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राजा को राम होना चाहिए !

राजा को राम होना चाहिए !

भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी !

उपन्यास अंश .

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा ;-

“बंगाल विभाजन …के पेट से ही तो …..असली कांग्रेस का जन्म हुआ !” मैं फिर से सुन रहा था . “अंग्रेजों ने बंगाल को बाँट कर …आफत बुला ली थी ! सुरेन्द्र नाथ बेनर्जी ने स्वदेशी का नारा दे कर …अंग्रेजी राज्य की जड़ों में मट्ठा भर दिया था ! और …..” दादा जी ने मुझे पढ़ा था . “ये सब सच है , नरेन्द्र !”दादा जी मुझे समझाना चाहते थे . “कांग्रेस का रूप-स्वरुप तब बिलकुल अलग-थलग हो गया था ! सरे शाम विद्रोह होने लगे थे . लूट-पाट ….डाके ….राहजनी …..  और अनाचार …अत्याचार …सब आरंभ हो गया था ! अंग्रेजों को ही नहीं स्वयं कांग्रेसियों को भी चिंता होने लगी थी !”

“क्यों ….?” मैं चहका था . “ठीक तो हो रहा था ….?” मैंने तर्क किया था . 

“नहीं, बेटे ! कुछ गलत-सलत भी होने लगा था ! और अंग्रेज इस होते गलत-सलत की आड़ ले कर स्वराजियों के ऊपर कहर ढाने लगे थे ! कांग्रेस की चिंता फिजूल न थी !”

दादा जी जैसे एक मुकाम पर आ कर ठहर गए थे . वह किसी गहरे सोच में जा डूबे थे . वह सच और झूठ के बीच खड़े हो कर …कोई निर्णय लेने को थे ! वो स्वयं भी पक्ष और विपक्ष में बंटे लगे थे, मुझे ! 

“मैं भी चाहता था ….दिल से चाहता था ….कि अंग्रेजों पर वार किया जाए ….जंग लड़ी जाए ! बाल गंगाधर तिलक भी जम कर लड़ना चाहते थे . लेकिन गोखले इस मार-काट से सहमत न थे . वह नहीं चाहते थे …कि यह सब हो !”

“हर्ज क्या है ….?” तिलक अपने पक्ष में बोले थे . “टिट …फॉर …टेट – इन्हीं का दिया नारा तो है …? हम कौनसी गलती कर रहे हैं …?” वो गोखले से सवाल कर रहे थे . 

“कल …अगर राज आया …तो गुंडा राज आएगा  …!” गोखले का तर्क था . “लोगे …गुंडा …राज …?” उन का स्वर सख्त था . “मैं चाहता हूँ …कि हम सत्ता का सौदा तो करें ….पर अपनी गरिमा के उस पार तक न जाएं !”

“भय बिन ….होई न प्रीत ….?” तिलक का तर्क था . “मान लो मेरी बात , गोखले ! ये लातों के भूत ….बातों से मानने वाले नहीं ! जो चल पड़ा है …उसे रोको मत …!” उन का आग्रह था .

“फिर ….?” मैंने पूछा था . मैं अब आंदोलित था . मैं तिलक और गोखले दोनों को अनुशीलन समित के आँगन में खड़े देख रहा था . “दोनों …..?”

“नहीं माने !” दादा जी ने बताया था . “कांग्रेस की दो फाड़ें हो गईं ! एक गरम दल …तो दूसरा नरम दल ….!!” 

अब मैं रो पड़ना चाहता था . अब मैं चिल्लाना चाहता था . अब मैं उदास था ! ‘आपसी फूट ….हमारी ये आपसी फूट ही हमें ले डूबती है !’ मैं कह देना चाहता था . पर तब …मैं बहुत छोटा था ! 

“अब अंग्रेजों ने तीसरी चाल चली ! तुरप का पत्ता फेंका और हिन्दू-मुसलमानों को भी बांटना शुरू कर दिया ! लालच के बकरे मुसलमानों के सामने बाँध दिए . उन के कान में कहा – हमने सत्ता मुग़लों से ली थी ….हिन्दूओं से नहीं ! हिन्दू तो गुलाम थे . शासक थे – मुसलमान ! हम सत्ता मुसलमानों को देंगे ….हिन्दूओं को नहीं !”

मेरे तो मुंह का ही जायका बिगड़ गया था ! जहर था ….निरा जहर ….जो अभी-अभी मेरी नसों में ऊपर चढ़ गया था ! कितनी घटिया चाल थी – अंग्रेजों की ….? हिन्दू-मुसलमान तो कंधे से कन्धा मिला कर अंग्रेजी हुकूमत के साथ जंग लड़ रहे थे ….? लेकिन अब दोनों एक बारगी ठहर कर सोचने पर मजबूर हो गए थे कि ….

