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होनहार हो मेरे लाल !

गंगा सागर

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

भोर का तारा- नरेन्द्र मोदी .

उपन्यास-अंश :-

क्या-क्या नहीं हुआ …? कौन-सी कोर-कसर उठा के राखी है ! अमित सोच रहा था ! यहाँ तक कि ,’ कंसर्न्ड सिटिज़न ट्रिब्यूनल ‘ का सेवानिब्रत जजों द्वारा गठन करना …और मार्च-अप्रेल २००२ को ही ‘गोधरा’ गुजरात के दंगों की जांच करने ….गुजरात पहुँच जाना …एक आश्चर्य की बात थी ! न तो इस आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट ने किया था …और न ही हाई कोर्ट ने ….? और न ही किसी राज्य या केंद्र सरकार ने इन्हें चुना था …? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बी आर कृष्ण अय्यर की अध्यक्षता में स्वनिर्मित इस जांच दल में …सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज जस्टिस पी वि सावंत ,बोम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एच सुदेश …एवं …पूर्व जज जस्टिस लोनी शामिल थे !

यह गठन भी रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा गठित -बैनर्जी कमेटी जैसा ही था -जिसे २००६ में गुजरात हाई कोर्ट ने …असंवैधानिक -करार दिया था !

कमाल तो ये था कि ये स्वनिर्मित जांच दल कह रहा था …कि …सावरमती एक्सप्रेस में आग किसी बाहरी भीड़ ने नहीं लगाई …बल्कि अंदर से ही लगी ! जस्टिस कृष्ण अय्यर तो स्पष्ट कह रहे थे कि …गुजरात में हुए नरसंहार के लिए …नरेन्द्र मोदी को गिरफतार किया जाए …और उन पर हत्या का मुकद्दमा चलाया जाए …..?

“ये अधिकार जस्टिस कृष्ण अय्यर को किस ने दिया ….?” पहला प्रश्न दागा था , अमित शाह ने . गुजरात सरकार की ओर से वो प्रश्न पूछ रहे थे . ” हैं कौन …ये श्रीमान जी …जो …बे-बुनियाद फैसले सुना रहे हैं …? ये क्यों चलती वैध जांच प्रक्रिया में …रोड़ा अटका रहे हैं ….?”

और फिर गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ….इस आयोग की कहानी का …अंत ला दिया था – अमित ने !!

लेकिन अब …शाहरुख़ और आफ्ताव आलम …उन के सामने थे ! उन के इरादे भी कम घातक न थे ….? भगवान् न करे …..???

कानून का पेच अगर उल्टा पड़ जाए …तो इस काटे का इलाज़ फिर …नहीं हो पाता ….?

“निकलो,अमित !” उस का मन बोल रहा था . “भाई जी ….अकेले हैं ! बात बिगड़ गई तो ……???”

ताबड़-तोबड़ अमित का सन्देश मिला था तो मैं सकते में आ गया था . था कुछ – मैंने भी अनुमान लगाया था . फिर मैं उस से मिलाने पहुँच गया था !

“चाहे जो करो ….अब मुझे बाहर निकालो, भाई जी !” उसी मुलाक़ात में अमित ने गोट चल दी थी . “मुझे शक है ….कि …आप चोट के नीचे आ जाएंगे ….!” उस ने स्पष्ट कहा था . “शाहरुख़ …और आफ्ताव आलम …मुशीबत बो रहे हैं ….! अगर उन की चाल सीधी पड़ गई …तो हम पिछड़ जाएंगे ….”

हम दोनों एक लम्बे अरसे तक एक -दूसरे की आँखों को पढ़ते रहे थे ….परखते रहे थे …! एक अविश्वास था …जो बार-बार अमित की आँखों में लहक आता था !

“आफ्ताव आलम ..निहायत ही कट्टर मुसलमान है ! धर्म के नाम पर ….अपने मज़हब के लिए ….और इस्लाम की खातिर …वह कोई भी कीमत चुका सकता है !” अमित ने स्पष्ट रूप से कहा था . “जहाँ धर्म …हम लोगों के लिए एक कमजोरी का नाम है ….वहां इन के लिए धर्म एक ज़ज्बे का नाम है …जूनून है ….पागलपन है ! अच्छा ख़ासा पढ़ा-लिखा मुसलमान …धर्म का नाम लेते ही पागल हो जाता है !” तनिक हंसा था,अमित. “और हम हो जाते हैं -विनम्र ….नत-मस्तक ….मौम …और दयालू …!” उस ने कटाक्ष किया था . “यही हमारी सब से बड़ी कमजोरी है, भाई जी !” अमित ने दो टूक कहा था .

