Posted on

भारतीय नारी !

bhartiya naari

कहानी

“बलवंत का क्या बुरा है ….?” मैंने अनु को सुना कर जोरों से कहा था . मेरा यही उद्देश्य था कि अनु के जहन में बसे अनुराग के अति प्रिय प्रतबिंब को तोड़ डालूँ .

मैंने अनु की व्यथा को भांप लिया था . अनु के कजरारे नयनों से बहते गरम-गरम आंसूओं ने मुझे पिघला दिया था ….आहत कर दिया था ! अनु गज़ब की सुंदर थी . उस का हुश्न तो बे-जोड़ था ! कोई भी अनु को देख कर बेहोश हो सकता था . और अब ….शादी के बाद तो …जो छटा उस पर छाई थी …दर्शनीय थी !!

“म ….म …में …प्रेगनेन्ट …हूँ !” अनु के कांपते होठों ने बयान दिया था .

हे,भगवान् ! वही कहानी … वही अँधा मोड़ …वही तौमत ….और वही मुश्किल …? ये कैसा भाग्य है औरत का कि …जब भी वह अपने दायित्व के बंधन में बंध जाती है …परास्त हो जाती है …? मेरा वो मजनूं -महीप भी तो मेरी प्रेगनेन्सी को ले कर ही तो मुझे मजधार में छोड़ कर भागा था …? उसे लगा था – मैं न जाने कहाँ से कोई बच्चा लाने वाली थी….जो उस की संभावित जायदाद को सटक जाएगा !

“महीप भी तो मुझे …प्रेगनेंट को ही छोड़ कर भागा था …अनु !” मैंने उसे स्थिति समझने के लिए अपना ही उदाहरण दिया है . “हमारी तो शादी भी नहीं थी ?”मैंने उसे सच को समझाने की कोशिश की है . “लेकिन मैंने ….हाँ,हाँ …मैंने ….इसे सहा था , अनु ! टूट तो मैं भी गई थी . महीप की बे-वफाई को ले कर …मैं बिलख उठी थी , मेरी बहिन ! खंज़र जैसा एक अविश्वास मुझे भी ख़त्म करने लगा था ! पर मैं जी गई ….बड़ी हो गई…! रेनू को मैंने अकेले ही जन्म दिया . अकेले …निपट अकेलेपन में जिया मैंने ये जीवन ! लेकिन जो सहारा मुझे नन्ही रेनू ने दिया ….वो बेजोड़ था ! मेरे कलेजे के पास आ बैठी थी , रेनू …और मैं जी उठी थी !! “

“अ …अ …आप की बात अलग है , दीदी !” सुबकने लगी थी , अनु .

“क्यों ….?” तड़की हूँ,मैं . “अरे, तू मेरी पूरी बात तो सुन ….? “रेनू को ले कर मैं शिमला जा रही थी ….घूमने ! बस में साथ सफ़र करता -मुकुल रेनू से खेलने लगा था . बातों-बातों में हमारी दोस्ती हो गई . हम एक ही होटल में …और एक ही कमरे में जा रहे . और फिर …..”

“मुकुल ….?”

“गज़ब का हैंडसम ….मैन ….था , मुकुल ! मैं बाथ -रूम में थी तो इस ने …नांक किया . मैंने दरवाज़ा खोला …तो मुकुल अंदर ! भीतर से दरवाजा बंद कर लिया था , उस ने ! हाए ,राम ! मैंने अपने आप को ही अपने में समेटा था ! लेकिन मुकुल ने अब तक मुझे अपनी बांहों में भर लिया था ! अब ….? वो तो तोड़-फोड़ करने लगा था ! वो …तो …वो …तो …? सच कहूं,अनु …? मैं भी अपने कहीं गहरे में …उस मुकुल को अपना मान गई थी ! इसी लिए …मैंने न उसे ..रोका …न टोका….और न ही कोई असहयोग किया ! न जाने क्यों …और कैसे …एक रिश्ता कायम होता ही गया …! उम्र में छोटा था मुकुल मुझ से ! लेकिन जब वो प्रहार करता था …तो निरा नीग्रो लगता था ! ढाता ….खाता …तोड़ता -फोड़ता …सब , एक तूफ़ान की तरह आता …और मेरे आगोश में पहुँच रस पी कर शांत हो जाता ! लेकिन मुझे वो आंदोलित कर देता ….आप्लावित कर छोड़ता ….और …फिर ….”

“प्रेगनेंसी …..?” उस का भी यही सवाल था . “हुई कैसे ….?” वह भी चौंक गया था .

भाग गया था -मुकुल …मुझे बिन बताए ….और न जाने कहाँ …और क्यों ….?

पंकज को भी मैंने अकेले ही जन्म दिया था ! अब की बार मुझे अटपटा न लगा था ! न मैं टूटी थी …और न ही हारी थी ! मैंने पंकज को पा कर मानो पूरे जहां को ही पा लिया था -ऐसा लगा था, मुझे ! और तू देख रही है कि मैं …अपने दोनों बच्चों के साथ …किस ठाठ से रहती हूँ …? है क्या नहीं , मेरे पास ….?

बलवंत को रख लिया है . उस की पत्नी उसे छोड़ कर भाग गई है . ये अब मेरे ही साथ रहता है . घर का पूरा काम करता है . बच्चों को स्कूल छोड्ता है …अपना स्टोर चलाता है …और …अच्छा कमाता है ! मुझे ‘मैं-म साव’ कहता है . मेरी हर पसंद का ख़याल रखता है . मेरी एक-एक मुस्कान पर मरता है ! मेरा मूड देख कर चलता है . मुझे कभी भी नाराज़ नहीं करता . और लेता है ….तो देता भी है ….? अनुग्रह के साथ …याचना भरे शब्दों में …मांगता है …और फिर विनम्र भाव से …जो भी मैं देदेती हूँ …उसे ग्रहण करता है -एक प्रसाद की तरह ….सर चढा कर … ! आभार मानता है मेरा ,मेरा बलवंत !!”

“आप अलग हैं ….!” अनु ने मुझे भागती निगाहों से घूरा है . “मैं अनुराग को नहीं भुला सकती ….” उस ने एक जिद ….या जिहाद जैसा वाक्य बोला है . “हमारा प्यार अलौकिक है …अलग है …और चिर-नूतन …और नया है ! मैंने अनुराग को मन-प्राण से वरा है ….और अनुराग ने भी मुझे अपनी अंतरात्मा से स्वीकारा है ! मैं जानती हूँ ….वो मेरे बिना …..”

“पुरुष ……?” मैंने प्रश्न चिन्ह लगाना चाहा है .

“नहीं …!” अनु ने मुझे चुप कर दिया है . “घर वालों ने दिमाग खराब किया है !” फिर से रोने लगी है , अनु . “उन्हें …दहेज़ ….पैसा ….जायदाद …और न जाने क्या-क्या …उम्मीदें थीं …अनुराग की शादी में मिलेंगी …? लेकिन …..”

“तुम भी तो किसी जायदाद से कम नहीं हो ….?” मैंने अनु को हौसला देना चाहा है . “अनुराग से ज्यादा कमाती हो ….? और तुम्हारा तो …फ्यूचर …भी …”

“मैंने अब जीना ही नहीं है !” अनु ने सुबकते हुए कहा है . “अनुराग ने मुझे पीटा है ….. ” वह रो पड़ी है . “अनुराग ने …..अनुराग ने …मुझे …प्रेगनेंसी …..???” अनु विह्ववल है …..अनु अब करुना के आंसू बहाने लगी है …!

“आ …! अंदर आ ….!!” मैंने उसे घर के भीतर बुलाया है .

“नहीं ….!!” वह साफ़ नांट गई है .

और लो …..! उस ने तो तिमंजिले से नीचे छलांग लगा दी है !

धन्य हो , मेरी भारतीय नारी …….!! तू न जाने कब समझेगी कि …पु-रु-ष का नया नाम …बलवंत है ….अनुराग नहीं …..!!

…………………………

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!