युग पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा
भोर का तारा
उपन्यास अंश
स्वयंसेवक से भी आगे का – बाल स्वयंसेवक, एक नया ही चलन चला था – तब. ‘कैच देम यंग” का नारा न जाने कहाँ से आया था ? न जाने इस नारे को किस ने इजाद किया था ? ‘बचपन से ही ….बच्चों में संस्कार डालो’ एक ऐसा मुद्दा था – जिस पर नया प्रयोग हो रहा था. उन बच्चों को लो ….जिन को दिशा चाहिए …जो होनहार हैं ….पर लाचार हैं ! उन्हें लो – जो कुछ करना चाहते हैं ….पर …सहारा चाहते हैं !!’
बाल स्वयंसेवक – फिर न जाने कब और कैसे एक मूर्त रचना बन गया …और मेरी आँखों के रास्ते मेरे अंतर में उतर गया . हज़ारों सपने …हज़ारों इच्छाएं और …हज़ारों-हज़ार विचार आकर मुझ से लिपट गए थे. ‘रास्ता यही है, नरेन्द्र !” मेरी आत्म बोली थी. ‘तुम्हारे अभीष्ट तक जाने का रास्ता यही है. ‘
“मेरा अभीष्ट….?” मैने तुनक कर पूछा था. “कौन से अभीष्ट की बात कर रहे हो …, मित्र …?”
“वही, जिस के लिए तुम बाबले-उताबले हो. तुम्हारा – अभीष्ट ….’प्रधानमंत्री पद ….’ …….?”
अब की बार मैं हंसा था. जोरों से हंसा था. अपने ऊपर हंसा था. अपनी इस उम्मीद पर हंसा था. उस दिन मैं खूब ही हंसा था …!! कारण- में सूरज को निगल जाना चाहता था !
“अच्छा है . कुछ सीख-समझ लेगा ….!” मेरे बाबू जी की प्रतिक्रिया थी.
“कुछ कमाई भी होगी ….कि यों ही फोकटी में ….बेगार कराएंगे …?” मेरे छोटे भाई ने पूछा था.
“कुछ तो मिलेगा ही ….!” माँ ने बात साधी थी. “संगत का तो असर ही अलग होता है ! अच्छे लोगों के पास उठना-बैठना भी तो ….एक किसिम की कमाई है… !!” उन का कथन था. “अवाराओं की संगत छूटेगी …!” उन का अंतिम आशीर्वाद था.
मेरा बाल स्वयंसेवक होना – कुछ ख़ास नहीं था – किसी के लिए !
लेकिन मेरे लिए ….ये होना ही सब कुछ होना था ! मैंने संगठन की काया में एक रूह की तरह प्रवेश पा लिया था. मैंने उस के रूप-स्वरुप को समझा था. मैंने उस के नाम, काम और मुद्दे-इरादों का पाठ जैसा किया था. मुझे सब भला लगा था. मुझे सब लोग सुहा गए थे. मैं उन लोगों के प्रेम-सौहार्द का कायल हो गया था. मैं उन लोगों की दिशा,नीति और सहज राजनैतिक चेतना के संचार करने के प्रयासों से प्रसन्न था. उन का बताया इतिहास-भूगोल मेरी समझ में समाता ही चला जाता था. मेरे लिए उन का कहा – परमात्मा का कहा था! एक लौ —एक पुकार …और एक …अनाम सा उजास मेरे भीतर भरने लगा था.
न जाने क्यों ….अचानक ही मैं …अब औरों के लिए जीने लगा था ….!!
मुझे अपने सुख-दुःख तो याद ही न रहे थे. अपनी गरीबी को तो मैं भूल ही गया था. मैं अब एक मुहीम में जुट गया था. हाँ, एक मुहीम …समाज-सेवा की मुहीम ….एक ऐसी मुहीम ….जिस में दीन -दुखियों का सहयोग करना सिखाया जाता था …..!
“यह देश हमारा है ….हमें जान से भी ज्यादा प्यारा है ….! हमें बड़े हो कर – बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां उठानी होंगी ….! हमें उसी की तैयारी आज से करनी है ….!!”चर्चाएँ होती ही रहतीं थीं.
मेरे उड़नशील मन को एक घोंसला मिल गया था.
अपने अकेले पलों में मैं इसी अपने प्रिय घोंसले में आ बैठता ! मैंने इसे नाम दिया था – भारत ….अखंड भारत ! मैं अपनी रचना में इस नाम – भारत ….या कि अखंड भारत से खूब खेलता ! मैं इस नाम को छोटा-बड़ा करता ….मैं इस नाम का अर्थ जानने की कोशिश करता ….! मैं कई बार चाहता कि मैं …दौडूँ और अपने देश के कौने-कौने को झांक कर देख आउ .. जा-जा कर लोगों से मिलूँ …..उन से बतियाऊं – उन के सुख-दुःख पूछूं ….और उन के पास बैठ कर ….अपने इस सपने को बांटूं ….और बताऊँ …..कि हम सभी गरीब हैं ….! हम गुलाम थे. हमने अभी -अभी आज़ादी ली है …साँस ली है …स्वतंत्रता की ! घबराओ मत ….अब हम बढ़ेंगे …विकसित होंगे ….और बड़े बनेंगे …!
“लेकिन , बेटे ….?” प्रश्न आते और आते ही चले जाते.
“घबराओ मत ! मैं हूँ …न …!!” मैं मुस्कराकर एक मसीही अंदाज़ में बोल जाता . “अब होगा अंत इस गरीबी का ! होगा सबेरा ….सुखों से भरा सवेरा …..जहाँ हम एक सक्षम और …समर्थ समाज के रूप में उभरेंगे …..!”
पर मात्र …..सपनों से कहाँ मिटती है -समस्याएं …?
क्रमशः –
