भारत सरकार की नई घोषणा – चार साल के लिए देश के युवकों को सेना में भर्ती का प्रावधान, एक उन्नत विचार है।
न जाने कब से मेरा मन कहता ही रहा था कि अगर देश में हम मिलिट्री ट्रेनिंग हर किसी के लिए पांच साल के लिए अनिवार्य कर दें तो हम अनेकानेक सामाजिक व्याधियों से छुटकारा पा जाएंगे। क्यों कि हमारी ये सामाजिक व्याधियां ही हैं जो हमें आज भी बांटे हैं, हर रोज हमें विभक्त करती रहती हैं और अपने तेरे के राग को हम भूल ही नहीं पाते हैं।
हम जहां भी पैदा होते हैं वहीं का सब कुछ हम सहेजते हैं – जो स्वाभाविक है और अनिवार्य भी। चूंकि हमारा देश विशाल है, हमारी संस्कृति विस्तृत है ओर हमारी भाषाएं भी पृथक हैं अत: जब हम देश के कॉमन प्लेटफॉर्म पर आकर खड़े होते हैं तो ये विविधताएं हमें बहुत बहुत सताती हैं। हम ये हैं, तुम वो हो – का गीत गाते गाते हम थक जाते हैं पर एक साथ कभी सुकून से बैठ कर न हम देश के बारे कुछ सोचते हैं ओर न ही समाज को कुछ दे पाते हैं।
जबकि देश, समाज ओर संस्कृति किसी एक की नहीं अनेक की धरोहर है। अब इस अनेकता में एकता लाई जाए तो कैसे?
इसका उत्तर स्पष्ट है – मिलिट्री ट्रेनिंग।
मैं अपने इस दावे के पक्ष में कुछ दलीलें दूंगा!
जब हम युवा अपने घर गांव से निकल कर मिलिट्री ट्रेनिंग सेंटर में पहुंचते हैं तो सच मानिए कि हमें एक बदली बदली हवा का अहसास तुरंत ही हो जाता है। तू कहां का है, मैं वहां का हूँ के परिचय के उपरांत हम युवा आपस में मित्र और सहयोगी बन जाते हैं। हमारे सामने भारत जितना विशाल देश आ खड़ा होता है। हमें भारत देश के दुश्मन भी दिखाई दे जाते हैं। हम अपनी प्रांत, प्रदेश, भाषा और गंवई फॉर्म को भूलकर एक सैनिक की परिभाषा पा जाते हैं ओर देखते देखते ही हम एक बड़े व्यक्तित्व के धनी बन जाते हैं।
सेना में हर तरह के मौके हमें मोहिया कराए जाते हैं। अगर हम अच्छे खिलाड़ी हैं तो हमारा भविष्य उज्ज्वल है। अगर हम पढ़ाई लिखाई में दक्ष हैं तो हमें आगे बढ़ने के अनमोल मौके मिलते हैं। मिलिट्री ट्रेनिंग हमें एक इंस्पायर्ड युवक बना देती है जो अनवरत संघर्ष करने की क्षमता ग्रहण कर लेता है ओर देश और समाज की निरंतर सेवा करता है।
सब सक बड़ी उपलब्धि हमें नैशनल इंटीग्रेशन के रूप में होती है। हम जब सारे भारत को खुली आंखों देख लेते हैं, हम जब देश के हर निवासी के दर्शन कर लेते हैं – उसके मित्र हो जाते हैं और उससे संबंध जोड़ लेते हैं तो हम फिर अनेक नहीं एक हो जाते हैं।
एक मग में साथ साथ बैठ कर चाय पीने की सैनिक की संस्कृति ही हमारी हर मुश्किल की कुंजी है।
अत: चार साल के लिए नौजवानों को सैनिक शिक्षा देने का विचार अति उत्तम है। इसके परिणाम स्वरूप जहां हमारे युवक देश के प्रबुद्ध नागरिक बनेंगे वहीं हमारा देश न तो डरेगा, न झुकेगा ओर न कभी किसी का गुलाम बनेगा।

मेजर कृपाल वर्मा