अमित कितना सही था ….या कितना गलत ….यह आज फिर एक बार मेरे सामने प्रश्न बना खड़ा था !

“गंगा सागर हिन्दूओं का महान तीर्थ है ….,नरेन्द्र !” दादा जी की आवाज़ फिर से मैं सुनने लगा था . “सारे तीरथ …बार-बार ….गंगा सागर …एक बार …!” दादा जी ने जुमला कसा था . “मकर संक्रांति ….की १४ जनवरी को …हर साल मेला लगता है !” वह बताने लगे थे .

“क्यों …..?” मैं पूछ बैठा था .

“बस …लोग मानते हैं ….मनाते हैं …! देश-विदेश तक का हिन्दू आता है ! मान्यता है …गंगा सागर में स्नान करने की ….! और …..”

“धरम में क्या धरा है, दादा जी …..?” मैंने उपहास किया था . “मैं तो इसे निरा ढोंग मानता हूँ ….!” मेरी बे-बाक राय थी .

“जा कर देखो ,न ….?” दादा जी की राय थी . “देखो ….सोचो ….समझो …..! लोगों से भी पूछो …! आने वाले यात्रियों से मिलो …! तब कोई राय कायम करना …!!” उन का सुझाव था .

“कितने ….न जाने कितने तीर्थ है , हमारे …..?’ मैं फिर से हंसने लगा था . “हमें तो मालूम ही नहीं …..”

“चार धाम हैं, हिन्दूओं के !” दादा जी ने मुझे बताया था .

“एक को तो मैं भी जानता हूँ !”

“कौन सा ….?”

“यही …! गंगा सागर …..”

“नहीं,पगले ….! ये चार धाम में शामिल नहीं है ! बदरीनाथ,द्वारका,पूरी और रामेस्वरम – ये चार धाम हैं ! देश के चार छोरों पर स्थित हैं . हमारे पुरखों का मुख्य मुद्दा … हमें भारत -भ्रमण कराने का था ! ये देश को जानने के लिए था ….लोगों से मिलने के लिए था ….! वो बड़े ही दूर-दर्शी थे ! चूंकि देश बहुत बड़ा था ….और आना-जाना आसान न था …अतः उन्होंने इसे धार्मिक अभियान बना दिया था ! श्रद्धा …पूजा …के महत्व को ..इन तीर्थों के साथ जोड़ कर …मोक्ष का लालच दिया था ! और यही कारण था कि …हर हिन्दू चार-धाम की यात्रा करना अपना सौभाग्य मानता था !”

“पर अब तो कोई नहीं जाता ….?”

“जाते हैं ! मैंने चारों धाम किए हैं !” दादा जी ने प्रसन्न हो कर बताया था . “अगर हम ठीक से सोचें,नरेन्द्र ! तो धरम ढकोसला नहीं ….एक सच्चाई है ….मान्यता है …और जीवन जीने के लिए एक ठोस सत्यता है !!”

“करम ….करना ….?” मैंने फिर से प्रश्न किया था .

“धरम के साथ करम जुड़ा है !” दादा जी ने बात काटी थी . “करम तो ….गौ -हत्या भी है …?” अब दादा जी ने मेरी आँखों में घूरा था . “लेकिन …ये …क-र-म …..?”

दादा जी ने इस बार मुझे गलत कदम पर पकड़ लिया था !!

तब मैंने गंगा सागर जाने की राह गही थी …..!!

पर मेरे मन में कोई मोक्ष पाने का लालच न था ! और न ही मैं किसी भव-सागर से पार ही होना चाहता था ! मैं तो इस में गोते लगा-लगा कर स्नान करना चाहता था ! मैं चाहता था कि जीवन को ठोस और सही मूल्यों के साथ जिया जाए …! बिना किसी पक्ष-पात के मैं …अपने जीवन को इस तरह जीऊं ….कि उस में कुछ गुण -ज्ञान अवश्य ही हो !

गंगा सागर की यात्रा कम कठिन न थी ? रेल के बाद बस की यात्रा …एक पागलपन से कम न थी ! न जाने कहाँ से लोगों के हुज्जूम …इक्कठा हो-हो कर …आ रहे थे ! एक भीड़ का सैलाब-सा चलता चला जा रहा था ! गंगा सागर गाँव पहुंचते=पहुंचते मैं …हैरान और परेशान था ! नाव में चढ़ कर गंगा पार करने से ले कर …कई मीलों तक रेत ,दलदल और कीचड में चल कर …मैं गंगा सागर गाँव पहुंचा था ! बहुत थक गया था ! बहुत दुखी था . आज मन को खुश करने के लिए मेरे पास कुछ भी न था ….?

