तोचीगढ़ में आकर तांगा रुका था तो आनंद खबरदार हो गया था।

सबसे पहले आनंद को चिंता हुई थी कि उसने जो बेशकीमती जूते पहने थे, तांगे से उतर कर जमीन पर पड़ते ही मैले हो जाएंगे।

गांव के लोग तांगे के आस पास इकट्ठे हो गए थे। सभी ने मन में मान लिया था कि वो कोई अजनबी नहीं बंबई से लौटा कुंती का बड़ा बेटा आनंद था।

“लाइए। मैं सामान लिए चलता हूँ।” एक युवक ने आनंद से ब्रीफकेस ले लिया था।

उन जमा लोगों के साथ-साथ आनंद ने अपने घर तक का सफर असमंजस में तय किया था। तोचीगढ़ में कुछ न बदला था। हां। उसके घर पर एक नेम प्लेट नई लगी थी। लिखा था – कुंती कुंज। आनंद का मन प्रसन्न हो गया था। बिल्लू ने मां की नेम प्लेट लगवा कर एक सराहनीय काम किया था – आनंद सोचता रहा था।

और तभी बिल्लू घर के भीतर से दौड़ता चला आया था।

बिल्लू ने आनंद के चरण स्पर्श किए थे और फिर दोनों भाई भुजाएं पसार-पसार कर मिले थे। बिल्लू बड़ा हो गया था – आनंद ने अपनी आंखों से देखा था।

घर के वही दो कमरे और एक रसोई घर था। एक कमरे में बीमार मां सोई थी तो दूसरे में बिल्लू का रहने का ठाठ-बाट सजा था। आनंद मां के कमरे में घुसा था। एक बेहद उबाऊ और बासी गंध कमरे में भरी थी। आनंद ने सांस संभाल कर मां के तपते माथे पर अपनी हथेली रख दी थी। मां ने आंखें खोल दी थीं।

मां की डबडबाई आंखों में आनंद सशरीर उतर आया था।

आंखें आंसुओं से लबालब भरी थीं। होंठ कांप रहे थे। हाथ उठने की चेष्टा कर रहे थे। लेकिन वो छोटा सा उठा तूफान शांत हो गया था।

“मैं आ गया हूँ मां …।” आनंद ने रोते-रोते कहा था। “देर हो गई …” वह रोता रहा था।

डॉक्टर आया था तो आनंद ने मां की बीमारी के बारे विस्तार से बातें की थीं।

“एक दो दिन की मेहमान हैं।” कुंती की बीमारी के बारे आम राय थी।

सुबह के चार बजे मां का महाप्रयाण सम्पन्न हुआ था। दोनों भाई जग रहे थे। मां के आगे पीछे खड़े थे। लेकिन होतव्य तो होना ही था।

“बिल्लू ही बड़ा है।” जब सर मुंडन की बात आई थी तो आनंद ने तर्क दिया था। “इसी का मुंडन करो। यही सब संभालता है। मैं तो …” आनंद कहते-कहते रुक गया था।

मां की तेरहवीं पर कुछ नए लोग आए थे। बिल्लू की शादी के बारे बात चली थी।

“मां का मन था भइया तो मैं भी मान गया था।” बिल्लू ने आनंद को बताया था। “अब आप जानें।” उसने आनंद की आंखों में देखा था।

आनंद को लगा था कि बिल्लू का भी मन था शादी करने का।

और तब बिल्लू ने बताया था कि जो पैसे वो भेजता रहा था उससे मां बेटों ने और ढाई बीघा जमीन खरीद ली थी। अब वो पांच बीघा के मालिक थे।

“शादी होगी तो पैसे चाहिए भइया।” बिल्लू ने अगली गोट भी सरका दी थी।

आनंद को लगा था कि वो तोचीगढ़ नहीं बल्कि एक ऐसे चौराहे पर आ खड़ा हुआ था जहां से अनेकों राहें अनेकों ठौर ठिकानों के लिए जाती थीं।

वो किधर जाए – आनंद के सामने प्रश्न आ खड़ा हुआ था।

लेकिन बिल्लू के पास कम्प्लीट प्लान थी जिसमें दोनों भइयों का विस्तार था और मां की अंतिम ख्वाइश भी पूरी होती थी।

“ये कदम खंडी है भइया।” बिल्लू बता रहा था। “साढे सात बीधा का रकबा है। इसका सौदा सस्ते में हो जाएगा। हमारे पास पांच बीघा पहले से जमीन है। इस जमीन के आने के बाद हम दोनों ठीक से खाने कमाने लगेंगे।” बिल्लू हंसा था।

