Posted on

खानदान 17

indian wedding

अब रमेश वो सौ रुपये वाली बात सुनीता के कानों में डाल दोनों बहन-भाई के साथ घर पहुँच गया था। घर पहुँचने के बाद ऊपर वाले कमरे में जाकर… ऊपर वाला कमरा यानी के मुकेशजी का दिल्ली में फ्लैट हुआ करता था, अब दिल्ली जैसी जगह पर कोठी खरीदनी कोई आसान थोड़ी ही है। उस टाइम का डुप्लेक्स फ्लैट था, मुकेशजी के पास। अब जब भी रमेश दिल्ली आया करता था, तो उसे हमेशा से ही ऊपर वाला कमरा ही दिया जाता था.. जो विवाह से पहले सुनीता और उसके छोटे भाई बबलू का होता था। क्योंकि बबलू अभी अविवाहित था, इसीलिए दामाद जी सुनीता के साथ उस कमरे में आराम से रुक जाया करते थे। रमेश ने सुनीता को ऊपर वाले कमरे में जाकर एक छोटी सी गड्डी नोटों की दिखाई थी। सुनीता ने हैरान होकर पूछा था,” अभी स्टेशन पर तो आपने बताया था, कि मेरे पास सौ ही रुपये हैं.. फ़िर ये..”।

रमेश ने मुस्कुराते हुए,” बस! दिमाग़ का खेल है”।

सुनीता ने रमेश के पास ये रुपये कहाँ से आये थे, पर कोई ख़ास विचार न किया था, बस! उन रूपयों को देखकर ही रह गई थी, और फ़िर भूल गई थी। शुरू-शुरू में रमेश बिना पैसों के घर आया था… के जी घर में तो पैसे ही ख़त्म हो गए है.. घर में रमेश के परिवार के नाटक का मैन मुद्दा पैसा ही तो था। पैसे को लेकर ही तो हर किरदार अपना रोल निभा रहा था। फ़िर सुनीता को नोटों की गड्डी देखकर थोड़ा सा सोच-विचार तो कर ही लेना चाहिये था। खैर! अभी उम्र कम थी, कोई बात नहीं। और परवरिश के हिसाब से भी अभी सुनीता की सोच रमेश की सोच को मैच नहीं कर पा रही थी। रमेश दिमाग़ का शुरू से ही शातिर और एकदम परफेक्ट नाटककार था, होता भी क्यों न, खानदानी असर तो आता ही है।

अनिताजी ने अपने दामाद के स्वागत की ख़ास तैयारी कर रखी थी, कई तरह के भोजन से मेज सजा दी गई थी.. और रमेश पूरे परिवार के सदस्यों के साथ भोजन के लिए विराजमान हो गया था। यह रमेश का पहला अवसर था, जो वह सभी घर के सदस्यों के साथ ससुराल में भोजन के लिए शामिल हुआ था.. यह क्या खाने की टेबल पर,” अरे! यह क्या! है, मटर तो कच्ची है, और छोले ऐसे थोड़े ही बनाये जाते हैं”। खाने की मेज पर बैठकर इस तरह से पेश आना सबको बहुत ही अखर रहा था। सभी घर के सदस्य रमेश के इस तरह के बर्ताव से एक दूसरे का मुहँ देख रहे थे.. पर अब दामाद जी को टोक तो सकते नहीं थे। खैर! उनकी किसी भी बात का जवाब न देते हुए केवल इतना ही कहा था,” आपको जो भी पसन्द आ रहा है, आप वो ही खा लीजिये नहीं तो आपके लिये कुछ और बन जायेगा”। और सब बात को ख़त्म करने के लिए एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिये थे। और रमेश की बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था। सुनीता को इसी खाने को लेकर रमेश की इंदौर में कही हुई एक बात और भी याद आ गई थी,” कोई खाना बना रखा था, गोद भराई पर आधा तो कच्चा पड़ा था”।

“इस तरह से बकवास की जाती है, क्या! खुद के घर में तो वो ही अजीब सी मूँग की पीली दाल और मोटे चावल, और यहाँ बात करने तक की अक्ल नहीं है”। मन ही मन सोच रही थी, सुनीता।

मुकेशजी ने अपना फ्लैट बहुत ही सुन्दर ढँग से सजा रखा था। दीवारों पर खूबसूरत पैटिंग्स कोनों में रखे खूबसूरत अलग-अलग रंग के लैंप शेड और कुछ अन्दर सुन्दर गमलों में रखे हुए खूबसूरत से पौधे जो उनके पूरे फ्लैट की शोभा बढ़ा रहे थे। ऊपर सीढ़ियों से जाते ही एक पुस्तकों से भरी सुसज्जित लाइब्रेरी भी बना रखी था, जहाँ हर तरह की पुस्तक आपको रखी हुई मिल जाती थी। वाकई में मुकेशजी के फ्लैट में घुसते ही नज़र ठहरा करती थी, लोग अक्सर कुछ न कुछ फ्लैट की सजावट का कॉपी कर अपने घर ले जाया करते थे। रमेश ने भी सुनीता के मायके में रखे हुए लैंप शेड की कॉपी कर अपने इंदौर में अपने और सुनीता के कमरे में रखने के लिये फैक्ट्री में एक लोहे का लैंप बनाया था.. जिसका जिक्र रामलालजी ने भी सुनीता के माँ-बापू के आगे किया था, जब वे दिल्ली अपने लड़के रमेश की शिकायतों का पिटारा लेकर आये थे।

इस बार रमेश का इरादा दिल्ली आकर हरियाणे अपने गाँव घूम कर आने का भी था। तो बस! फ़िर रमेश ने सुनीता के आगे हरियाणे जाने का जिक्र किया और कहा था,” पिताजी से कहकर मुझे कार दिलवा देना, और तुम भी मेरे साथ चलना.. अपना गाँव दिखाकर लाना है”।

अच्छे बिसनेस मैन थे, मुकेशजी और घर में कोई कमी भी न थी, तो रमेश और सुनीता को शाम को हरियाणे जाने के लिये कार की चाबी आसानी से दे दी थी। अब दामादों को मना थोड़े ही किया जाता है, दामाद तो अपनी ससुराल में राजा समान होता है, हर कोई अपने दामाद की ऊपर से नीचे तक महाराजों की तरह ही ख़ातिरदारी करते है।

अब शाम होते ही सुनीता रमेश के साथ अच्छे ढँग से तैयार होकर अपनी सही ससुराल यानी अपने ससुर श्री रामलालजी के गाँव जाने के लिए कार से रवाना हो गई थी। दिल्ली से रामलालजी का गाँव ज़्यादा दूरी पर न है.. बस! दो ही घन्टे का रास्ता था। सुनीता का रमेश के साथ गाड़ी में अच्छा समय बीता था, पर फ़िर रमेश आदत अनुसार सुनीता से एक और झूठ बोल बैठा था,” ये हरियाणे की भाषा मुझे आती थोड़े ही है.. बस! यूहीं टूटी-फूटी बोल लिया करता हूँ”।

अब दोनों हरियाणे पहुँच गये थे,” अरे! यह रमेश तो फटाफट-फटाफट हरयाणवी में बात किये जा रहा है, जैसे यह लोग कर रहे हैं”।

“ इसका मतलब बात-बात पर झूठ बोलता है, जो है, ही नहीं वो दिखाने की कोशिश आख़िर क्यों कर रहा है,रमेश”।

सुनीता ने गाँव की चारपाई पर दर्शनाजी की बहन के घर बैठे कर सोचा था। क्योंकि रमेश पहले सुनीता को अपनी मौसी के घर ही मिलवाने के लिए ले गया था.. अपनी माँ और सुना था, दर्शनाजी की बातों में कि,” हमेशा मौसी के घर ही जाता रहा है, रमेश को तो नानी ने ही पाल-पनास कर बड़ा किया है”।

“ अपने दादा के घर तो झाँके भी नहीं”। दर्शनाजी का कहना हुआ था।

रमेश का सुनीता से बार-बार झूठ बोलना, किसी न किसी बात को लेकर क्या दर्शा रहा था। असल मायने में सुनीता पढ़े-लिखे और संस्कारी परिवार की लडक़ी थी,और हर मायने में थोड़ा सा रमेश से आगे ही थी.. रमेश इस बात को भली भाँति भाँप गया था, इसिलए अपने आप को कम न दिखाना चाहता था, चाहे उसके लिए उसे झूठ का सहारा भी क्यों न लेना पड़े। वो कहते हैं, न अँग्रेज़ी में कॉम्प्लेक्स का शिकार शायद वही कुछ था, रमेश के व्यक्तित्व के साथ।

सुनीता को रमेश ने गाँव में सबसे मिलवाया था.. नानी और अपने दादा के घर के सभी सदस्यों से सुनीता का मिलना हुआ था। और एक ख़ास बात और यह थी, कि सुनीता रमेश की दादी से भी मिली थी, जो उस वक्त करीबन नबह वर्ष के आसपास की थीं। दादीजी से मिलकर और रामलालजी के पूरे परिवार से मिलकर सुनीता को बेहद अच्छा लगा था, पर हरियाणे का गाँव देखकर और वहाँ का मोटा खान-पान और अजीब से घरों को देख इस बार सुनीता ने अपने नानी व दादा के घर से तुलना कर डाली थी,” हमारे यहाँ के गाँव तो देखने लायक हैं, और नानी और दादी के घर तो कितना मज़ा आया करता था, हमें जब कभी भी छुट्टियों में हम जाया करते थे। हमारी नानी और पिताजी के गाँव के घर इतने अच्छे होते थे, लगता ही नहीं था.. कि किसी गाँव में हैं, हम। पर यहाँ तो भई! वहीं भैंस बँधी है, वहीं चारपाई पर पीने के लिये दूध का गिलास पकड़ा दिया है.. उफ्फ!”।

अब हरियाणे में खाते-पीते किसान हैं, पर थोड़ा मोटा-पन तो है ही।सुनीता का पाला कभी हरियाणे के गाँव से तो पड़ा न था, इसलिए उसे ऐसा लग रहा था।

सब से मिलकर सुनीता और रमेश हँसी-खुशी घर आ गए थे। सुनीता अपने साथ हरियाणे से यादों की एक छाप संग लेकर आई थी। यह यादें सुनीता अपने संग रमेश के साथ इंदौर लेकर जाने वाली थी। सुनीता हरियाणे में दर्शनाजी की सास व देवरानी और ननद से और उनकी बहनों से मिली थी, जिसका उनको बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था। यह सब जानने के बाद किस तरह से पेश आएँगी दर्शनाजी सुनीता के साथ, और इस गाँव जाने को लेकर रमा आगे की क्या प्लानिंग कर डालेगी।