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जनता का बैरी कब बचा है ?

सविनय अवज्ञा आन्दोलन

महा पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश :-

“इत्ता बड़ा देश क्या कर रहा था , दादा जी ?” मैं असमंजस में था . गोरे थे ही कितने …? अगर सब मिल कर इन्हें ललकार ही बैठते तो …..?”

“अब सब मिल कर गोरों को ललकार ही तो रहे थे ! अचानक ही एक ‘एका’ बन गया था ! अचानक ही देश-प्रेम जाग उठा था . न जाने कैसे , नरेन्द्र ! देश भक्ति की भावना का उदय हो गया था ! मात्र-भूमि के प्रति जो प्रेम उमड़ आया था – बेजोड़ था ?”

मैं प्रसन्न था . मैं उत्साहित था . मैं उछल रहा था . लग रहा था – मैं प्रतक्ष में …ही अंग्रेजों के सामने सीना ताने खड़ा था …और ललकार रहा था – चलाओ गोली ….? है हिम्मत तो करो , वार …? मैं देखता हूँ ….कि …..”

“अंग्रेज भी हैरान थे …परेशान थे …! उन की भी समझ में कुछ न आ रहा था …?” दादा जी बताने लगे थे .

“क्यों….?”

“क्यों कि …अब उन का मुकाबला …नई पीढी के नए जां -बाजों से था ! पुराने नेता -तिलक १९२० में और गोखले भी १९१५ में चल बसे थे ! लाला लाजपत राय भी अब बहुत बूढ़े हो गए थे . कुल मिला कर ये लोग अंग्रेजों से झक मार कर बैठ रहे थे ! लेकिन जो नए लोग उभर कर आए थे …वो खू -ख्वार थे !! बम और गोली का स्तेमाल खुल कर होने लगा था ! सरकारी खजाने लूटे जाने लगे थे ! पुलिस पर प्रहार होने लगे थे . और सब से बड़ी बात थी , नरेन्द्र कि ….इन नई पीढी के लोगों ने …समाज में अपनी जगह बना ली थी ! इन्हें अब लोग अपने घरों में शरण देने लगे थे ….इज्जत की निगाहों से देखने लगे थे ….और उन के साथ मिल कर ‘पूर्ण स्वराज ‘ का स्वप्न देखने लगे थे ! लोगों को लगने लगा था कि …अब अंग्रेजों का हारना निश्चित था ! लोग मान गए थे कि …अंग्रेजी राज बुरा था …उन के मंसूबे गलत थे …और वो देश को लूट-लूट कर अपने घर भर रहे थे ….जब कि भारत भूखा मर रहा था …?”

“और अंग्रेज ….?” मैं मचला था . मैं जानना चाहता था कि अब अंग्रेज कर क्या रहे थे ….?

“कानूनन हत्याएं कर रहे थे !” टीस कर बताया था , दादा जी ने . “कानून बना-बना कर …निर्दोष लोगों को फांसियां तोड़ रहे थे ….!”

“तो ….?”

“तो ….क्या ….? लोगों में और भी असंतोष बढ़ा था ! ये क्रांतिकारी बच्चे ही तो थे , नरेन्द्र …? क्या उम्र थी – उन की …? तुम से और तनिक बड़े मान लो ….? भगत सिंह २०-२२ साल का मान लो ! इन्होने मिल कर ‘हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिक आर्मी ‘ बनाई थी ! ये लोग शहादत के बे-ताब आशिक थे, नरेन्द्र ! दे वर ईगर टू ….सेक्रीफाई ….” दादा जी ने जोर दे कर बताया था . “जान देना …..और जान लेना ….इन का सीधा-सीधा फ़ॉर्मूला था ! सब लोग घरों से भाग-भाग कर इस ‘सोसलिस्ट आर्मी’ में भरती हो गए थे . सब ने स्कूल=कालेज छोड़ कर …केसरिया पहन लिए थे ! कोई न तो शादी कराने के पक्ष में था …न ही घर बसाने की किसी को सुध थी ! सब आज़ादी के दीवाने थे ….आज़ादी के ही आशिक थे ….और जानों पर खेल कर खेल खेल रहे थे !!”

“और बड़े लोग ….?” मेरा प्रश्न था .

“बड़े लोग भी थे ! उन में थे …नेहरू, पटेल,राजेन्द्र प्रसाद ….जिन्ना ..आंबेडकर ….और थे सुभास चन्द्र बोस !” दादा जी ने बताया था . “ये लोग अंग्रेजों के साथ मिल कर आज़ादी का कोई सुलभ हल खोज लेना चाहते थे ! गाँधी जी खून-खराबा नहीं चाहते थे . यही कारन था कि उन्होंने चौरी-चौरा के बाद …सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस ले लिया था ! अनसन किया था . अपील की थी कि हिंसा नहीं होनी चाहिए ….”

“क्यों….?” मैं बिगड़ा था . “जब अंग्रेज लोग ….हमें मार रहे थे ….तो हम ….?” मेरा मिजाज़ बिगड़ गया था …और खून खौलने लगा था .

“सब खेल बिगड़ जाएगा …!” गाँधी जी ने कहा था . “हमारी लड़ाई अहिंसा की लड़ाई है !” उन का एलान था . “हमें आज़ादी चाहिए …प्रतिशोध नहीं ….!” वह कहते थे .

“और लोग …..?”

“लोग ….माने कि जनता ….ज्यादातर …गाँधी जी के साथ थी ! गाँधी जी में देश को एक कर्णधार मिल रहा था ! गाँधी जी की बातों में वज़न था ….आग्रहों में भय था ….अनशन में जान थी …… और आन्दोलन में चिनगारियां थीं ….जिन्होंने देश को जगा दिया था ….प्राणवान बना दिया था ….बे-खौफ बना दिया था ….और एक दिशा भी नियोजित कर दी थी …..”

