सत रंगी के लिखे प्रेम गीत को पूरन लाल की बनाई धुन और भ्रमर की आवाज ने एक तूफान की तरह फिजा पर टांग दिया था।

एकांत में बैठ राधू रंगीला ने इस प्रेम गीत को कई बार सुना था – बार-बार सुना था और गीत की लोकेशन सैट करने में उसे लंबा समय लगा था।

अब इस प्रेम गीत को प्रतिष्ठा और मानस ने कैमरे के सामने गा कर प्राणवान बनाना था। प्रेम भावना को आकार देने के लिए इन दोनों का दायित्व सर्वश्रेष्ठ था। एक-एक एक्सप्रेशन मायने रखता था। राधू रंगीला को मानस पर तो अटल विश्वास था। वो अब तक सिनेमा को समझने लगा था। लेकिन प्रतिष्ठा अभी तक इस खेल में कच्ची थी।

“मेरी समझ में तो ये गीत ही नहीं आता है राधू जी।” प्रतिष्ठा ने गाने की स्क्रिप्ट में कमियां गिनाई थीं। “क्या है ये मछरिया-कछरिया?” उसने रोष जाहिर किया था।

“बैठिए-बैठिए।” राधू रंगीला हंसा था। “मैं आप ही के बारे सोच रहा था। राधू ने सीधा प्रतिष्ठा को आंखों में देखा था। “प्यार की परिभाषा – पागलपन ही तो है।” राधू ने अपनी राय सामने रक्खी थी। “अच्छा खासा आदमी प्यार में पड़ कर राह भूल जाता है।” उसने बयान दिया था। “आप ने भी अब पागल हो जाना है प्यार में।” हंस रहा था राधू।

प्रतिष्ठा चुप थी। मामला गंभीर था। जिस प्रेम भावना से उसका परिचय था वह तो कुछ और ही थी। वह तो मानस के साथ …

“मानस के साथ नहीं मैडम – कैमरे के साथ गाना है, प्रेम गीत। तब आपको मछरिया और ढोला का अर्थ समझ आ जाएगा।” राधू खुल कर हंसा था।

मानस खड़ा-खड़ा स्नेहिल निगाहों से अनाड़ी प्रतिष्ठा को अपलक देख रहा था।

“मेरी मछरिया … मेरे ढोला – गीत का मुखड़ा है।” राधू रंगीला समझा रहा था। “मेरा मन डोले, मेरा तन डोले – ये प्रेमी और प्रेमिका का इजहार है। दोनों ने कैमरे के सामने डोल कर दिखाना है। साथ जीएंगे साथ मरेंगे – ये उनका वायदा है। मेरी मछरिया – मेरे ढोला के दो प्रेम निवेदन हैं मैडम।” राधू रंगीला गीत की काया में अंदर घुस गया था।

प्रतिष्ठा और मानस बार-बार गीत गा रहे थे। राधू रंगीला हर बार कैमरे से अलग-अलग उपलब्धियां पा लेता था। कभी आंखों से तो कभी होंठों से दोनों गीत का अर्थ समझाते तो कभी वो दोनों आलिंगन बद्ध नजर आते।

न जाने कितनी बार परिधान बदले गए। न जाने कितनी बार लोकेशन शिफ्ट हुई। और न जाने कितने संदेश भेजे गए। गीत के बोल, गीत का संगीत और गीत की धुन ने मिल कर प्रतिष्ठा और मानस को सशरीर जीवंत कर दिया था।

अब वो दो प्रेमी थे – जिन्हें दर्शक जानते थे। वो प्रेम गीत था – जिसे दर्शकों ने कई बार गाया था। वो प्रेम भावना थी जिस से दर्शकों का प्रगाढ़ परिचय था। वो सारी गीत की लोकेशन दर्शकों की अपनी लोकेशनें थीं – जहां वो कई बार गए थे और उन्होंने इसी तरह का प्रेम गीत गाया था।

“एडिट हो कर आते ही तब आपको सुनाएंगे ये गीत।” राधू ने प्रतिष्ठा से वायदा किया था। “अभी तो आधी जंग तय हुई है। आउट डोर तो बाकी है।” राधू रंगीला ने प्रतिष्ठा को खबरदार किया था।

