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जीवन – ये रहस्य ?

jivan ye rahasy
जीवन -
होठों पर धरा मुस्कान का  बबूला 
गरूब होते  सूरज में डूबते ऊंटों के काफिले 
निरभ्र आकाश से टपकते आशाओं के आंसू 
पलांश के लिए जमती एक बूँद -
और फिर ....
उस बूँद को पिघलाते -दंश....यातनाबोध ....-
गुलगुलाती  खुशिओं से पैदा हुई उमस -
पाने-खोने  के अनंत लगनेवाले सिलसिले -
पसीने से पैदा हुए पार्थिव परिणाम !
आँख की किरकिरी की तरह गायब हो जाते हैं -
न जाने कहाँ ....?
जीवन - में ही जीवन तिरोहित हो जाता है -
न जाने कहाँ ...? कैसे ...?
क्या तुम जानती हो , मेरी जीवट  ....!!
ये रहस्य ....?
- कृपाल