“कितनी बार मना किया है कि ऊपर झीने में मत जाओ वहाँ पुराने सामान के नीचे मोटी-मोटी छिपकलियां बैठी रहतीं हैं। ज़हरीली हैं, कुछ हो गया तो हम क़ानू को कहाँ से लाएंगे।” पर नहीं एक न मानी मौका मिलते ही झट से ऊपर पहुँचकर ज़ोर-ज़ोर से भोंकना शुरू हो जाता था। क़ानू को अपने और अपनी बहादुरी पर बहुत घमंड हो गया था, कि छिपकलियों से तो मुकाबला कर ही लेगी। एक दिन अचानक थी तो ऊपर ही झीने में पर भौंकना बन्द हो गया था…महारानीजी का चेहरा देखकर खूब हँसी आयी थी हमें। मुहँ सुजाकर उतरीं थीं मैडम नीचे…यूँ तो आते जाते हर इंसान या जानवर कोई भी हो…क़ानू का जोर-जोर से भौंकना बनता ही था। पर उस दिन तो जैसे मुहँ में ज़बान ही न थी,और एकदम चुप-चाप एक कोने में जाकर बैठ गई। हम सब हैरान परेशान हो गए थे ,कि” अरे! क्या बात हो गयी भई।”बच्चों के मुहँ से निकल गया था”लगता है मम्मी आपकी क़ानू-मानु छिपकलियों से पिटकर आयी है”। क्या बताएं बात सही लाग रही थी….क़ानू का सूजा हुआ चेहरा और मौन देखकर ऐसा लग रहा था मानो छिपकलियों से एक- आध थप्पड़ छट्ठू पड़ गया है…पर हमने बिल्कुल मज़ाक न बनाई और अपनी प्यारी सी गुड़िया रानी को गले से लगा कर समझा दिया था”देखो!क़ानू आप कितने छोटे हो,हर एक से पंगे नहीं लेते है ना।”मानो समझ गयी हो पर कहीं मन में ज़िद्द अब भी थी। खैर!शाम तक एकदम चुप थी क़ानू। शाम के बाद मुश्किल से मुहँ से आवाज़ निकली थी। “फीलिंग गुड”हमने क़ानू से पूछा था। और एक बार और सूजे हुए गाल पर एक प्यारी सी छोटी सी पप्पी दे डाली थी। पप्पी देते टाइम हमे कभी ऐसा न लगता था, कि हम किसी जानवर को चूम रहें हैं…सच!बताएँ बहुत ही स्नेह भरा सपर्श है मैरी क़ानू का। मन तो करता है कि सारे दिन गोद में बिठाकर बस!”अपने आप से चिपकाकर रखें । पर नटखट बाला मानती ही कहाँ है….थोड़ी सी देर गोद में बैठी प्यार करवाया और अपनी प्यारी सी गुलाबी सी जीभ से हमारे भी गाल को चाट लिया करती थी,और फिर गोद से उतरकर भाग जाती थी।”आफ्टर आल क़ानू इस अ बिजी पर्सनालिटी”। टाइम ही कहाँ है,”फोकट थोड़े ही है।” दुनिया भर के काम हैं , जैसे ….आने जाने वाले लोगों को दीवार पर चढ़कर भौंकना, चूहों और छिपकलियों की चेकिंग, तितलियाँ पकड़कर छेड़खानी करना और उन्हें छोड़ देना वगरैह-वगरैह।
हाँ!याद आया हमारे बाजू वाले लोगों ने अपने मकान की छत्त पर किराएदार रखने के लिऐ दो कमरे बनवाने शुरू किए थे… क्या बतायें मानो क़ानू के लिए एक नई फ़िल्म सी शुरू हो गई थी। जैसे ही उनके मजदूर काम करने आते थे,क़ानू झट्ट से कमरे से निकलकर ऑन ड्यूटी हो जाती थी…भोंक-भोंक कर उनका सर दर्द कर देती थी। जब भौंकते-भौंकते ज़्यादा थक जाती थी तो चुप-चाप बैठकर देखने लग जाती थी। क़ानू की सुबह से लेकर शाम तक की सख्त ड्यूटी हो गई थी। खींचकर अन्दर ले जाकर बन्द कर देते थे,क्योंकी आप तो जानते ही हैं, ऐसे अच्छा नहीं लगता …पडोस का मामला है। पर क्या करें सर्दी के दिन थे हम भी बाहर कुर्सियों पर बैठकर धूप का आनन्द लेते थे,तो क़ानू को भी वहीं खेल-कूद करना होता था…कीड़े और तितलियाँ जो कि फूलों के रस का आनंद लेने और अपना फूलों से भोजन करने आते थे..क़ानू उनकी भी सख़्त चेकिंग किया करती थी। मज़दूरों को काम करता देख पूरे दिन हल्ला करना क़ानू कि नई ड्यूटी बन गई थी।