हारी थकी प्रतिष्ठा बेहोश होने को थी।

आज प्रेम गीत को टुकड़ों-टुकड़ों में, कतरों-कतरों में गाना था और जर्रे-जर्रे से हीरो और हीरोइन की मुलाकात होनी थी। अब हीरो और हीरोइन आसमान पर उड़ते चले जा रहे थे। मछरिया के पीछे भागता ढोला उसे पकड़ लेना चाहता था। लेकिन मछरिया थी कि मचल रही थी, दूर भाग रही थी, हंस रही थी और …

दृश्य बदल गया था। अब कैमरा एक बर्फीली चोटी पर जा बैठा था। और वहां एक नए स्वर्ग का निर्माण हो गया था। बर्फ के बिछौने पर प्रेमी और प्रेमिका मार-धाड़ में लगे थे। बर्फ के गोले बना-बना कर एक दूसरे पर प्रेम प्रहार कर रहे थे। हंस रहे थे। भाग रहे थे। एक दूसरे को पकड़ रहे थे, पा रहे थे, खो रहे थे और फिर …

दृश्य फिर बदल गया था। डल झील में तैरते शिकारों के जमघट में प्रेमी और प्रेमिका एक शिकारे में आ बैठे थे। दोनों अब चप्पू चला रहे थे। शिकारा झील के भीतर समाता चला जा रहा था – दूर और दूर। और तब दोनों के स्वर सुनाई दिए थे – ओ मेरी मछरिया, ओ मेरे ढोला। दृश्य क्षितिज के पेट में विलीन हो गया था।

और अब दोनों हीरो और हीरोइन नदिया किनारे आ बैठे थे। नदी के नीले जल में पैर डुबोए दोनों बैठे-बैठे मधुर संवाद बोल रहे थे। हीरो जिद कर रहा था कि वो निर्वसन हो कर नदी में नहाएंगे। हीरोइन लजा रही थी। सिमट रही थी। भाग रही थी। नदी बहती रही थी। दृश्य भी चलता रहा था …

“आप का बॉडी चार्म अचूक बुलट है, मैडम, जो पब्लिक का मन जीत लेता है।” राधू रंगीला दृश्य समझा रहा था। “पब्लिक को ये सब दिखाना होता है। पब्लिक सब समझ लेता है। अपने-अपने मन के मुताबिक वो कहानी को ले लेता है। उसका मन चाहा अगर उसे मिल जाए तो सीट से उठ कर नहीं जाता।” राधू ने निगाहें मोड़ कर मानस को देखा था। “पुरुष का तो होना ही सब कुछ होना होता है।” राधू ने बात का निचोड़ कह दिया था। “अगर पुरुष ढुल मुल भी है तो भी लोग उसे प्यार करते हैं। उसका होना …”

“आवश्यक है।” प्रतिष्ठा ने बात पूरी की थी।

मानस खूब हंसा था। उसे खुशी हुई थी कि प्रतिष्ठा ने अंततः गीत को मंजूरी दे दी थी।

चाय पीने के बाद राधू रंगीला की टीम कुछ अलग से षडयंत्र रचने लगी थी।

भेड़ बकरियों का एक झुंड दूर खेतों में दिखाई दे रहा था। प्रतिष्ठा को ठेठ देसी लड़की का परिधान पहनाया गया था। मानस खेत में काम करते धीरज के रोल में था। और जब वो दोनों कैमरे के सामने आए थे तो कैमरा उठ कर खेतों पर जा टिका था।

नब्बो की भेड़ बकरियां अब धीरज के खेत को खा रही थीं।

“नब्बो …!” धीरज जोरों से चिल्लाया था। “तेरी बकरियां …?” उसने खेत की ओर हाथ से इशारा किया था। “मेरा … खेत …”

“खान दे … खान दे …।” नब्बो हंस रही थी। “नब्बो की बकरियां … धीरज का खेत नहीं खाएंगी तो क्या खाएंगी?” नब्बो बिफर-बिफर कर हंस रही थी।

सैट पर आए सारे लोग हंस रहे थे। राधू भी हंस रहा था।

“बहुत अच्छे।” राधू ने मानस को बधाई दी थी। “कमाल कर दिया मैडम आपने।” उसने प्रतिष्ठा की प्रशंसा की थी। “अब देखना इस गीत का पर्दे पर कमाल।” रंगीला ने सफलता की गारंटी दी थी।

प्रतिष्ठा ने पहली बार महसूसा था कि राधू रंगीला भी फैक्ट्स् और फिक्शन को जोड़ने की कला में बेजोड़ था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading