परोपकारी नीम के पेड़ की गहन छाया में मैं आ बैठा हूँ!

गुणों की खान इस पेड़ से मेरा गहरा रिश्ता है, मेल मिलाप है और हम दोनों सहोदर हैं। देना और देते ही रहने का तो आनंद ही अलग है। हम दोनों में होड़ लगी है कि कौन कितना दे और कम से कम ले।

जीतेगा तो यही – मैं जानता हूँ।

वो देखो। चिड़िया और चिरौटा कितने व्यस्त हैं। पेड़ के ऊपर घोंसला बना रहे हैं। इन्होंने पेड़ से पूछा तक नहीं है लेकिन पेड़ ने इन्हें रोका तक नहीं है। घोंसला बनाना उनकी जरूरत है ये नीम का पेड़ जानता है और मानता भी है कि उसे उन्हें रोकना टोकना नहीं चाहिये।

“ये कौन बकवास है जी?” मैं अचानक कई धारदार आवाजें सुनने लगता हूँ। “ये कौन हैं जो मकान बना रहे हैं ..?” एक प्रश्न था जिसे सुन कर मैं और गुलनार पुलिस वालों के सामने मुजरिमों की तरह आ खड़े हुए थे। “परमीशन ली है ..?” उनका अगला प्रश्न था।

लो जी, हो गया खेल!

दुकान के पीछे खाली पड़ी जमीन पर हमने बहिन जी से पूछ कर घर बनाना आरम्भ किया था।

ठीक चिरोटे की तरह मैं भी भाग भाग कर तिनके उठा उठा कर ला रहा था और गुलनार उन्हें पिरो कर और संजो कर घोंसला बना रही थी। हम दोनों अपना घर बनाने में तल्लीन थे। तभी हमें पुलिस ने आ कर रोक दिया था।

“मैं .. मैं .. मॉं बनने वाली हूँ!” फिर मैं गुलनार की आवाजें सुनने लगा था।

गुलनार की आंखों में एक विचित्र लज्जा के विस्तार मैंने पहली बार देखे थे। मेरी समझ में ही न आया था कि मैं क्या कहता और ..

“त त .. तो?” हकलाते हुए मैंने गुलनार से ही पूछा था।

“घर ..?”

“क्या ..! घर .. क्या?”

“बच्चा होगा तो ..!” गुलनार बता रही थी। “और भी बच्चे होंगे! परिवार तो बनेगा ही। घर तो चाहिये?” कहती ही रही थी गुलनार।

और अब तो मैं भी जानता था कि घोंसला बनाते ही अंडे देगी चिड़िया और .. इनका भी परिवार बनेगा! लेकिन इनके दरवाजे कोई पुलिस नहीं पहुँचेगी। और इस घोंसले का परम सुख इन्हें प्राप्त होगा क्योंकि मेरा ये मित्र नीम का पेड़ इन्हें ठंडी छाया बांटेगा, सुरक्षा भी देगा, वर्षा तूफान में भी सहारा देगा और इनकी गृहस्ति बसेगी जहां सुख कर साम्राज्य होगा।

“धड़ाम ..!” अचानक ही एक जोर का धमाका हुआ है!

चिड़िया चिरौटा दोनों पंख पसार कर भागे हैं, उड़ गये हैं ओर अलोप हो गये हैं – न जाने कहां?

“आ गई पुलिस!” मैं जोरों से हंस पड़ा हूँ। “ऐसा कैसे हो सकता है कि आप कोई शुभ काम करें और व्यवधान न आये?” मैंने विचार को पूरा किया है।

आंख उठा कर देखता हूँ तो आश्रम में आई बस का टायर फटा था और वा जोर का धमाका हुआ था। लेकिन ये चिड़िया चिरौटा मेरे और गुलनार के बराबर बहादुर नहीं जो मुकाबले में डटे रहते। हमने तो घर बना कर ही दम लिया था।

हादसों से हम सबको डर लगता है। हादसों में कभी कभी जान भी जाती रहती है – ये भी हम सब जानते हैं। लेकिन मेरा तो इन हादसों से पाला पड़ता ही रहता है और मैं इनके सामने अडिग खड़ा रहता हूँ – अपनी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ।

और हॉं! यही श्रद्धा और विश्वास मैं लोगों को इस आश्रम में मुफ्त बांटता हूँ। मेरा जाता भी क्या है?

मैंने तो इसे ही अपने जीने की राह बना लिया है!

मेजर कृपाल वर्मा

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