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हमें लड़ना तो पड़ेगा ?

लाक्षागृह

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास अंश :-

“अब परिथिति क्या थी ?” मैं यही सोच रहा था . 

घटनाओं का गठजोड़ एक चेतावनी की तरह मेरे सामने आ खड़ा हुआ था ! मैं समझ रहा था – एक खेल रचलिया गया था लेकिन उस खेल की दिशा क्या थी , मैं नहीं जानता था . लेकिन इतना तो ज़रूर जानता था कि..ये खेल था तो खतरनाक ….जानलेवा …और सत्ता हथियाने के सिवा और कुछ न था ! 

और हाँ , इस खेल के खिलाड़ी कौन-कौन थे – मैं न जानता था ! 

लेकिन इस खेल का फायदा किसे होना था – मैं ये सोचने बैठ गया था !! 

नब्बे के दशक में कांग्रेस पार्टी की दशा क्या थी ? पार्टी टूटने-टूटने को थी – ये तो मैं जानता हूँ . पार्टी किसी भी ‘पाजिटिव’ सोच से दूर थी . वैचारिक तौर पर तो कांग्रेस पार्टी दिवालिया हो चुकी थी . पार्टी का न कोई मुद्दा था …और न ही कोई उद्देश्य था ! पार्टी पर न तो कुछ कहने को था …और न ही कुछ करने को था ! लेकिन हाँ, कुछ था तो …बस सत्ता का स्वार्थ ही था ? ये अभी तक मरा नहीं था …और एक बे-शर्मी की हद तक जिन्दा था ! जो लोग पार्टी में पोस्ट ले कर बैठे थे उन्हें व्यक्तिगत स्वार्थ के सिवा और कुछ सुहाता भी न था ! 

फिर भी वहां एक अनुत्तरित प्रश्न बैठा था – पार्टी को जीवन दान मिले तो कैसे  ….?

“कुछ सोचा है , शाह जी …?” पार्टी में आम चर्चा होती . “मर जाएंगे ….अगर कोई तिकड़म न बैठी तो ….? लोग वोट नहीं ….जूते देंगे …..?” चर्चा चलते-चलते भंग हो जाती . “रोष है …पब्लिक में …..”

“है हमारे पास एक अमोघ अस्त्र ….!” पार्टी के कर्णधार बोले थे . भूल जाते हैं , आप लोग कि …हम कित्ते पुराने हैं ….? भूल जाते हैं , आप लोग कि हम ही देश के मालिक हैं ! “जा कर कहो जनता से कि ….हम सेक्युलर हैं ….”

“सेक्युलर …..?”

“क्यों …? संविधान में नहीं लिखा ….?

बस, फिर क्या था कि लोग चिल्ला पड़े – सेक्युलर …..! सेक्युलर ……!! सेक्युलर …..!!!

और फिर करिश्मा होते भी देर न लगी ! कमाल ये कि पूरा मीडिया ‘सेक्युलर’ के मंत्र को ले कर इस तरह उड़ा कि …लोगों को पल-छिन में पागल बना दिया ! लोगों को उन की पहचान भुला दी . लोगों को इस तरह रिन्झाया कि वो …अपने-पराए का ध्यान ही भूल गए ! 

मैंने भी पूछा लोगों से – अरे,भाई ! ये ‘सेक्युलर’ किस बला का नाम है …?”

“सेक्युलर के माने सीधे-सादे होते हैं – धर्मनिरपेक्ष ! एक समाज जिस का कोई धर्म ही न हो !”

“फिर वह समाज ही क्या हुआ जिस का कोई धर्म ही न हो ….?”

“धर्म विष है ….पईजन है …..! जाति …बीमारी है ! संस्कार …गुलामी की बेड़ियाँ हैं ! आदमी तो नंगा पैदा होता है , भाई जान …? उसे ये नाम, गाँव ,गली -गोत्र …और अपना-तेरा तो हम सिखा देते हैं ! और यही उसे हिंसक पशु बना देते हैं ….और वह आदमी की पहचान ही भूल जाता है ?”