“हिन्दूओं के साथ न रह पाओगे ….!” अंग्रेज हवा के कान भर रहे थे . “हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , तिलक ! कट्टर हिन्दू है ! तुम्हें तो ……..?”

हवा में एक डर पैदा हो गया था … न सिर्फ मुसलमानों के लिए …बल्कि हिन्दुओं के लिए भी !

“देश तो सब का है , अकेले तिलक का तो नहीं …?” उदारवादी बोले थे . “जो फैसला होगा , सर्व सम्मति से होगा !” बात तय हो गई थी . 

“लगा था -सब फिसल गया था .” दादा जी का स्वर कमजोर था . “एक बार तो नरेन्द्र …बहुत बुरा लगा था ! बना-बनाया काम बिगाड़ दिया था – गोपाल कृष्ण गोखले ने . कायर था …अंग्रेजों का दलाल था – मुझे ऐसा लगा था ! और लगा था कि अंग्रेज अब किसी तरह भी काबू न आएँगे ! सत्ता उन की थी . ….राज उन का था …उन के पास क्या नहीं था ….?”

“कहते हैं ….तब अंग्रेजों ने …टेलीग्राम के ज़रिए देश को ….इतने विशाल देश को ….अपनी मुट्ठी में ले लिया था ….?” 

“हाँ ! ले लिया था ! कमाल ही तो था ….? सन्देश लेजाने के लिए अब कोई कबूतर …तो नहीं उड़ाना था …! न हीं  हलकारे जाते थे ! न हीं महीनों का समय लगता था …! मात्र पल -छिन में ईधर का सन्देश उधर पहुँच जाता था ! सूचनाएं स्वयं कबूतर बन कर उड़ने लगीं थीं, नरेन्द्र !” दादा जी का चेहरा उदभासित हो उठा था .  “लगा था – अब तो हार गए ! न तिलक गोखले की बात सुनते थे ….और न ही गोखले तिलक की बात को महत्व देते थे ! पार्टी की भी दो फांक होने के बाद …दोनों बेकार हो गईं थीं . देश भक्त निरुत्साहित हो कर घर लौटने लगे थे !”

“अंग्रेजों के तो घी के दीपक जलते होंगे …..?” मैंने पूछा था . 

“जुल्म ढा रहे थे ! जिन लोगों ने उन का चाहे -अनचाहे विरोध किया था ….उन्हें मिटाने में अंग्रेजों ने कसर न रखी थी !” दादा जी कुछ सोचने लगे थे . “बस , यही बड़ी भूल थी , अंग्रेजों की ! वो हमारे साथ मिल कर बैठना ही न चाहते थे …? वो तो केवल माल चाहते थे ….सत्ता चाहते थे ….और चाहते थे – गुलाम !” अब की बार दादा जी हँसे थे . “यह संभव नहीं होता , नरेन्द्र !” कह कर चुप हो गए थे , दादा जी .

“अरविंदो यही तो लोगों को बताते थे !” दादा जी ने बात को पलट दिया था. “कहते थे – गुलामी एक मानसिक रोग है ! इसे गरीबी से मत जोड़ो ! ग्यानी-ध्यानी …..राजे-महाराजे …और पंडित-प्रधान सभी तो गुलाम बने बैठे हैं …? अंग्रेजों के साथ मिल कर कमाने का लालच …इन्हें अंधा किए है ! जनता के लिए इन का सोच और सरोकार मर चुका है . स्वार्थ है ….स्वार्थ ! केवल स्वार्थ …निजी स्वार्थ ….जिसे ये पोष रहे हैं ….  .  ” दादा जी बताते रहे थे . “और नरेन्द्र ! अंग्रेजों पर भी तब सत्ता का भूत सवार था ! अँधा युग था . गोरे -काले का अंतर अंग्रेजों को उभार लाता था ! गोरा उन के लिए श्रेष्ठ था …सर्व गुण संपन्न था …जब कि काला तो पैदाईशी ही गुलाम था !”

“अरविंदो को सज़ा हुई थी , दादा जी ….?” मैं पूछ बैठा था . मेरे दिमाग से वह अलीपुर के सेशन कोर्ट का द्रश्य मिट नहीं पा रहा था . 

“नहीं !” दादा जी हँसे थे . “छूट गए थे, अरविंदो !” उन्होंने बताया था . “उन की वकालत के लिए स्वयं चित्तरंजन दास खड़े हुए थे . बड़े ही विद्वान् अधिवक्ता थे , वो ! उन्होंने मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड को अपनी धारदार आवाज़ मैं कहा था – मी ..लार्ड ! अरविंदो एक असाधारण पुरुष है ! जहाँ वह एक जन-प्रिय कवि है ….वही वह वेदान्त की वाणी भी है !! बड़े विद्वान् हैं , अरविंदो ! इंग्लेंड में पले -पढ़े …अरविंदो ठेठ भारतीय हैं ! इन की आत्मा देश भक्ति के रंग में रंगी है ! ये वेदों की वाणी हैं ….ये गंगा की पवित्र धारा हैं …और ये हमारे तमाम तीर्थों का संगम है !!” अब उन्होंने मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड की आँखों में देखा था . “आप तो क्या ….इन्हें तो स्वयं परमात्मा भी म्रत्यु दंड नहीं दे सकता ….?” ये उन का दावा था . “हाँ ! ये स्वयं ही ….स्वेच्छा से …इस भारत भूमि को छोड़ कर जाएंगे …..!!” ये उन का एलान था .

कोर्ट रूम में तालियाँ बजीं थीं . कटघरे में खड़े अरविंदो मुस्कराए थे . एक नाटकीय द्रश्य घटा था . कोर्ट रूम की तमाम औपचारिकताओं को ताक पर रख कर …वहां एक सहजता लौट आई थी . मानो अरविंदो ने सभी को भय-मुक्त कर दिया था ….लोग बेहद मुखर हो उठे थे ! अचानक ही अरविंदो की जय-जयकार होने लगी थी ! तभी मजिस्ट्रेट कींग्स फोर्ड की आवाज़ आई थी -….

“मैं इन्हें मुक्त करता हूँ ! इन के खिलाफ सबूत न होने के कारण ….”

हर्षातिरेक से आसमान गूँज उठा था ….!!!

“वरिन्द्र कुमार घोस को फांसी की सजा दी जाती है ….!!” मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड फिर से एलान कर रहे थे . “देश द्रोही होने के साथ-साथ ये षडयन्त्रकारी भी हैं ! इन की ही सहमती से ….दो लाशें …..”

“कौन थे , वरिन्द्र कुमार घोस …?” मैंने पूछ ही लिया था . 

“अरविंदो के बड़े भाई थे ! इन्हीं के घर पर बैठ कर बम फैंकने की योजना -मानिकतला में संपन्न हुई थी .” दादा जी बताने लगे थे . “इन की सज़ा के बाद तो ….सजा ….फासी ….और न जाने क्या-क्या नहीं हुआ ….नरेन्द्र ?” दादा जी अब चुप थे . 

“आप ….तब …..?” मैं यों ही पूछ बैठा था . 

“तुम्हारी तरह …छोटा था ….पर था समझदार !” वो अब भी गंभीर थे . “कितनी भूलें करते हैं , लोग ….?” वो टीस आये थे . “इंसान ही इंसान को पास नहीं बिठाता ….? एक संपन्न भाई …अपने ही विपन्न भाई को …गले नहीं लगाता ! सत्ता का ही साथ देते हैं , लोग ! सच का नहीं !!” वह मुझे घूर रहे थे . “सच को तो सूली चढ़ना ही होता है , नरेन्द्र !” उन की आवाज़ बुझ-सी गई थी . 

दूसरे ही दिन मैं मानिकतला गया था . मैंने वरिन्द्र कुमार घोस का घर खोज लिया था . मैंने वहां बैठ कर महसूसा था कि …वो सब लोग मरे नहीं थे ….यहीं मौजूद थे ! मुझ से बतियाते …चुहल करते …हँसते-गाते …ये लोग कह रहे थे – डूब गया …न सत्ता का ज़हाज़ …जहाँ सूरज कभी गरूव  ही न होता था ….? वहां अब हमेशा हमेशा के लिए अन्धकार आ बैठा है !” वो बता रहे थे . “कभी सोचा भी न होगा ….इन लोगों ने ….? जुर्म करने के अलावा तो ….इन्हें और कुछ याद ही न रहा था ….?” उन्होंने मुझे स्नेह से देखा था . 

“सत्ता का दर्प भी सांप की तरह ही डसता है, नरेन्द्र !” न जाने क्यों वो सब मुझे खबरदार कर रहे थे . “राजा को राम होना चाहिए ! रावण नहीं !!” उन्होंने अपना मत कहा था . 

और ये राम राज्य का स्वप्न मुझे भारत में बैठा ही मिला था – एक विरासत की तरह ….!!!!

………..

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!