वॉर रूम इंडिया को उन तीनों ने नई निगाहों से देखा था।

इस तरह के वॉर रूम हर उस देश के नाम पर बने थे जहां इस्लाम का कब्जा नहीं था। वॉर रूम एक विशालकाय कक्ष था जहां हर तरह की खबरें, वीडियो, मैगजीन, अखबार और गुप्त सामग्री उपलब्ध थी। वॉर रूम में चार आदमी ड्यूटी पर थे जो कुछ भी मांगने से मोहिया कराते थे और हर तरह से क्लाइंट की मदद करते थे। वॉर रूम प्रकोष्ठ में हिन्दुस्तान के बारे हर खबर, सामग्री और सूचनाएं उपलब्ध थीं।

सामने की दीवार पर मोटे अक्षरों में लिखा था – वाई टू डेस्ट्रॉय इंडिया? और उसी के ठीक दूसरी ओर लिखा था – वाई नॉट टू डेस्ट्रॉय इंडिया?

वो तीनों खड़े-खड़े उन दो लिखे कैप्शनों को बार-बार पढ़ते रहे थे। हिन्दुस्तान को क्यों नहीं नष्ट कर दिया जाए और फिर हिन्दुस्तान को क्यों नष्ट कर दिया जाए दो बड़े ही मार्मिक प्रश्न थे। लगातार आक्रमण झेलते-झेलते हिन्दुस्तान आज एक समर्थ राष्ट्र बन गया था – ये एक आश्चर्य नहीं तो और क्या था?

दीवारों पर लगी फुल साइज की हिन्दुस्तानी नेताओं की तस्वीरें अपनी-अपनी कहानी स्वयं ही कहती रही थीं। हिन्दू नेता थे, मुसलमान नेता थे, ईसाई नेता थे, सिक्ख नेता थे और वो सभी नेता थे जो हिन्दुस्तान के लिए महत्वपूर्ण रहे थे।

“हमारे लिए कोई संदेश है?” मुनीर खान जलाल ने वॉर रूम के इंचार्ज से प्रश्न किया था।

“जी सर!” उस व्यक्ति ने स्वीकारा था और कंप्यूटर का बटन दबा कर संदेश पढ़ाया था।

इस वक्त हिन्दुस्तान में तेरह करोड़ मदरसे हैं। आपने तीस करोड़ मदरसे बनाने हैं।

उन तीनों ने एक दूसरे को सकपकाते हुए देखा था। सटीक जानकारी उपलब्ध थी इस वॉर रूम में। वो तीनों अब खबरदार हो गए थे।

“डूज और डॉन्ट्स की लिस्ट भी देख लीजिए!” इंचार्ज ने प्रस्ताव सामने रक्खा था और उन्हें बाएं कोने में लगे सोफों पर बिठा कर कंप्यूटर चला दिया था।

स्क्रीन पर एक-एक कर क्या करना था ये पहले आया था और क्या नहीं करना था ये बाद में उजागर हुआ था। कौन था ये जो हिन्दुस्तान को इतनी बारीकी से जानता था – वो तीनों एक ही प्रश्न पूछते रहे थे।

“हिन्दुस्तान के किसी भी शहर के बारे में कुछ जानना चाहेंगे?” इंचार्ज ने विनम्रता पूर्वक प्रश्न पूछा था।

“हां!” मुनीर खान जलाल ने इच्छा जाहिर की थी। “लखनऊ के बारे में बताएं!” उसने मांग की थी।

मुनीर खान जलाल ने एक चालाक चाल चली थी। वह लखनऊ को देख आया था अतः अब आश्वस्त हो जाना चाहता था कि वॉर रूम सही बताता है या गलत। वैसे भी लखनऊ का स्थान मुगल इतिहास में अलग ही था।

“लखनऊ गंगा जमनी तहजीब का गढ़ रहा है।” स्क्रीन पर लिखा पढ़ रहे थे वो तीनों। “लेकिन 1947 के बाद शहर बदला पाकिस्तान से आए लोगों ने। उन्होंने जब डेरा डाला तो कुछ नया पुराना हुआ। लखनऊ के नवाबों के जमाने के हजरत गंज और अमीनाबाद आज भी दिल्ली के कनाट प्लेस और चांदनी चौक बने हुए हैं। लेकिन 1947 के समय वहां एक गड़बड़ झाला बाजार भी उठ हुआ था। इसे रिफ्यूजी मार्केट भी कहते थे। जमीन पर दरियां बिछा-बिछा कर रिफ्यूजियों ने सस्ता सौदा बेचना शुरू किया था। फिर तो देखते-देखते दो सौ दुकानों वाला एक बाजार उठ खड़ा हुआ था। आज भी ये बाजार सस्ते माल के लिए मशहूर है। माल की गारंटी मांगने पर दुकानदार कहता है – चले तो चांद तक और न चले तो शाम तक!

लखनऊ उत्तर प्रदेश का कल्चरल शहर है। यहां मुगलों की पहचान और उनकी तहजीब आज भी जिंदा है। उत्तर प्रदेश को मिनी पाकिस्तान कहा जाता है। यहां के इस्लामिक इंस्टीट्यूट्स हिन्दुस्तान का ब्रेन सेंटर हैं।

जितने भी जलजले, बवंडर या भूचाल जन्म लेते हैं सबका एपीसेंटर यही उत्तर प्रदेश होता है।” कंप्यूटर ने बात समाप्त कर दी थी।

“मियां लियाकत अली ने कुछ भी झूठ नहीं बोला था।” मुनीर खान जलाल ने स्वीकार में सर हिलाया था।

“क्या आप ने देखा है लखनऊ सर?” शगुफ्ता सोलंकी ने प्रश्न पूछा था।

“अब फिर से देखूंगा!” माथे पर उग आई पसीने की बूंदें पोंछते हुए मुनीर खान जलाल ने जवाब दिया था।

मंजूर अहमद न जाने क्यों सकते में आ गए थे।

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मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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