“और ‘सेक्युलरिज्म’  क्या बनती है ….?”

“उच्च मानवता का प्रतीक ….एक मनुष्य ….! ऐसा मनुष्य जो सब का है …हर धर्म का है ….हर जाति का है ….हर प्रदेश का है ….हर प्रांत का है ….भारत का है …विश्व का है …और ….”

“कहीं का भी नहीं है …?” मैं टोक देता हूँ . “निहत्था है …धुरीहीन है …..निरीह है ….अकेला है ….”

“और …..?”

“और एक ऐसा आदमी है …जिस का न घर है …न द्वार है ! न उस का गाँव है …न घोष है ! वह एक आदमी है और उस के हाथ में उस का ही झंडा है …डंडा है ! उस की एक खिचड़ी जुबान  है …और उस का ये अर्धनारीश्वर रूप उसे पुरुष और नारी के बीचोंबीच ला खड़ा करता है ! वह नपुंशक है …और डूबती नाव में बैठा-बैठा ‘बचाओ-बचाओ’ का शोर मचा रहा है ….”

“तो बचाओ , उसे ….?”

“कैसे ….?”

“कोई दूसरा विकल्प दो ….?”

“इस तरह के सपने तो विदेश ही बेचता है ….? इस लिए कि हम अपना सब भूल जाएं ….और इस सेक्युलरिज्म के चक्कर में फंस कर …डूब जाएं ! लेकिन उन के पास उन की भाषा है ,उन का धर्म है और उन की संस्कृति है ! सेक्युलरिज्म का फार्मूला तो हमारे लिए ईजाद किया है …ताकि वो हमें फिर से गुलाम बना लें ….?”

“तो अब आप क्या करेंगे ….?”

“वही जो मैं सोच रहा हूँ ….!!”

“पर देश बचाने के लिए …तुम स्वयं कहाँ बचोगे …, नरेन्द्र मोदी …? तुम्हीं तो निशाने पर हो ! एक से ले कर …अंतिम गिनती तक तुम्हारा ही नाम आता है !”

“क्यों ….?”

“क्यों की तुम्हारा ‘नाम’ और तुम्हारा ‘काम’ दोनों ही आसमान पर चढ़ गए हैं ! तुम अब एक खतरे के रूप में जाने जाते हो ! तुम्हें अब हर आँख देख रही है . देश, विदेश,मीडिया ,बुद्धिजीवी, राजनेता , एन जी ओज ,अभिनेताओं से लेकर …आम आदमी तक – तुम्हीं सब के स्टार हो ! और अब …..”

“मेरा अंत आएगा …?”

“हाँ ! तुम्हारा अंत लाने की शुरूआत भी हो चुकी है !”

“कैसे ….?”

“गोधरा काण्ड ! इसे लाक्षाग्रह समझो !! इस की आग अभी ठंडी नहीं हुई है …?”

“हे, भगवान् !!” मैं टीस गया हूँ . “ये क्या बबाल है …? हिन्दू-मुसलमान का ये दंगल …ये अमानवीयता का अभिशाप …अभी तक नहीं टला ….? मेरे अथक प्रयास …और प्रयत्नों के बाद भी ….वही विवाद …? वहीँ का वहीँ खड़ा है -सब कुछ …? कौन है जो इसे हवा दे रहा है …इस आग को सुलगा रहा है …और कौन है वो जो ‘हिन्दू-मुसलमान ‘ के इस महाजाल को फैला कर छुप गया है …?

“एक बार कोई ‘नाम’ या ‘नुक्ता’ मिल जाए …कि नरेन्द्र मोदी ने हिन्दू-मुसलमानों के दंगों को शय दी …हिन्दूओं का पक्ष लिया ….और मुसलमानों को मरवाया ….फिर देखना कि किस तरह से …गाड़ी उलटती है …? और …..”