लेकिन सच कहूं तो दूसरे ही पल न जाने क्या हुआ था ….कि मैं उस गंगा सागर द्वीप के ऊपर …लहराते ना-ना प्रकार के धरम -ध्वजों को देख कर …अभिभूत हो उठा था !

एक अलग किसिम का जन-समूह …एक विचित्र बसावट में …बिखर कर उस बलुहे विस्तार पर उभर आया था ! तम्बू थे . कुटियाँ थीं . छप्पड़ थे . और थे खुले में लगे डेरे ….? लोग खा-गा रहे थे . नांच-कूद रहे थे ! भजन-कीर्तन कर रहे थे . और सब के सब आनंदविभोर थे ! उस नीले आसमान के नीचे …तने तम्बू ….मुझे अजीव-सी अनुभूतियों से भरने लगे थे !

उस होती चहल-पहल और ….संवाद-परिसंवाद में …मुझे गूढ़-ज्ञान-सा …कुछ समझ आने लगा था ! लगा था -वो जो भी था ….मोक्ष ही था ! जो वहां था -वही तो ज्ञान था ? जो लोग कह-सुन रहे थे …वह धर्म था …और उस धर्म का अर्थ था – प्रेम-पूर्वक …साथ-साथ …मिल-जुल कर रहना …..!!

वहां किसी ने भी कोई विशेष व्यवस्था न बनाई थी ! जो भी था …वह सब सहज ही रचा-बसा …एक समूह था ! अति मानवीय इस समूह का एक ही मुद्दा था – श्रद्धा …और पूर्ण विश्वास के साथ ..गंगा सागर में डुबकी लगाएं …और माँ गंगा के सागर-मिलन को ..उन की पूर्णता का प्रतीक मान कर …एक पर्व की तरह मनाएं !!

गंगा – नदी न रह कर सागर बनती है ! सुहागिन-सी ….अपनी जीवन-लीला को समाप्त कर ..अपने प्रिय में प्रवेश पा जाती है ….!!

“गौ-मुख से ले कर गंगा सागर तक का सफ़र कर के पहुंचे हैं !” एक फकत नंगा साधू बता रहा था . “हमारा अखाड़ा …श्रेष्ठ है …सर्वोपरि है …! और हम कल सर्व प्रथम स्नान का आरम्भ करेंगे …!” उस का एलान था . “हमारे गुरू …बाबा अवधूत जी …कल्याण कल स्नान के बाद प्रवचन करेंगे !” एक घोषणा थी . “मुख्या मंत्री जी कल पधारेंगे ….और ….”

मैं अब कुछ न सुन रहा था ! मैं अब केवल अवधूत जी कल्याण के बारे कल्पना कर रहा था …..!!

और मैं उन का प्रवचन सुने बिना रह न सका था !

और आप सच मानिए कि … जो कुछ अवधूत कल्याण जी ने कहा था – मुझे आज तक अक्षरसह याद है ….!!

“इस देश को धर्म ने ही बचा लिया है , मित्रो !” अवधूत जी कल्याण ने कहा था . “मुगलों का आक्रमण हुआ ! हमारी अस्मिता पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया ….? हमें जबरन ही मुसलमान बनाया गया ! फिर ईसाई आए ! उन्होंने भी हमें खूब ही कुचला ….! हमें ईसाई बनाने के लिए उन्होंने भी लालच के बड़े-बड़े बकरे बांधे ! कितने ही लोगों को इंग्लेंड ले गए ? राजे-रजवाड़ों को बहका कर …उन के राज्य हड़प लिए ……और …….”

क्या-क्या बताऊँ ….? मैं अब दादा जी को भूल …इन अवधूत कल्याण जी का शिष्य बन गया था ! मैं इन से इतना प्रभावित हुआ था कि ….आपा ही भूल गया ! मैंने भी तब उन्ही की तरह अवधूत बनने का ….निर्णय ले लिया था !

“रहो,हमारे साथ !” कल्याण जी ने कहा था . “संगत की सेवा करो …!” उन का मेरे लिए आदेश था . “तुम्हारा …मार्ग ….जहाँ तक मैं देख पा रहा हूँ,नरेन्द्र !” हंस गए थे ,वो . “खैर ! भविष्य तो हमें भी कहाँ सूझता है ….?” उन्होंने मुझे कई पलों तक घूरा था . “रहो,कुछ दिन हमारे साथ ! हमें प्रसन्नता होगी !! पर हाँ ….हो तो होनहार ,मेरे लाल ……….!!”

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!