by Major Krapal Verma | Dec 2, 2025 | स्वामी अनेकानंद
प्रतिष्ठा ने पहली बार पहाड़ देखे थे। उसका मन एक अनोखी भव्यता से भर गया था। वह भागी थी – पहाड़ों की कमर पर। वह डोली थी – बर्फ की ऊंची श्वेत धवल श्रेणियों पर। उसने जी भर कर पहाड़ों की पवित्र बयार को पिया था। उसकी निगाहें पहाड़ी सिलसिलों में जा धसी थीं। वह...
by Major Krapal Verma | Dec 2, 2025 | स्वामी अनेकानंद
चुनावों का भूत बंबई शहर पर बुखार की तरह चढ़ बैठा था। वोटरों की पूछ होने लगी थी। उनकी सुख दुख की चिंता भावी चुनाव प्रत्याशियों को सताने लगी थी। उनकी जरूरतें भी अचानक प्रत्याशियों को याद आने लगी थीं। उन्हें क्या कुछ चाहिए था – उजाले की तरह आलोकित हो उठा था। अचानक...
by Major Krapal Verma | Nov 29, 2025 | स्वामी अनेकानंद
“पर्ची!” कल्लू अचानक ही आनंद के कमरे में घुस आया था। उसने डाक खाने से लाई पर्ची को आनंद की आंखों के सामने तान दिया था। आनंद को मां और बिल्लू भूली याद की तरह स्मरण हो आए थे। वो जानता था कि वो दोनों उसके भेजे पैसों की आस में जी रहे थे। “एक हजार...