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जाको राखे साईंयां !!

नमो

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा . नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास -अंश :-

देश का मिडिया नगाड़े बजा रहा था ! गुजरात का होम मिनिस्टर गुम !! चारोंओर से आवाजें आ रही थीं . अखबारों में अमित का नाम सुर्ख़ियों में था ! सी बी आई अपना खेल बड़े ही करीने से खेल रही थी . शिकार को दबोचने से पहले …उस के साथ क्रीडाएं करना …इन का शौक होता है ! सी बी आई के पड़ते छापों की खबर …मिडिया तक पहुंच रही थी . एन जी ओज …भी अपने अपने काम को अंजाम दे रहे थे ! विदेश की प्रतिक्रिया भी अजब-गजब ही थी !!

जुलाई २०१० बड़ा ही घटना -ग्रस्त समय था ! घोर संकट के नीचे आ गए थे -हम दोनों ! सच और झूठ तो दो बातें थीं …अलग-अलग थीं …! लेकिन जो सबूत सी बी आई के हाथ लगे थे …वो तो झूठे हो कर भी सच थे ? कानून की विडम्बना को समझाने के लिए मेरे पास इस से बड़ा और कोई उदहारण नहीं हो सकता !

कांग्रेस की बगिया में फूल खिले थे !!

“जेल में डालो , इसे !” हर काँग्रेसी नेता की जुबान पर एक ही आदेश था . “बड़े चोर को भी घसीट लो !” उन का ये इशारा मेरी और था . “दोनों ने मिल कर …आतंक उठा रखा है …?” उन का रोष भी सामने था . “अरे ! सत्ता का मतलब ..ये तो नहीं …कि … तुम चाहे जिस की जान ले लो ….?” उन का जजमेंट था !

२६ नवंबर २००५ में पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए सोहराबुद्दीन शेख , उस की पत्नी कौसर बी …और बाद में २६ दिसंबर २००६ में उन के ही एक अंडर वर्ल्ड साथी – तुलसी राम प्रजापति को ले कर …सी बी आई ने बवाल खड़ा कर दिया था ! सी बी आई का कहना था कि …मुठभेड़ झूठी थी …और गुजरात पुलिस ने उन को धोखे से मारा था …ये तो कोल्ड ब्लडिड मर्डर था …और तुलसी राम प्रजापति चूंकि चश्मदीद गवाह था …इस लिए पुलिस ने उसे मार गिराया था !

चूंकि अमित शाह गुजरात के गृह मंत्री थे …अतः ये सब उन के ही इशारों पर हुआ बताया जा रहा था ? उन पर हत्या का आरोप लगा कर …अब सी बी आई उन्हें …गिरफतार करने घूम रही थी !

परोक्ष रूप से तो ये सब …मुझे ही घेर कर …जेल में बंद करने का ..षड़यंत्र था ! अब मैं सोहराबुद्दीन शेख के हाथों मरा नहीं था ….और वह मर चूका था … तो मुझे कम-स-कम जेल तो जाना ही चाहिए था …?

मेरे जिन्दा बचजाने के अफ़सोस में ….मेरे विरोधियों पर जूते बरस रहे थे ! एक अदना-सा मोदी उन से मर नहीं पाया था ? अफ़सोस की बात ही थी ! सोहराबुद्दीन शेख जैसे सरगना और कट्टर आतंकवादी को …सुपारी देने के बाद भी …मोदी नहीं मरा था …? शर्म की तो बात ही थी ….!!

मैने एक बार फिर से सोहराबुद्दीन केस की फाईल उठा कर पढ़ना आरंभ किया था ! मैं कोई मुद्दा ढूंढ लेना चाहता था ….! कोई नुकता निकाल लेना चाहता था – जो किसी तरह से अमित को जेल जाने से बचा लेता …?

सोहराबुद्दीन शेख सन १९९० से ही हथियारों की तस्करी करता आ रहा था ! उस के कारनामों के मामले पुलिस के पास दर्ज थे . सन १९९५ नें उस के गाँव -झिरिन्या , मध्य प्रदेश से पुलिस ने ४० ए के ४७ राइफल बरामद की थीं . उस ने इन हथियारों को अपने घर के कुए में छुपा रक्खा था . ये हथियार सोहराबुद्दीन शेख – रसूल परती के साथ मिल कर ,दरियापुर -गुजरात से ट्रक में भर कर लाया था !

इसी दौरान संजय दत्त भी अवैध हथियार रखने के मामले में गिरफतार किया गया था ! मामला सुर्ख़ियों में था और महाराष्ट्र पुलिस ने सोहराबुद्दीन शेख के खिलाफ ऍफ़ आई आर भी लिखी थी . यह आदमी आतंकवाद से गहरे में जुडा था ! इस की लिंक कराची तक थी . वहां बैठे शरीफ खान के लिए ये आदमी अपने गिरोह के जरिए गुजरात और राजिस्थान के मारबल व्यापारियों से हफ्ता वसूली करता था !

सोहराबुद्दीन शेख असल में अब तक तीन राज्यों का मालिक था ! महाराष्ट्र पुलिस ने तो उसे भगोड़ा घोषित कर जान छुड़ा ली थी . राजिस्थान पुलिस अपने ही किसी गठ- जोड़ में इन का पानी भरती थी ! गुजरात पुलिस अब दबाब में थी . चूंकि वहां का चीफ मिनिस्टर मोदी था …माने की मैं था …जिसे काम चाहिए था …न नाम चाहिए था …और न ही नामा …सिर्फ काम ही चाहिए था ….! अमित शाह तो मुझे पहचानता था …मानता था और मानता था कि …हमें जनता की हिफाज़त करने का जिम्मा मिला था …! और जनता के हित में और हिमायत में …सोहराबुद्दीन शेख को गिरफतार करना ही हितकर था ….!!

लेकिन कांग्रेस की धारणा इस के बिलकुल भिन्न थी !

हर राज्य की पुलिस और प्रशाशन अपने राज्य तक ही सीमित था ! जब कभी दूसरा राज्य कोई मदद मांगता था …तो फिर यह सोचना पड़ता था कि …मदद मांगने वाला था कौन …? उस के साथ अगर कोई वैमनष्य था …तो पहले उसे समझना ज़रूरी था …न कि उसे मदद देना …! चूंकि गुजरात राज्य का चीफ मिनिस्टर मोदी था …अतः गुजरात राज्य की कोई मदद करना नहीं चाहता था !

मोदी के नाम को लेकर तो अब ….हाई कोर्ट …और सुप्रीम कोर्ट भी अपने फैसले बदलने लगे थे …? उन पर भी राजनीतिक दबाब था …और देश-विदेश तक की शिफारिशें थीं ! हर तरफ से मोदी को घेरने का फेर डाला जा रहा था !!

अमित के गले में जो फंदा आ पड़ा था – वह भी तो मोदी की वजह से ही था …? अमित के बाद अब दोषारोपण मुझ पर ही होना था !

“क्या करें , भाई जी ….?” अमित पूछ रहा था . “सी बी आई को ज्यादा दिनों तक चकमा नहीं दिया जा सकता …? उन लोगों का तो दायित्व है ….कि ….?”

“सरेंडर कर दो ! कल का दिन ठीक है !” मैंने निर्णय ले लिया था . “बेल लेने में वक्त तो लगेगा …?” मेरा अनुमान था . “जिस तरह से सोहराबुद्दीन शेख का मामला बताया जा रहा है …उस से तो लगता है …कि …मामला उलझेगा ….?”

“उलझने दो ….!” अमित हंसा था . “उलझेगा …तभी तो सुलझेगा ….?” उस की राय थी . “मैं सोचा करता था , भाई जी कि …हमारे पुरखे जेल गए थे ….उन्हें काल-कोठरियों में बंद कर के रखा था …उन्हें यातनाएं मिलीं थीं ….और …”

“भय …!” मैं एक दार्शनिक की तरह कह रहा था . “भय हमारे जीवन का एक महत्व पूर्ण मुद्दा है …जिस की वजह से हम वो सब करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए ! और अगर पुरखों की बात करते हो तो ….उन्होंने जेल भरना इसीलिए आरंभ किया था कि …लोगों के मन से जेल जाने का भय निकल जाए ! लोग खुल-खेल कर सामने आएं …और चौड़े में आ कर लड़ें ….”

“हम भी चौड़े में आ कर ही लड़ेंगे ….?” अमित कह रहा था .

“और जीत भी हमारी ही होगी, अमित ! ये सी बी आई का गेम नकली है ! इस तरह के छलावे ज्यादा चलते नहीं ! जानते हो , अंग्रेज क्यों हारे ….?”

“इस लिए कि उन्होंने भी तो झूठे मुकद्दमे चलाए थे ….? झूठ का सहारा लिया था ….कानून का अपने हित में दुरूपयोग किया था ….पब्लिक की आँखों में धूल झोंकी थी ….और …”

“बिलकुल ठीक …! और कांग्रेस ने भी ये सब अपने अंग्रेज आकाओं से …सीखा है ! काँग्रेसी उसी तर्ज पर देश को चलाते आये हैं ! और चलाते ही रहना चाहते हैं ….?”

“लेकिन अब तो ये चलेगा नहीं , भाई जी …? मैं जेल तो जा रहा हूँ ….पर मैं चुप बैठने वाला नहीं ! मैं इन की कब्र खोद कर ही दम लूँगा !”