“कौन सी दिशा …., दादा जी ….?”

“पूर्ण स्वराज की दिशा , बेटे ! जहाँ पहुँचना था …..” उन का इशारा था .

मैं भी अब भिन्न तरह से आंदोलित हो उठा था ! मेरा मन उस आज़ादी की जंग में अब कपडे उतार कर नहा लेना चाहता था ! में चाहता था कि …मैं …आगे बढ़ता ही चला जाता ….और अंग्रेजों को गले से पकड़ कर ….आज़ादी मांगता ….और पूछता कि …उन्होंने हमें बे-वजह क्यों गुलाम बना लिया था …? “व्यापार करने आये थे , तुम तो ….?” मैं पूछ रहा था . “फिर पूरा देश ही हथिया कर बैठ गए ….? हमारी शराफत का तुम ने न-जायज़ स्तेमाल किया …? और आज हमें …लूट रहे हो …पीट रहे हो ….फांसी चढ़ा रहे हो ….और हमेशा-हमेशा के लिए गुलाम बना लेना चाहते हो ….! क्यों,भाई …?”

“बड़ा ही विचित्र वक्त था , नरेन्द्र !” दादा जी ने मेरा सोच तोडा था . “आज़ादी का जूनून आसमान पर छा गया था ! जान देने ….और जान लेने की होड़ लगी थी ! ‘हू-हू’ …और ‘हर-हर’ का उदघोष ….’वन्दे-मातरम्’ का जयघोष …..और ‘जय-हिन्द’ के नारे हर जुबान पर चढ़ कर ….चहक रहे थे ! मात्र भूमि के बंधन और बेड़ियाँ तोड़ने के लिए ….अब हर युवा दिल धड़कने लगा था ! और ….और ….नरेन्द्र गज़ब तो ये था ….कि किसी को न तो गोली का डर था ….न बोली का ! एक …निडर-सा ……निर्भय का माहौल खड़ा हो गया था …और ……”

“और …अंग्रेज ….?”

“जुल्म ढाते ही जा रहे थे ….! सेल्लुलर जेल से ले कर ….समूची जेलों की काल-कोठरियां ….आज़ादी के दीवानों से ….लवालव भरीं थीं ! अंग्रेजों ने युवा स्त्री ….और बच्चों तक को न बख्शा था , नरेन्द्र !”

“क्यों ….?” मैंने कारण पूछा था .

दादा जी कुछ पलों के लिए चुप हो गए थे . कुछ द्रश्य थे … जो शायद उन की आँखों के सामने …आ कर ठहर गए थे ! कुछ थे ….जीवंत से कुछ पल थे …जिन की अलग ही कहानी थी ! दादा जी शायद विसरे वक्त की स्लेट पर …कुछ पढ़ने लग रहे थे !

“इसलिए नरेन्द्र कि ….सच में ही स्त्री …और बच्चे …तक अब जंग में शामिल हो चुके थे !” दादा जी अंत में बोले थे .

“बच्चे ….और स्त्रियाँ …..?”

“हाँ,हाँ !” दादा जी ने स्वीकार में सर हिलाया था . “सब के सब …जंग में शामिल थे !” अब वो हँसे थे . “भाई ! क्या जासूसी करते थे …बच्चे …..और किस तरह स्त्रियाँ पुलिस का उल्लू खींचतीं थीं …., कमाल ही था !” दादा जी बता रहे थे . “एक अलग ही तरह की जंग थी ….जिसे लड़ने में अब आनंद आने लगा था ! मरने में आनंद आने लगा था , नरेन्द्र ! घाव खाना ….या घाव देना …आम बात बन गई थी . खुल्लम-खुल्ला की लड़ाई थी ….और अंग्रेज अब हमारा शत्रु था ….देश का शत्रु था …..!!”

दादा जी ने एक बहुत बड़ी बात कह दी थी – अंग्रेज अब देश का शत्रु बन गया था ….और अब शाशक न रहा था …? उन के शुभ चिंतकों की संख्या घट गई थी …. और उन का बैर बढ़ गया था ! और ये बैर अब जनता से था !!

जनता का बैरी कब बचा है …..?

“सुलग उठा था पूरा देश , नरेन्द्र !” दादा जी बताते ही जा रहे थे . “देश का हर कौना दाहक उठा था ! हर युवा दिल …शहादत के लिए लालायत था ….! सब ने पढाई-लिखाई छोड् दी थी ….और …सब आज़ादी की जंग में कूद पड़े थे !!”

“और अंग्रेज ….?” मैं अब रंग लेने लगा था . मैं बहुत प्रसन्न था !!

“भाग रहे थे ….चारों ओर …दमन-चक्र का झंडा लिए दौड़ रहे थे ….! आग लगती तो …बुझाते …. और फिर अगली आग को पकड़ने भागते ….! पूरा देश धधक रहा था ….पूरा देश ? क्या दिल्ली …तो क्या लाहौर , नरेन्द्र ! लखनऊ ..से ले कर कलकत्ता …कानपुर …पटना ….और झांसी …सब के सब सजग थे …भड़क उठे थे ….भभक रहे थे ….और ..और अब अंग्रेज डर रहे थे …”

“सच ….?” मैं पूछ बैठा था .

“हाँ,सच !” हँसे थे , दादा जी . “एक लंगोटी वाले फ़कीर से …मैंने एक बादशाह को ….भीख माँगते देखा था , नरेन्द्र !” अब भी आश्चर्य था , उन को .

“बादशाह बुरा था …शायद ? इस लिए , दादा जी …..!” मैंने उन के इस आश्चर्य का उत्तर दिया था .

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!