राधू रंगीला ने दलदल के आस पास तीन और नकली दलदल बनवाए थे। तीनों के ऊपर कैमरे लगे थे। तीनों के ऊपर अलग-अलग काम होना था। काम की समझ केवल राधू रंगीला को ही थी।

प्रतिष्ठा और मानस को तैयार किया गया था। उनके बॉडी डबल भी तैयार हुए थे। दलदलों को शूटिंग से पहले रोशन किया गया था। मुख्य दलदल में सबसे पहले बॉडी डबल निकलने का संघर्ष करते दिखे थे। उस संघर्ष को कैमरों में कई-कई कोणों से कैद किया गया था। दलदल से निकलने का ये संघर्ष लंबा चला था। कई-कई बार दृश्य को फिलमाया गया था।

बीच में चाय के लिए सब रुक गए थे। बे दम हुए कलाकार सांस लेते लग रहे थे।

“ये सब है क्या राधू जी?” प्रतिष्ठा बोर हो चुकी थी तो पूछा था। उसने अभी तक दलदल में डूबते तैरते बॉडी डबल को ही देखा था।

“ये रोमांस और रोमांच का मिक्सचर है प्रतिष्ठा जी।” राधू रंगीला चाय की चुस्कियां लेते-लेते बता रहा था। “यों समझिए कि जैसे ही हीरो हीरोइन को खींच कर किनारे लाता है – फिसल जाता है। वह हैरान और परेशान है। अब दर्शकों पर क्या गुजरेगी, सोचिए प्रतिष्ठा जी।”

“वो … वो निराश होंगे।” प्रतिष्ठा ने बताया था।

“हां। ये है कैच पॉइंट।” राधू खुश-खुश मान गया था। “और जब हीरो किनारे से तनिक दूर है। वह दम लगा रहा है। तब किनारा …? अब दर्शक क्या सोच रहा है – बोलो?”

“दुआ कर रहा है कि किनारा पा ले हीरो।” प्रतिष्ठा ने बताया था।

“हां। यही तो है रोमांच।” राधू मानता है। “और रोमांस कब दिखेगा?”

“जब हीरो और हीरोइन के नैन मिलेंगे।” प्रतिष्ठा ने हंस कर कहा था।

“हां। बिलकुल ठीक।” राधू ने चाय का खाली प्याला रख दिया था। “अब चलेगा आप दोनों का नम्बर।” अब नैन से नैन मिलेंगे।” राधू ने प्रतिष्ठा को अपांग देखा था।

प्रतिष्ठा शर्म से दोहरी हो गई थी।

और सच में दूसरे छोटे नकली दलदल में अब मानस और प्रतिष्ठा को कैमरे के सामने लाया गया था।

“इस तरह नहीं चलेगा मैम।” राधू रंगीला ने प्रतिष्ठा को चेतावनी दी थी। “नजरें इनायत इस तरह नहीं होतीं।” वह समझा रहा था। “नजरों के जरिए संदेश भी जाता है मैम। जैसे मैं आभारी हूँ का संदेश।”

“समझ गई।” प्रतिष्ठा फिर से शर्मा गई थी।

“और मानस जी!” राधू दूसरी ओर मुड़ा था। “आप क्या संदेश देंगे अपनी प्रेमिका को?”

मानस चुप था। उसने पलट कर प्रतिष्ठा को देखा था। प्रतिष्ठा ने नजरें नहीं मिलाई थीं। मानस ने उत्तर दिया था – आई लव यू!

“नहीं-नहीं। अभी नहीं कहना आई लव यू सर।” राधू समझाने लगा था। “वो तो अभी बहुत दूर है। अभी तो कहना है – तुम्हारी चितवन पर बलिहारी हम।”

शूट समाप्त हो गया था और तालियां बजती रही थीं।

झरने को शूटिंग के लिए तैयार करने में दो दिन लगे थे।

इन दो दिनों में राधू रंगीला और उसकी टीम ने जी तोड़ मेहनत की थी। तीन अलग-अलग स्थानों पर आर्टीफीशियल झरने तैयार किए थे। तीनों पर कैमरे लगे थे। बॉडी डबल को सबसे पहले मुख्य झरने पर बदन पर लगे कीचड़ को धोने का अभिनय करना था। हीरो हीरोइन को छूता है। फिर उस पर पानी उलीचता है। हीरोइन शर्माती है। फिर हीरोइन हीरो का कीचड़ धोती है। हीरो मुसकुराता है। कैमरा उन दोनों के अंग शौष्ठव को कैच करता है। फिर इन इमेजों को इनलार्ज किया जाता है। शूट कम्पलीट हो जाता है।