मेरी रूह काँप जाती है – मात्र ‘गोधरा’ काण्ड को याद कर के !!

“लाक्षाग्रह की युक्त समिधाएँ …पहले से ही चुन लीं गईं थीं , नरेन्द्र !” मुझे वक्त बता रहा है . “तुम नहीं जानते कि तुम्हारे लिए लाक्षाग्रह का निर्माण करते वक्त यही बात कारगर मानी गई थी कि …तुम्हें …तुम्हारी पार्टी को …राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ….और तुम्हारी पूरी इस राष्ट्रवादी विचारधारा को …इस बनाए लाक्षाग्रह में जला कर …हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाए ! न रहेगा बांस ….न बजेगी बांसुरी ….? हा हा हा ! अंत तो सब का आता ही है , मेरे भाई ?”

“तो क्या तुम इन सब में शामिल नहीं हो ….?” मैं पूछ लेता हूँ .

“हूँ …तो …! पर मैं सेक्युलर हूँ, मेरे भाई …! हा हा हा …!” वक्त हंसने लगता है . “अभी क्या …अभी तो सेक्युलरिज्म का दौर यहाँ आएगा …! इस्तांच सेक्युलरिज्म -माने कि हम अपने नाम के सामने तुम्हारी तरह ‘मोदी’ लिखना तक बंद कर देंगे ! हम सिर्फ हम होंगे …जैसे कि ‘स्टोन’ …या ‘ब्लैक ‘ …’व्हाईट’ …या फिर ‘कालू’ ,’लालू’ …..और ‘डालू’ ! आगे का नाम,गाँव …सब गायब ! एक नई पहचान से हम जुड़ेंगे ….! जैसे कि पायजामे से निकल कर हम धोती पहन लेंगे ….और …फिर स्वतंत्र ….!!”

“और ये लाक्षाग्रह की अग्नि ….?”

“एकता में अनेकता को कैसे जलाएगी …! नहीं समझे ….?”

“नहीं ….!!”

“हम सब के ….और सब हमारे ….!! हा हा हा ! कित्ता आसान है …? लड़ाईयां ख़त्म …! शान्ति से जीओं ….खूब पीओ …और ऐश ..करो !”

“कौन सिखा रहा है , ये सब ….?” मैंने तुनक कर पूछा है .

“वक्त …माने कि मैं वक्त …ये सब बता रहा हूँ, नरेन्द्र !”

“बक रहे हो , मित्र !” मैं भड़क जाता हूँ . “मैं नहीं मानता तुम्हारा लोहा ….! और हाँ , मैं जलूँगा भी नहीं -इस लाक्षाग्रह में …! देखलेना …. देखलेना ….! मैं इस वैमनष्य की आग को बुझा कर ही दम लूँगा ! मैं जोडूंगा देश को …..प्रान्तों को ….परिवेश को ….पुरुष और नारी को ….!!”

“अकेली कांग्रेस ही खा जाएगी , तुम्हें ….?”

“बूढी हुई ….! मैं युवा हूँ …मेरे साथ देश का युवक है ….नई विचारधारा है ….और नए लोग हैं ! मैं उन में से हूँ जिन्होंने वक्त को मुट्ठी में लेना सीख लिया है ! अब तुम हमारी मुट्ठी में होगे , मित्र !”

मुझे सांस ने जगाया है ! मुझे होश लौटा है ! दम भी लौटा है …और अब मैं स्वस्थ हूँ ! मरने से बच गया हूँ . एक खौफ से उबर कर ऊपर आ गया हूँ …!!

हिन्दू-मुसलमान का सियासती आंकड़ा मेरी समझ से अब बाहर नहीं है ! ‘गोधरा काण्ड’ मेरे लिए एक सबक है . …एक सबब है ….एक पाठ है …और एक चुनौती भी ! मुझे सब स्वीकार है ….मैं नां तो नहीं कह रहा ….?