मग्गू और कल्लू उसके घर के एकांत में बैठे पी रहे थे।

“चुनावी मोर्चा हर रोज कठिन होता जा रहा है कल्लू।” मग्गू के माथे पर चिंता रेखाएं उभर आई थीं। “लगता नहीं कि इस बार पार पड़ेगी।” मग्गू का कंठ स्वर कांप गया था। “विलोचन ने इस बार पूरा दमखम लगा दिया है। बबलू ने जान झोंक दी है और पल्लवी ने तो कमाल ही कर दिया है।” मग्गू ने गिलास से लंबा घूंट भरा था। “लगता है पल्लवी की ये नारी शक्ति इस बार हमें ले बैठेगी।” निराश था मग्गू।

“कैसी बात कर दी दोस्त?” कल्लू बिगड़ा था। “कल्लू की किताब में तो कहीं शिकस्त लिखी ही नहीं है।” वह हंसा था। “वो … वो मेरा मुन्नी कांड हुआ था न? वो तो …” कल्लू ने मग्गू की आंखों में देखा था।

“तब तो मैं भी मजबूर था कल्लू।” मग्गू भीग सा गया था। “जात बिरादरी का पेच पड़ गया था। मुन्नी ऊंची जात थी न। इसलिए विलोचन के सामने झुकना पड़ा था।”

“वो तो सही है यार।” कल्लू मान रहा था। “लेकिन प्रेम प्रीत के बीच …?” कल्लू टीस आया था। “लेकिन कल्लू का करम – मैं तो यही कहता हूँ।” कल्लू ने हाथ झाड़ दिए थे।

“अब तुम इस चुनाव की फिक्र करो यार।” मग्गू की मांग थी।

“पहले पंडित अवध नारायण से शुभ लग्न पूछ लेते हैं।” कल्लू का सुझाव आया था। “उसी लग्न के हिसाब से दिन तारीख तय करेंगे।” कल्लू की आंखों में नई चमक थी। “स्वामी जी से भी तो आशीर्वाद लेना है।” कल्लू ने याद दिलाया था। “इस बार सी एम को बुलाएंगे।” कल्लू मुसकुराया था। “उसके साथ दो एक मंत्री बजंत्री भी आएंगे ही। बस काम बना धरा है मग्गू।”

“इससे तो कल्लू …” मग्गू बिदका था। “उसकी पार्टी का है सी एम यार।”

“क्या फर्क पड़ता है भाई। हमने तो बैंड बाजा बजवाना है। तुम्हारे नाम के नारे लगवाने हैं। लोगों को चाय पानी पिलाना है। माना करो मग्गू। खर्चा करोगे तो फल तो मिलेगा।”

कल्लू की बात में दम था। मग्गू ने भी इस मौके को भुनाना चाहा था। भीड़ आएगी, पब्लिक जमा होगी, चाय नाश्ता चलेगा और फिर तो …

“स्वामी जी का आशीर्वाद …” अचानक मग्गू को याद हो आया था। “हां-हां यार, स्वामी जी का वही आशीर्वाद – सी एम बनोगे … पी एम बनोगे?” मग्गू का मन हुलस आया था। “अगर वही आशीर्वाद फिर से मिलता है तो … फिर तो?”

“कल्लू।” मग्गू कुछ सोच कर बोला था। “एक पते की बात।” मग्गू ने सचेत किया था कल्लू को। “स्वामी अनेकानंद से वही आशीर्वाद – वो वाला – सी एम बनोगे, पी एम बनोगे …?” मग्गू ने कल्लू को आंखों में देखा था।

कल्लू तनिक डर सा गया था।

गांव से लौटने के बाद स्वामी अनेकानंद का चाल चलन बदला-बदला लगा था। कल्लू को याद है कि राम लाल ने कहने के बाद भी स्वामी जी के घर हजार रुपये का मनी ऑडर नहीं कराया था। राम लाल का इरादा कल्लू न जानता था। जबकि स्वामी अनेकानंद आज कल चुपचाप ही बने रहते थे। पहले जैसा सौहार्द और सहेला उनके मन में न था। कल्लू को शक था कि उसके कहने भर से स्वामी जी मग्गू को पहले वाला आशीर्वाद देने की बात मान भी लेंगे? लेकिन ये सब कथा व्यथा वह मग्गू को सुनाना न चाहता था।