आनंद ने कदम खंडी को एक नए सरोकार के साथ देखा था। दो जंगी कदम के पेड़ थे। आस पास घना जंगल उगा था। बीच में एक छोटा तालाब था। बड़ी सुहावनी रौनक आस पास बैठी थी। साढे सात बीघा का रकबा भी खूब खुला-खुला था। आनंद का मन रीझ गया था।

“मेरा विचार है भइया कि हम आपकी कोठी बनाएंगे। आपकी शादी के बाद आप यहां रहेंगे। हमारे पास दो घर हो जाएंगे। अच्छी जमीन आ जाएगी। फिर हम दोनों भाई मिल जुल कर कारोबार करेंगे।”

बिल्लू ने एक सजीला सपना आनंद के सामने ला खड़ा किया था।

“पहले तुम्हारी शादी …?” आनंद ने यूं ही प्रश्न पूछा था।

“हां। पहले मेरी शादी हो जाए उसके बाद ही जमीन का सौदा करेंगे।”

“पैसा …?” आनंद कहते-कहते डर गया था। वह जानता था कि उसके पास कुल पांच हजार रुपये ही थे। बिल्लू ने तो बता दिया था कि जो कुछ पैसा आया था उसकी जमीन खरीद ली थी।

“शादी में मान लो भइया कि पांच से दस हजार खर्च हो जाएंगे।” बिल्लू ने अनुमान बताया था। “ये कदम खंडी भी दस हजार तक मिल जाएगी।” उसने सारा जमा जोड़ आनंद के सामने रख दिया था।

“लेकिन … लेकिन बिल्लू …?” आनंद के पसीने छूटने लगे थे।

“यही बड़ा मोर्चा है भइया। आपकी शादी के लिए तो हम समर्थ हो जाएंगे। कमाने लगेंगे।” बिल्लू हंसा था। “दोनों भाई जुटेंगे तो पहाड़ हिला देंगे।” बिल्लू ने आनंद की आंखों को पढ़ा था। “डरो मत भइया। मौका है। काम कर लेते हैं।”

बिल्लू समझ रहा था कि आनंद अपने पैसे निकालने में डर रहा था।

“लेकिन … लेकिन मेरे पास इतने पैसे हैं कहां बिल्लू?” आनंद बिलख उठा था। “मेरे पास – मेरे पास तो कुल गिने चुने पैसे हैं।” आनंद ने स्पष्ट कहा था।

बिल्लू चुप हो गया था। बिल्लू का उत्साह उतर गया था। उसका चेहरा घोर निराशा में जा डूबा था। वह अब कहीं और देख रहा था। उसे जंच गया था कि शायद उसकी शादी भी न हो। पैसा अब और कहां से आएगा?

आनंद को अच्छा न लगा था। वह बिल्लू को निराश न करना चाहता था। बिल्लू की बताई योजना भी कारगर थी। अगर दोनों भाई साथ-साथ आ जाते हैं और कदम खंडी में उसकी भी अलग कोठी बन जाती है, शादी हो जाती है … और …

“हो जाए जुगाड़ पैसे का तो देख लो भइया।” बिल्लू ने अंतिम आराधना की थी।

“ठीक है। मैं सोचता हूँ बिल्लू।” आनंद ने बिल्लू को साध लिया था।

दोनों भाई रीते हाथों कदम खंडी से घर लौट आए थे।

आनंद गहरी सोच में डूबा था। बार-बार उसे राम लाल याद आ रहा था। वह जानता था कि राम लाल के पास पैसे की कमी न थी। अगर वो लौटने से पहले पैसे की मांग सामने रख देगा तो राम लाल अस या बस पैसे भेजेगा जरूर। एक बार पैसे पहुंचने के बाद तो …

कदम खंडी में कोठी बना कर और शादी रचा कर रहने का सपना आनंद को भी बहुत भा गया था। वह राम लाल, कल्लू और कदम की कैद से मुक्त हो जाएगा – वह मान रहा था।

“प्लीज सैंड रुपीज 20000 इमीडिएटली।” आनंद ने राम लाल के नाम होटल के पते पर टैलीग्राम भेज दिया था। “पैसे आ रहे हैं बिल्लू।” आनंद ने अपने छोटे भाई को निराश नहीं किया था।

अब दोनों भाई अपने नए सपनों से खुल खेल कर हंस बोल रहे थे।

Major krapal verma

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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