चेहरे पर चिन्ता थी

आँखे पीछे को धँस

गईं थीं

तुम्हें देख

तुम्हारे अन्दर

कोई चिंता

महसूस कर रही

थी मैं

परमात्मा का कोई

इशारा समझ रही

थी मैं

तुम्हें देखकर

कुछ भाँप लिया

था मैंने माँ!

ऐसा लगता था

तुमसे कुछ कहने

से डर रही

थी मैं

जो मैने भाँपा

वही तुमनें भी

भाँप लिया

था शायद

फ़िर भी तुम

निडर बनी खड़ीं

रहीं थीं माँ!

अलविदा कहने को

कदम तैयार हो चुके

थे तुम्हारे

जानते हुए, भी

चुप रहीं थीं

माँ!

कुछ भी हो

वीर सहासी निकलीं तुम

हँस-हँस टाटा कर

गईं तुम माँ!!

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