब रमा को दर्शनाजी के ख़िलाफ़ करना बहुत आसान था। वैसे तो दर्शनाजी खुद भी कोई कमी न छोड़ रही थी.. भड़काने को ज़रूरत भी न थी।

सुनीता का गर्भ सातवें महीने का था.. अनिताजी ने सुनीता को मायके में आकर ही नए जीवन को जन्म देने के लिये आमंत्रित किया था.. यह बात सुनीता ने रमेश के कानों में डाल दी थी। दर्शनाजी ने एक बार भी सुनीता को मायके जाने से मना न किया। झूठे को भी यह न बोल था, कि,” नहीं! नहीं! यह तो हमारी जिम्मेदारी है, मायके क्यों जाना चाहती हो!”।

बल्कि दर्शनाजी तो सुनीता के दिल्ली जाने की ख़बर से खुश हो गईं थीं।” चलो! अच्छा है, खर्चा बचेगा”।

दादियों वाली कोई बात ही न नज़र आया करती थी, दर्शनाजी के अन्दर। एक बात और दादी शब्द से तो बड़ी ही चिढ़ थी.. दर्शनाजी को। कहतीं थीं,” कोई दादी-वादी नहीं, मुझे बडी मम्मी कहकर बुलाया करो”।

खैर ! बहुत से परिवारों में हमनें दादी को मम्मी कहते सुना है.. कोई नई बात न है।

पर रामलालजी एकदम साधारण और सीधे आदमी थे, और अपने-आप को “ दादू” कहलवाकर ही खुश थे।

सुनीता नए जीवन को जन्म देने अब दिल्ली माँ के पास जाने को तैयार थी.. कौन सा या फ़िर कौन सी नई सदस्या परिवार में शामिल होगा या फ़िर होगी। रामलाल विला में किस प्रकार स्वागत किया जाएगा आने वाले नए जीवन का।