अगली शूटिंग के लिए सब कुछ अलग से तैयार होता है।

ऑरीजनल हीरो हीरोइन आते हैं। झरना आर्टीफीशियल होता है। दृश्य रोमांटिक होता है। अभिव्यक्ति के लिए लाइट सबड्यूड होती है। पहले प्रतिष्ठा को मानस छूता है। प्रतिष्ठा प्रतिक्रिया देती है। मानस प्रतिष्ठा को आगोश में ले लेता है। प्रतिष्ठा मानस के कंधे पर सर टिका देती है। कैमरा उसका एक्सप्रेशन कैच करता है।

तीसरे झरने पर काम चल रहा है। बॉडी डबल आपस में लिपट-लिपट कर पानी में डुबकी लगाते हैं। एक दूसरे को छोड़ते पकड़ते हैं। पूरा झरना पानी में उठी हिलोरों से भर जाता है। कैमरा शूट को कैच करता है।

दृश्य बदल जाता है। नहाए धोए हीरो और हीरोइन कैमरे के सामने आ जाते हैं। अब दोनों की निगाहें मिलती हैं। दोनों मुसकुराते हैं। हीरो तनिक आगे आ कर हीरोइन का हाथ पकड़ता है। हीरोइन लजा जाती है। हीरो आहिस्ता से पूछता है – क्या नाम है तुम्हारा?

“नब्बो।” कांपते होंठों से हीरोइन उत्तर देती है।

“ना-ना।” हीरो आंखें नचा कर कहता है। “मैं तो तुम्हारा नाम हुस्न परी रक्खूंगा।” वह हीरोइन को बांहों में समेटता है। “और मैं तुम्हें परी कह कर पुकारूंगा।”

हीरोइन शर्माती हुई हीरो की बांहों में सिमट आती है।

“अपना नाम बताओ?” हीरोइन हीरो के कान में फुसफुसाती है।

हीरो मुसकुराता है। निगाहें भर कर हीरोइन को देखता है। हीरोइन शर्माती है।

“धीरज।” हीरो आहिस्ता से अपना नाम बताता है।

“पर मैं तो तुम्हारा नाम प्रेम देवता धरूंगी।” आग्रह करती है हीरोइन। “और मैं तो तुम्हें देव कह कर बुलाऊंगी।” कहते-कहते वो अपना निचला होंठ काट लेती है।

तालियां बज उठी हैं। राधू रंगीला बेहद खुश है।

आज की शूटिंग समाप्त हुई। सभी चाय पीते हैं। आपस में गप शप चल रही है। प्रतिष्ठा और मानस अलग दो कुर्सियों पर बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे हैं। दोनों प्रसन्न हैं। आज का काम ठीक निकल गया है, अत: दोनों खुश हैं।

“मान गए तुम्हें प्रतिष्ठा।” मानस ने प्रतिष्ठा को निगाहें भर कर देखा है। “तलाश लिया तुमने अपना देव।” जोरों से हंसा है मानस।

लाज की मारी प्रतिष्ठा दोहरी हो गई है। उसे एहसास हुआ है कि अब उसका मन मानस कोरा नहीं रहा है। अब वो मानस की हो गई है।

“तुम कौन कम हो।” प्रतिष्ठा ने भी वार किया है। “छुपे रुस्तम हो।” उलाहना दिया है प्रतिष्ठा ने। “तुमने भी तो तलाश ली है – अपनी परी?” प्रतिष्ठा ने भरपूर निगाहों से मानस को देखा है।

दोनों की निगाहें मिली हैं। दोनों ने एक दूसरे का आगत स्वागत किया है।

“मुझे इस राधू रंगीला से डर लगता है प्रतिष्ठा।” मानस ने व्यंग किया है।

“इससे तो मैं भी डरती हूँ मानस।” प्रतिष्ठा ने मानस का हाथ भिंचा है। “डायलॉग गलत हुआ तो ये न मानेगा।” हंसी है प्रतिष्ठा।

“बिलकुल न मानेगा। निरा धूर्त है।” मानस ने रंगीला की खिल्ली उड़ाई है।

राधू रंगीला ने तभी उन दोनों को निगाहों में भर कर देखा है।

Major krapal verma

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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