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मानवता

वसंत का आरंभ था।।
कनेर की एक मोटी,मजबूत डालदेख कर,
मधुछत्र डाल दिया गया।।
मधुमक्खियां दूने उत्साह से काम कर रही थीं।।
छोटे-बड़े असंख्य फूलों से मकरंद चूसा गया।।
दिन रात एक हो गए।।
लंबे समय से चली आ रही मेहनत-मशक्कत ने मूर्त रूप लिया और छत्ता बनके तैयार हुआ।।
भारी भरकम सा छत्ता।।
अधिकता से,मधुरस टपकता था।।

रानी मधुमक्खी ने कुटुम्ब बसाने की कवायद शुरू की।।

पूर्णिमा से ठीक एक रात पहले,दो मानवों का आगमन हुआ।।
काले,लंबे हाथों में मशाल थी,
छोटी,उजली आंखों में लिप्सा।।
छत्ते में आग लगा दी गई।।
छत्ता भभक उठा।।

कई तो दम घुटने से,
और कई जलकर
हज़ारों मक्खियां दम तोड़ गयीं।।
कुछ जान बचाकर उड़ निकलीं।
कुछ ने,
इन विशालकाय शत्रुओं से मुकाबला करने की भी सोची,
पर वीरगति को प्राप्त हुईं।।
दुर्भाग्यवश,
ईश्वर की सभी कृतियों में मानव सर्वशक्तिमान है।।

जली-भुनी सैकड़ों मधुमक्खियां ज़मींदोज़ हो गईं।।
लुटेरे शहद लेकर,
विजयी भाव से चलते बने।।

                                ।।समाप्त।।