आज सोमवती अमावस्या थी। पंडित अवध नारायण ने आज का लग्न पुरानी पर्ण कुटीर छोड़ कर नई पर्ण कुटीर में जाने का तय किया था।

सुबह से ही तैयारियां आरंभ हो गई थीं। पूरी बंबई में खबर थी कि आज के शुभ लग्न में स्वामी जी नए निवास में स्थापित होंगे।

कल्लू और कदम ने बड़ी चतुराई से और सलीके से स्वामी अनेकानंद के पुराने कपड़े बदले थे और नया सेट उन्हें पहनाया था। बालों को खूब शेंपू लगा कर धुलवाया था और कल्लू के भाई ने पुराने स्टाइल में संवार दिया था। स्वामी जी का नया रूप स्वरूप बड़ा ही मोहक लग रहा था।

राम लाल ने बड़ी होशियारी के साथ दर्शनार्थियों की लिस्ट तैयार की थी।

सबसे पहला नाम अमेरिकन खरब पति मोहन मकीन का था। मोहन मकीन को भी कदम ने बड़ी सावधानी से आने के लिए तैयार किया था। मोहन मकीन के साथ उनकी बेटी विभूति थी और साथ में ही राम लाल ने मीरा मर्फी का नाम जड़ दिया था। राम लाल जानता था कि मीरा मर्फी भी एक बड़ा खेल साबित हो सकती थी। इसके बाद नम्बर था विलोचन शास्त्री और उनके पार्टी कार्यकर्ताओं का। और अंत में दर्शन आम लोगों के लिए खोल देने थे।

स्वामी अनेकानंद को कल्लू और कदम ने बड़ी सावधानी के साथ पर्ण कुटीर से बाहर निकाला था। पैदल और नंगे पैरों स्वामी जी को अपने नए स्थान की ओर प्रस्थान करना था। पुष्प वर्षा होने लगी थी। भक्ति गान चल पड़ा था। लोग स्वामी जी के साथ-साथ चल पड़े थे।

पंडित अवध नारायण ने नए पर्ण कुटीर पर हवन पूजा का प्रबंध किया था। पंडित काशी के थे। भीड़ का ठिकाना न था। लोग किसी न किसी तरह स्वामी जी की एक झलक देखने के लिए बेताब थे।

स्वामी जी अपने आसन पर विराजमान हुए थे तो जोरों के नारे – स्वामी अनेकानंद अमर रहें, लगते ही रहे थे।

अब अमेरिकन खरब पति मोहन मकीन का आगमन हुआ था। दोनों ओर के दोनों हाथ मीरा और विभूति ने पकड़े हुए थे। मोहन मकीन आहिस्ता-आहिस्ता चल कर आए थे और स्वामी जी के चरणों में सीधे लेट गए थे। स्वामी जी की जय जयकार हुई थी। तभी विभूति और मीरा ने भी स्वामी जी के चरण स्पर्श किए थे।

स्वामी जी ने आंखें भर कर मीरा मर्फी को लंबे पलों तक निहारा था। मीरा की लंबी-लंबी सुघड़ और सफेद उंगलियां उनके मन को भा गई थीं। और जब मीरा मर्फी ने उन उंगलियों से स्वामी अनेकानंद के चरण छूए थे तो उन्हें लगा था जैसे उन्हें किसी ने भीतर से छू लिया हो। जीवन का ये प्रथम और अनूठा अनुभव उन्हें कृतार्थ कर गया था।

मीरा मर्फी ने भी जब स्वामी जी का नया धुला मंजा रूप स्वरूप देखा था तो मुग्ध हो गई थी।

अब गाजे बाजे के साथ विलोचन शास्त्री का बड़ा काफिला दर्शन लाभ के लिए पहुंच गया था। विलोचन शास्त्री ने बड़ी श्रद्धा के साथ स्वामी जी के चरण छूए थे और आशीर्वाद लिया था। उसके बाद सीता देवी थीं और फिर बबलू और पल्लवी ने सादर प्रणाम किया था। बबलू ने आश्रम के नाम मोटा चेक भेंट किया था, तो विलोचन शास्त्री ने स्वामी जी को सरोपा भेंट किया था।

खूब तालियां बजी थीं। नारे लगे थे। झंडे फहराए गए थे।

इसके बाद बंबई शहर के गण मान्य लोग दर्शन लाभ के लिए आगे आए थे और फिर तो दर्शन लाभ का सिलसिला शुरू हो गया था।

मौन और असंपृक्त बैठे स्वामी अनेकानंद खुली आंखों से होते उत्सव को देखते रहे थे।

सारा संसार धन धान्य से संपूर्ण था। एक से एक बड़ा धन पति था। राम लाल का जुगाड़ अब और भी जोरों से चलेगा – स्वामी जी जानते थे। बस एक वही थे जो कंगाल थे, भूखे नंगे थे, अवश और विवश थे। उन्हें अचानक बिल्लू का चेहरा दिख गया था। और बिल्लू के चेहरे पर धरी वेदना भी दिख गई थी। मीना के विछोह से क्षत विक्षत हुआ बिल्लू मौन था। और वो असहाय थे। कुछ भी नहीं कर पाए थे और बिल्लू की सगाई टूट गई थी। भुजबल अपना शगुन का सामान उठा ले गया था।

न जाने क्यों स्वामी जी की रुलाई टूट गई थी। वो रो पड़े थे। जोर-जोर से रोए थे – खूब रोए थे। जमा लोग आश्चर्य चकित आंखों से रोते स्वामी जी को देखते रहे थे – मौन – अशांत।

“पुनर्जन्म है स्वामी जी का।” पंडित अवध नारायण ने लोगो को बताया था। “जब शिशु इस संसार में आता है तो रोता है। इसी तरह स्वामी जी का रोना भी स्वाभाविक है। अब वो हमारे बीच संसार में हैं।”

तालियां बजी थीं। स्वामी अनेकानंद का उनके नए अवतार में आने पर स्वागत हुआ था।

मोहन मकीन – उसके पापा का कहा आदर्श वाक्य वैराग्य विभूति का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया था।

कैसे हुआ कि जो आदमी रात दिन दौलत कमाने के लिए पागल था, आज वैराग्य की बात कर रहा था। ये असंभव संभव कैसे हुआ?

अमेरिका और भारत अचानक विभूति को आमने सामने खड़े दिखे थे। आज उसे भारत भारी पड़ता दिखा था – अमेरिका पर। कभी अमेरिका में रहने सहने का उन्माद फीका पड़ गया था। लेकिन क्यों? और भारत का सनातन, भारत का भगवा और जीवन की सादगी इतनी आकर्षक कैसे बनी थी, वह जान लेना चाहती थी। स्वामी अनेकानंद अचानक ही एक आदर्श की तरह विभूति के सामने आ खड़े हुए थे।

“सब समेट लेती हूँ, मीरा।” विभूति बता रही थी। “मैं अब स्वदेश लौटूंगी।” उसने अपना अंतिम फरमान सुना दिया था।

लेकिन मीरा मर्फी अभी भी मझ धार में खड़ी थी। वायदा करने के लिहाज से शिव मंदिर की स्थापना करना ही अभी तक उसका उद्देश्य था।

राम लाल बहुत व्यस्त था। उसने बड़ी सावधानी के साथ श्रद्धालुओं का नाम स्वामी अनेकानंद और स्वामी राज हंस के बीच बांट दिया था। अब उसे स्वामी अनेकानंद के चले जाने का डर न था। उसे रास्ता मिल गया था। और अब वह आम तौर पर ही स्वामी अनेकानंद के सामने न आता था।

स्वामी अनेकानंद भी आज कल असंपृक्त थे। पहले जैसा लगाव जुड़ाव अब न था। अब तो वो अपने आप में ही सिमट कर रहने लगे थे। कल्लू और कदम से भी उनका मेल जोल बहुत कम हो गया था। नई बनी पर्ण कुटीर की शान शौकत और सुविधा सहूलियतों की भी स्वामी अनेकानंद को कोई सुख न दे पाती थीं। उन्हें लगता था कि उनके साथ जो भी हो रहा था वो एक छल था। राम लाल ने बड़ी ही चतुराई के साथ उन्हें फांस लिया था।

सूने-सूने पलों में बिल्लू चला आता था। मीना से सगाई टूटने के बाद का क्षत विक्षत हुआ बिल्लू उनके सामने खड़ा ही रहता। लेकिन उनके पास तो आज भी कुछ न था जो वो बिल्लू की मदद करते? राम लाल ने तो कभी मुड़ कर पूछा तक न था कि …

शिव मंदिर का ब्लू प्रिंट अमेरिका से बन कर आ गया था।

मीरा मर्फी के हर्ष का ठिकाना न था। ब्लू प्रिंट से जाहिर था कि ये शिव मंदिर अपनी अलग पहचान बनाएगा। वह जानती थी कि स्वामी अनेकानंद इसे देख कर बहुत प्रसन्न हो जाएंगे। वह भी चाहती थी कि धन चाहे जितना भी लगे – लगे, लेकिन ये शिव मंदिर …

भारत अब मीरा मर्फी को भी भाने लगा था।

शाम ढल रही थी। मौसम भी सुहावना था। सामने पसरा समुंदर मीरा को बुला रहा था। लेकिन मीरा का मन आज कुछ और ही था।

“मे आई कम इन स्वामी जी?” मीरा मर्फी ने स्वामी अनेकानंद का ध्यान तोड़ा था।

स्वामी अनेकानंद चौंक पड़े थे। आवाज जानी पहचानी थी लेकिन उन्हें शक था। फिर भी वो संभल कर बैठ गए थे।

“आ जाइए।” स्वामी जी ने संयत स्वर में आज्ञा दी थी।

एक सुगंधित बयार के झोंके की तरह मीरा मर्फी स्वामी जी के सामने उपस्थित हुई थी।

“शिव मंदिर का ब्लू प्रिंट आ गया है।” मीरा ने प्रसन्नता पूर्वक कहा था। “सोचा, आपको दिखा दूं।” मीरा कह रही थी।

“आप …?” स्वामी अनेकानंद ने प्रश्न किया था।

“मीरा मर्फी।” मीरा मर्फी ने सीधा स्वामी जी की आंखों में देखा था। “शिव मंदिर बनाने का …?”

“ओ हां-हां। अब याद आया मीरा जी।” स्वामी जी हंसे थे। “लेकिन लाभ क्या होगा? मेरे लिए तो ये ब्लू प्रिंट काला अक्षर भैंस बराबर है।” जोरों से हंस पड़े थे स्वामी जी। “आप ही जाने।” उनका फैसला था।

अब वो दोनों एक दूसरे को निगाहें भर-भर कर देख रहे थे। दोनों के चेहरों पर बहुत कुछ लिखा था, लेकिन दोनों ही पढ़ न पा रहे थे।

ये पल न जाने कब तक खड़ा ही रहा था पर बोला कुछ न था।

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मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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