“मैं जानता हूँ, अमित !” मुझे प्रसन्नता हो रही थी . “हमारा ये संघर्ष ही तो रंग लाएगा ….?”

“एक विनती है ….?” अमित गंभीर था .

“बोलो …!”

“आप ….मेरा मतलब है …कि ….चाहे जो हो ….गुजरात का चीफ मिनिस्टर अरेस्ट नहीं होना चाहिए ….?” अमित की मांग थी .

मैं गहरे सोच में डूबा था ! मैं तनिक थकान-सी महसूस कर रहा था . अमित मेरा दांयाँ हाथ था ….मेरा सहारा था …और मैं अमित पर बहुत भरोसा करने लगा था ! उस के जेल जाने के बाद …कौन सा द्रश्य सामने आएगा …, मैं अनुमान तक न लगा पा रहा था …? काँग्रेसी तो घुटे घाघ थे ? ज़रूर वो मेरे लिए भी कुछ सोचे बैठे होंगे ….? चूंकि सेंटर में वो बैठे थे ….दिल्ली पर राज उन का था …अतः किसी राज्य के मुख्य मंत्री को बे-दखल करना …उन के लिए कोई बड़ी बात न थी ….?

“जाको राखे साईयाँ ….!!” मैंने अमित से अपने अचूक अंदाज़ में वही कहा था ….जो मैं स्वयं से कहता था . “करने वाला तो कोई और ही है , अमित , कांग्रेस नहीं ….!!” मैं गंभीर था …ग़मगीन था …!

कारण – आज गाँधी का जवाहर नहीं …..मेरा अमित जेल जा रहा था ….?

न जाने क्यों …और अचानक ही मेरी मुट्ठियाँ तन आईं थीं ? मैंने महसूस था कि कांग्रेस …अंग्रेजों से किसी भी माने में कम न थी ! कांग्रेस ने जन-मानस को बाँट-बटोर कर अपने खाते में चढ़ा लिया था ! चित भी उन की और पट भी उन की का हिसाब …पूरे देश में रोप दिया था ! सब के गलों में पट्टे बांध दिए थे ! सब के नाम धर दिए थे ! और सब के सब चोरी-चकोरी में शरीक थे ! अच्छा एक धडा बन गया था …जिस में पुलिस के पहरेदारों से ले कर …सुप्रीम कोर्ट के जज तक शामिल थे ! इन सब की जड़ें गहरे तक समाईं थीं ….और इन्हें उखाड़ना उतना ही कठिन था ….जितना कि ……

मेरी आँखें नम थीं ! !

“मैं अब न रुकूंगा ….न झुकूंगा ….न चूकूंगा ….और न ही चोट खाऊंगा ….!” कोई था – जो मेरे अंदर से बोल रहा था . “मैं अब कांग्रेस मुक्त भारत की ही संरचना करूंगा ….! मैं अब नया इतिहास रच कर ही रहूँगा …..”

दादा जी का आदेश आज मेरी आँखों के सामने आ कर ठहर गया था ! वह मौन थे ….पर उन की आँखें बोल रही थीं !!

“जिस दिन गाँधी छ्ह साल के लिए जेल गए थे ….उस दिन मैं ही नहीं ,नरेन्द्र पूरा भारत रोया था !” दादा जी मुझे बताने लगे थे . “ये १८ मार्च सन १९२२ की बात है …जब उन्हें देश-द्रोह के गुनाह के लिए छह साल की कैद मिली थी ! उस गुनाह के लिए …जो देश-द्रोह था ही नहीं ….? निरी देश-भक्ति थी ….और ….”

“गाँधी जी …लड़े थे ….?” मैंने दादा जी से पूछा था . “वो तो ….दो ..हड्डी के आदमी थे ….दादा जी …..फिर ….?”

“उन जैसा लड़ाका …तो न पैदा हुआ है ….न ही होगा , नरेन्द्र !” दादा जी की आवाज़ में एक गर्व था …सम्मान था …और था एक सौहार्द ! जैसे गाँधी उन का बहुत अपना था …और अब वो उन की कथनी-करनी का एक सरोकार के साथ गुणगान कर रहे थे . “एक चमत्कार कर के दिखाया था , गाँधी ने ! अब अंग्रेजों के भी हौसले पस्त थे . सब के हुलिए बिगड़ गए थे …और सब बे-दम …और बे-होश थे ! उस बौखलाहट में ही तो उन्होंने गाँधी जी को जेल भेजा था ….?”

“वो कैसी बौखलाहट थी, दादा जी ….?”

“बौखलाहट यों, नरेन्द्र कि …..अंग्रेजों का अभिमान टूटा था …..!” दादा जी खुल कर हँसे थे .

में भी हंस गया था ….!!

…………………..

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!