इस मामले में मग्गू बहुत खबरदार था – कल्लू जानता था।

“वो वाला आशीर्वाद …?” कल्लू तनिक खिलका था। “हां-हां। वो वाला आशीर्वाद तो मुझे भी याद है।” कल्लू ने माना था। “फिकर नॉट यार। स्वामी जी अपने घर के आदमी हैं।” कल्लू ने बड़ी आत्मीयता से कहा था। “काम हो जाएगा।” उसने मग्गू का हाथ दबाया था।

कल्लू ने झूठ बोला था।

राम लाल ने आज कल आनंद बाबू से दूरी बना ली थी।

काम बढ़ गया था। स्वामी अनेकानंद का नया अवतार चमत्कार दिखा रहा था। श्रद्धालु आंखें बंद कर उनके दर्शन करने देश विदेश से खिंचे चले आ रहे थे। राम लाल के पौ बारह थे। राम लाल चाहता था कि जब तक ये नई उमंग ठंडी हो वह मोटा कमा जाए और …

“आनंद बाबू को एक दिन किनारे तो करना ही होगा?” राम लाल ने कई बार अपने इरादे को मन में दोहराया था। “राज हंस अगर चल पड़ा तो एक और नया साधु मठ से मंगवा लूंगा और …” राम लाल अब नया खेल खेलना चाहता था।

स्वामी अनेकानंद भी असमंजस में थे कि राम लाल ने मुड़ कर भी पूछा तक न था कि उसने बीस हजार रुपये की क्यों मांग की थी? पहले की तरह हर माह हजार रुपये का मनी ऑडर अभी तक आरंभ न हुआ था। जबकि राम लाल के राज में धन वर्षा हो रही थी। राम लाल न जाने क्यों स्वामी अनेकानंद की सुध लेना भूल गया था। राज हंस कभी-कभी दिखता था लेकिन दूर-दूर ही बना रहता था। कुछ तो था जो बदल रहा था।

राम लाल को डर था कि कहीं आनंद बाबू वक्त से पहले चोट न मार जाएं?

आनंद बाबू को जब भी बिल्लू याद आता उनका मन प्राण मर-मर जाता।

“कैसे जीएगा बिल्लू?” आनंद बाबू समझ न पा रहे थे। “क्या राम लाल को याद दिलाएं मनी ऑडर की बाबत? अगर हजार रुपये का मनी ऑडर बिल्लू के नाम जाने लगेगा तो जान बच जाएगी – आनंद जानता था। कई बार उसका मन आया था कि कल्लू को ही टटोले। लेकिन वो जानता था कि कल्लू, कदम और राम लाल एक जुट थे – एक मत थे। वह था … वह था उनकी वही चिड़िया जो पिंजड़े में बंद था और प्रश्न आने पर कार्ड फेंकने के लिए विवश था। कैसे निकले इस कैद से – आनंद बाबू कुछ समझ न पा रहे थे।

“भादों बदी सोलह सप्तमी का मुहूर्त निकला है स्वामी जी।” कल्लू ने आ कर स्वामी अनेकानंद को सूचना दी थी।

“क्या होगा?” स्वामी अनेकानंद ने उत्सुकता पूर्वक पूछा था।

“जश्न मनाएंगे।” कल्लू ने हंसते हुए बताया था। “मग्गू भाई को चुनाव जिताना है न?” उसने जैसे याद दिलाया था स्वामी जी को। “बड़ा जश्न मनेगा।” उसने दोहराया था। “इस बार सी एम आएंगे और उनके मंत्री बजंत्री भी आएंगे। पूरा बंबई शहर हाजिर होगा।” कल्लू खुश-खुश बताता ही रहा था।

स्वामी अनेकानंद का मन हुआ था कि कल्लू को याद दिला दें – हजार रुपये के मनी ऑडर की, लेकिन वो सहम कर चुप हो गए थे। वह किसी कीमत पर भी मांगना न चाहते थे।

“आपको तो वही पुराने वाला आशीर्वाद देना है स्वामी जी।” कल्लू ने याद दिलाया था। “सी एम बनो … पी एम बनो …! हाहाहा।” कल्लू खुल कर हंसा था। “मग्गू की मुराद पूरी हुई तो मान लो स्वामी जी कि …”

“तुम्हें एक पाई भी न मिलेगी?” स्वामी अनेकानंद ने अपने मन में स्वयं से कहा था। “धन राम लाल अपनी झोली में भर लेगा और मग्गू पूरे देश को लूटेगा। लेकिन तुम्हें, मेरे प्रिय आनंद एक कौड़ी भी कोई न देगा।” तनिक मुसकुराए थे स्वामी जी।

आज कल आंखें चुराता राम लाल स्वामी अनेकानंद को चोर लगता था।

और जश्न मनाता मग्गू – डाकू था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading