बिल्लू की सगाई टूट गई थी। बिल्लू का दिल टूट गया था। वह मीना को भूल न पा रहा था। आनंद को भी अपार दुख हुआ था। वह बिल्लू से बेहद प्यार करता था।
“हमें कोई जल्दी नहीं है आनंद बाबू।” मीना का बड़ा भाई भुजबल कह रहा था। “लेकिन इस साल में हमें मीना की शादी करनी है। आगे एक छोटा भाई भी बैठा है। इसलिए आप चाहें तो दो चार दस दिन और ले लें। हमें एक मुश्त जवाब दे दें।” वह तनिक हंसा था। “शादी ब्याहों में देर सबेर तो चलती है।”
आनंद एक लंबी सोच के बाद बोला था। उसे एक आखिरी उम्मीद नजर आई थी। वह चाहता था कि किसी न किसी तरह बिल्लू का रिश्ता हो जाए। उसे अभी भी उम्मीद थी कि राम लाल पैसे भेज सकता था।
“तनिक और समय दें।” आनंद ने विनीत स्वर में कहा था। “हम आपको राम नवमी तक जवाब दे देंगे।” आनंद ने वायदा किया था।
और अब एक नई दौड़ भाग में दोनों भाई जुट गए थे।
“हमें पैसे चाहिए सेठ।” आनंद बाबू ने शहर जा कर न्यू फाइनैनसर्स फर्म के मालिक सेठ धरम दास से मांग की थी।
“जितना चाहो उतना लो मालिक।” सेठ धरम दास ने हंसते हुए कहा था। “बैठिए।” उसने दोनों भइयों को सम्मान सहित सोफे पर बिठाया था। “फरमाइए?” उसका प्रश्न आया था।
आनंद ने बिल्लू की ओर ताका था। बिल्लू ही जानता था कि उसकी सगाई की रस्म के लिए कितना कुछ पैसा लगना था। बिल्लू ने उंगलियों पर हिसाब जोड़ा था और बताया था कि कम से कम दस हजार की रकम तो दरकार थी।
“ढ़ाई परसेंट का ब्याज लगेगा मालिक।” सेठ धरम दास ने बताया था। “फाइनल हिसाब पर ब्याज रुपया देना होगा।” धरम दास ने खुलासा किया था।
“ठीक है। मंजूर है।” बिल्लू बोला था।
“गिरवी रखने के लिए क्या है? घर …? खेत …? कोई फिक्स डिपॉजिट या …?” धरम दास की अगली डिमांड थी।
दोनों भइयों ने एक दूसरे को देखा था। सवाल जटिल था।
“डरने की बात नहीं है मालिक। ये तो सिक्योरिटी है। हमें भी तो …।”
“लेकिन … लेकिन अगर गिरवी न छुड़ा पाए तो?”
“माल हमारा।” हंस गया था सेठ धर्म दास। “कुछ समय तो देंगे। लेकिन वसूली तो होगी।” उसका साफ उत्तर था।
दोनों भाइयों के बीच बाजार में तोते उड़ गए थे।
पूरे शहर में डोलने के बाद पता चला था कि रेट और राह हर जगह वही थी।
उदास निराश गांव लौटते राह में बिल्लू सोच रहा था कि बात आनंद के गांव लौटने पर ही बिगड़ी थी। आनंद का भेजा एक हजार रुपया माहवारी गांव वालों के लिए एक मोहक सपना था। बिल्लू ने उसी पैसे से घर द्वार ठीक कराया था। ढाई बीघा जमीन खरीदी थी और साढ़े सात बीघा की कदम खंडी को खरीदने का उसका इरादा भी बुलंद था। लेकिन यों अचानक मां की बीमारी और आनंद का गांव आना खेल बिगाड़ने के लिए ना काफी ना था।
आनंद भी सोच रहा था कि राम लाल ने उसके साथ दगा खेली थी। उसके नाम और काम पर ही तो कमाता था राम लाल? न जाने कितना कमा चुका था। न जाने …
“पढ़े लिखे पागल तो तुम्हीं हो।” आनंद ने पहली बार अपने आप को जूते मारे थे। “उन तीन अनपढ़ लोगों के जाल में फंस कर सब कुछ गंवा बैठे।” आनंद को अपार वेदना हुई थी। “कहीं भी नौकरी कर लेते तो? कहीं न कहीं, कोई न कोई काम तो मिल ही जाता। कम से कम पैसा तो सीधा अपने हाथ में आता। अब तो …?”
“अब तो जवाब देना ही होगा भइया?” बिल्लू ने चलते-चलते आनंद से पूछा था।
“हां।” धीमे से बोला था आनंद। “लगता नहीं पैसा आएगा।” आनंद ने स्पष्ट कहा था। “कुछ न कुछ हुआ तो जरूर है बिल्लू। लेकिन …”
दोनों भाई चुपचाप चोरों की तरह गांव में रात के अंधेरे में घुसे थे और गुम हो गए थे।
राम नवमी का दिन आ धमका था। दोनों भइयों को आज मीना के भाई भुजबल को जवाब देना था।
बिल्लू बहुत असहज था। उसका मन था कि कहीं आताल पाताल में जा कर दुबक जाए। किसी के खोजने पर भी न मिले। मीना से रिश्ता टूटना उसके लिए किसी सदमे से कम न था।
मीना का भाई भुजबल चार पांच अन्य आदमियों के साथ समय से कुंती निवास पहुंच गया था। कुछ गांव के लोग भी इकट्ठे हो गए थे। एक अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई थी। आनंद खुली आंखों से जुड़ी भीड़ को निरख परख रहा था।
“आशीर्वाद दें स्वामी जी।” पैर छू कर माधव मग्गू विनती कर रहा था।
“आप सी एम बनेंगे … आप पी एम बनेंगे …” आनंद को दिया आशीर्वाद याद आ रहा था जब उसने एक महान और अटपटा आशीर्वाद दे डाला था।
लेकिन कमाल ये हुआ था कि उस दिए अटपटे आशीर्वाद को सबने सच मान लिया था। सबने मान लिया था कि स्वामी जी का दिया आशीर्वाद कभी खाली नहीं जाता। मग्गू मोची आज नहीं तो कल पी एम भी बनेगा जरूर।
“ये दोनों भाई मूर्ख हैं।” गांव वालों के बीच चलती चर्चा पर लोग हंस रहे थे। “बेचारी कुंती ने उम्र भर खट-खट कर इसे पढ़ाया। एम ए इन हिस्ट्री ये पागल बंबई से खाली हाथ लौट आया।
“इन मूर्खों को भूखों मरने कौन देगा अपनी बेटी?” दूसरा कोई कह रहा था। “ये छोटा बिल्लू तो और भी बेकार है।”
“बड़ा कुछ कमा कर तो लाया था?” प्रश्न आया था भीड़ से।
“बैंगन लाया था।” कोई जोरों से हंसा था। “मजदूरी करता होगा किसी सेठ की। और अब तो वो भी गई।”
तनिक सकुचाते हुए भुजबल ने ही आनंद से पूछा था।
“राम नवमी का शुभ दिन है। क्या कहते हो आनंद बाबू।”
भुजबल का किया प्रश्न बहुत लंबे पलों तक फर्श पर पड़ा रहा था। आनंद उसे छूने से भी डर रहा था। बिल्लू की टूटती सगाई उसे भीतर से तोड़े दे रही थी। लेकिन अब कोई प्रयत्न या प्रयास शेष न बचा था। आनंद को उत्तर आता था लेकिन …
“पैसे का जुगाड़ हुआ नहीं भुजबल भाई।” आनंद ने सकुचाते हुए उत्तर दिया था।
बिल्लू चुप था। वह धरती कुरेद रहा था। शर्मसार था और निराश था।
“तो फिर लौटा दो शगुन का सामान।” भुजबल ने मांग की थी।
बिजली जैसी गिरी थी कुंती निवास पर। मां की मरी आत्मा कहीं दरक गई थी।
बिल्लू ने चुपचाप सारा शगुन का सामान वापस कर दिया था। गांव के लोग मूक दर्शक बने दोनों भाइयों के पराभव को नई आंखों से देखते रहे थे।
दोनों भाई उस रात सो न सके थे। दोनों के बीच चलता अबोला और भी जटिल हो गया था। बिल्लू सोच रहा था कि आनंद का यों गांव लौट आना ही गलत रहा। उसके गृहस्थ की गाड़ी ठीक चल पड़ी थी। अगर आनंद न लौटता तो …
“मुझे गांव नहीं लौटना चाहिए था।” आनंद को आज एहसास हुआ था। “वो साढ़े सात बीघा की कदम खंडी का सपना और किसी सुशील कन्या के साथ शादी होना तो एक छलावा था। उसे वक्त की पहचान न थी। राम लाल उसका कौन सा सगा था जो …?
“अब क्या करे?” आनंद स्वयं से ही सवाल कर रहा था। “लौटे बंबई?” विचार आया था। उसने महसूसा था कि उसके पास बहुत थोड़े पैसे बचे थे। शायद टिकट के लिए भी पूरे न होते? “यहीं कहीं कोई … काम …?” एक नया विचार बना था।
बिल्लू भी क्षत विक्षत था। उसे जंच गया था कि उसकी चलती गाड़ी उलट गई थी। एक बार आनंद के जाने के बाद तो वो खाली हाथ था। अब तो मां भी नहीं थी। अब कौन था जो उसे सहारा देता। मीना से शादी होने का सपना तो अब मीलों दूर जा कर खड़ा हो गया था।
पांच बीघा खेत की सरहद पर खड़ा बिल्लू अब अपने जीने के सहारे खोज रहा था। जबकि आनंद के सामने एक दिशा भ्रम के अलावा और कुछ न था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड