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कानू और रेल

rail road tracks

छुक-छुक करती आई रेल,

उसमें बैठीं कानू बेन!

बच्चों के इम्तेहान आने वाले हैं.. यहाँ भोपाल में पढ़ाई का आख़िरी महीना चल रहा है। आख़िरी महीने में ही इम्तेहान शुरू होने से पहले यहाँ के स्कूलों में बच्चों को पिकनिक वगरैह ले जाया जाता हैं। सो हमारी भी बिटिया स्कूल की तरफ से भोपाल के एम्यूजमेंट पार्क फन-सिटी स्कूल की तरफ़ से पिकनिक गई थी। फन- सिटी में बच्चों के मतलब के झूले और कई तरह के आकर्षित करने वाले और भी खेल हैं। बिटिया ने फन-सिटी में पूरी तरह से एन्जॉय किया, और घर आकर हमें भी अपने एन्जॉयमेंट का क़िस्सा सुनाया था। जब बिटिया हमें अपने पिकनिक पर झूलों और बाकी के क़िस्से सुना रही थी.. हमारी छोटी बिटिया यानी रानी बेटी कानू भी हमारे साथ बैठकर अपनी दीदी की पूरी बातचीत का आनन्द ले रही थी। अब हम तो कानू को भी अपनी छोटी बेटी और हमारे बच्चों की छोटी बहन ही मानते हैं, अब देखा जाए तो कानू है, तो कुत्ता ही..  पर हम तो दुनिया वालों से साफ-साफ कहे देते हैं,” हमें क्या पता, हम क्या जानते हैं, कुत्ते के बारे में, हमारे पास तो कोई कुत्ता है, ही नहीं.. कानू तो हमारी छोटी वाली बिटिया है”।

कानू अपनी दीदी की ज़ुबानी झूलों की कहानी बड़े ही चाव से अपने पेपर कटिंग जैसे मुड़े हुए कान हिला-हिला कर सुन रही थी.. और अपनी अंगूर जैसी सुन्दर प्यारी सी आँखे हमारी आँखों में डालकर कह रही थी,” हम भी झूले वाले पार्क में जाना चाहते हैं.. माँ! और हाँ! वो बच्चों वाली ट्रेन होती है, न उसमें भी बैठेंगें”।

अब सारे दिन घर में झूलों की बातें ही चल रहीं थीं, और क़ानू भी झूलों की बातों में हम सब के साथ ही शामिल थी। शाम का समय हर रोज़ की तरह ही हो गया था.. और हम नन्ही और प्यारी सी कानू को चैन और पट्टा लगाकर बाहर लेकर निकल गए थे। क़ानू को हम सड़क पर घुमाते-घुमाते अपने कॉलोनी के पार्क के सामने आ खड़े हुए थे.. “ अरे! यह क्या! वाह! ये तो गज़ब का पार्क बन रहा है”।

हम पार्क में आये बदलाव को देखकर कानू को लेकर वहीं पर खड़े ही गए थे। पार्क के अन्दर काम कर रहे ठेकेदार से हमनें पूछा था,” भइया! ये इतने महँगे झूले और ये बच्चों के ट्रैन वगरैह! इतना पैसा कहाँ से आया और किसने दिया!”।

ठेकेदार ने हमारी बात का जवाब ज़रा ऊँची आवाज़ में देते हुए कहा था, क्योंकि वो पार्क के अन्दर था, और हम बाहर खड़े थे।  

“ बहनजी जो दो-तीन सालों से प्रेजिडेंट साहब के पास पैसा जमा हो रहा है.. ये सब झूले और बच्चों की ट्रेन उसी फण्ड का कमाल है”।

“ चलो! अच्छा है!”। हमें भी खुशी हुई थी, अब हाथ मे तो हम हमेशा अपना मोबाइल फोन लेकर निकलते ही हैं, तो हमनें झट्ट से कॉलोनी के प्रेजिडेंट साहब को फ़ोन लगा डाला था। और उनसे पार्क में होने वाले बदलाव और नए झूलों व ट्रैन की चर्चा करी थी.. प्रेजिडेंट साहब ने हमारी बात सुन फ़ोन पर हमसे कहा था,” अरे! हाँ! भाभी! आप लोग भोपाल में नहीं थे, उन्हीं दिनों हमनें यह प्लान बनाया था, कि हमारे बच्चों को पिकनिक वगरैह मनाने फन-सिटी जैसे पार्कों में दूर जाना पड़ता है.. तो क्यों न घर के पास वाले पार्क को ही फन- सिटी जैसा बना दिया जाए”।

हमें फोन पर प्रेजिडेंट साहब का आईडिया बहुत अच्छा लगा था, हमनें घर आकर पार्क में लग रहे नए झूलों और ट्रेन के बारे में बताया तो बच्चे खुशी से उछल पड़े थे,” हुर्रे! अब हम अपने ही पार्क में मज़े करेंगें और दूर जाने की भी ज़रूरत नहीं है”।

गिने दिनों भीतर हमारे पास पार्क में नए झूले व बच्चों वाली ट्रेन लगने की खुशी में छोटे से इनॉग्रशन का निमंत्रण आया था, प्रोग्राम वही शाम को क़ानू के घुमाने के समय का था। बस! तो हम भी अपनी प्यारी कानू को चैन और पट्टा बाँध बच्चों सहित लेकर पार्क में पहुँच गए थे। बच्चों को पार्क में लगी नई वाली ट्रेन बहुत ही अच्छी लग रही थी, सभी कॉलोनी के बच्चे ट्रैन में पहले से ही बैठ चुके थे, ट्रैन ट्रायल के लिये चलने ही वाली थी, कि हमारे बच्चे भी ट्रेन में बैठ लिये थे.. हम अभी कानू को लिये पार्क के बाहर ही खड़े थे.. कि कानू ने भी ज़ोर-ज़ोर से भौंकना शुरू कर दिया था.. और अपना पट्टा खींच पार्क की तरफ़ बढ़ने लगी थी। हमें क़ानू का इशारा और बात समझ में आ गई थी.. हमनें आँव देखा न तांव और कौन क्या कहेगा.. यह भी न सोचा.. तुरन्त ही अपनी कानू-मानू को लेकर ट्रैन में सवार ही गए थे। हमारे ट्रैन में चढ़ते ही ट्रेन चल पड़ी थी.. बच्चों ने क़ानू को ट्रेन में देखते ही शोर मचा दिया था,” उतारो! नीचे! आँटी.. काट लेगी”।

हमनें मुहँ पर उँगली रख हाथ के इशारे से समझाया था,” हम हैं, तो सही! आराम से बैठो! कुछ भी न बोलेगी”।

हम कानू को लिये झट्ट से खिड़की वाली सीट पर जा बैठे थे। कानू अपनी फ्लॉवर जैसी पूँछ हिला और अपनी पिंक कलर की जीभ साइड में लटका छुक-छुक गाड़ी का खूब आनंद ले रही थी। हम भी क़ानू-मानू को अपने साथ रेल गाड़ी में चिपका कर अपने गले से लगा कर बिठा.. कानू और छुक-छुक गाड़ी दोनों के ही मज़े ले रहे थे.. और बच्चों संग बच्चा बने बैठे थे। अब पार्क के दो राउंड मार कर हमारी छुक-छुक गाड़ी रुक गई थी। सभी बच्चे और हम कानू को लिये नीचे उतर गए थे।

पार्क के इनॉग्रशन के लिये कॉलोनी के ज़्यादातर सभी लोग थे, और क़ानू भी अधिकतर आस-पड़ोसियों को जानती ही थी.. और फ़िर छुक-छुक गाड़ी में बैठने के बाद हमारी कानू खुश थी, और खेलने के मूड में होने के कारण ज़्यादा न भौंकी थी। हमारे जानकार मित्र ने हमें कह ही दिया था,” हम जानते थे, भाभी कुछ भी करके अपनी छोटी रानी गुड़िया क़ानू को रेल की सवारी करा ही देंगीं”।

मित्र की बात पर हम मुस्कुराए बगैर न रह पाए थे। और क़ानू को बच्चों के संग घर भेज दिया था। यूँहीं कानू के साथ छुक-छुक रेल गाड़ी में सफ़र करते और नए-नए स्टेशनों का आनन्द लेते एक बार फ़िर हम सब चल पड़े थे.. प्यारी कानू के साथ।