मज़दूर भी क़ानू का सारे दिन का तमाशा देख हँस दिया करते थे, और बीच-बीच में क़ानू को भौंकता देखकर सीटी बजा दिया करते थे। युहीं चल रहा था सिलसिला। हालाँकि डरा धमका कर बीच में हम चुप भी करा दिया करते थे..और क़ानू खुद भी थककर गुड़िया की तरह चुप-चाप बैठकर उनको देखा करती थी।
एक दिन पड़ोसियों के जो दो कमरे बन रहे थे..उन्होंने उन दो कमरों की खिड़कियों पर काली पॉलिथीन की शीट लटका दी,ताकी सीमेंट या और मकान बनाने की सामग्री हमारी तरफ न आए। यह सारा नज़ारा देखकर क़ानू हैरान परेशान हो गई थी। आश्चर्य से बैठकर उस काली पॉलीथीन की शीट को देखने लगी…अपनी छोटी सी मुंडी और पेपर-कटिंग जैसे छोटे से कानों को हिला -हिलाकर बेहद परेशान लग रही थी। क़ानू को आज तो सामने कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था..हाँ!दिखाई तो नहीं दे रहा था पर उन मज़दूरों की आपसी बातचीत पूरी सुनाई दे रही थी। जब में बाहर धूप सेकने निकली तो क़ानू ने मेरी ओर देखा था, ऐसा लग रहा था जैसे कह रही हो”माँ! हमारा नया tv खराब हो गया है क्या?” आवाज़ तो आ रही है,पर पिक्चर तो दिख ही नही रही है।”यही शिकायत क़ानू ने अपनी प्यारी सहेली जिसे क़ानू अपने बराबर समझती थी, मेरी बिटिया गार्गी से भी कर डाली।वो पॉलिथीन शीट ऐसे ही लटकी रही और क़ानू भी ऐसे ही परेशान टहल रही थी। हालाँकि क़ानू के और काम साइड by साइड चलते रहते थे, पर यह काली पॉलिथीन शीट बेहद खटक रही थी क़ानू को।और क्यों न खटके मेरी बेटी का tv जो खराब हो गया था।
खैर!अपने tv ख़राब होने वाली शिकायत क़ानू ने दीदी से तो कर ही दी थी,फिर क्या था…गार्गी मेरी बिटिया कम शैतान न है….बराबर की शैतान है…क़ानू की तरह। प्लानिंग हो चुकी थी..गार्गी और क़ानू अँधेरा होने के बाद चुप-चाप छत्त पर निकले । मैने सोचा था कि “अरे!गार्गी के हाथ में बड़ा सा डंडा जिसमें सामने की तरफ रबर बैंड की मदद से चाकू बांद रखा था,इसके हाथ में क्या कर रहा है।” मुझे थोड़ा सा भी आभास न था होने वाली शैतानी का। हैरानी की बात यह है कि क़ानू-मानु ने अपना मुहँ एकदम बन्द कर अपनी दीदी के साथ दबे पाँव बाहर निकल आई थी…पूरा कोआपरेट कर रही थी क़ानू अपनी दीदी को। आखिर!tv ठीक हो रहा था भई क़ानू का..कितने दिनों से खराब पड़ा है,अच्छी बात नहीं है। मन भी नही लग रहा था क़ानू-मानु का। मैं यह सारा नज़ारा पीछे बाथरूम में खड़े होकर चुप-चाप देख रही थी,जिसका दोनों को ज़रा भी आभास न था। बस!गार्गी ने चाकू बंधा हुआ लम्बा डंडा उठाया ,धीरे और पूरी सावधानी से उस काली पॉलिथीन शीट पर चला दिया था।खच!और पॉलिथीन शीट बीच में से फट गई थी। अँधेरा होने के कारण मेरे अलावा किसी ने भी यह बात नोटिस नहीं की थी। खैर!मुझे इस शैतानी में साथ नहीं देना चाहिए था,बात गलत थी….पर क्या बतायूँ अपनी क़ानू का tv ठीक करने के लिए एक पल के मैं भी बच्चा बन गई थी। शीट बीच में से फट चुकी थी क़ानू और गार्गी बीच में से भाग आयीं थीं।
अगले दिन जब सवेरा हुआ तो पड़ोसियों ने ऊपर आकर वह फटी हुई शीट नोटिस की….उन्होंने किसी पर भी शक न करते हुए मज़दूरों से कहकर पॉलिथीन शीट हटवा दी..कोई भी कारण अपने आप समझ लिया होगा।चलो मेरी जान में जान आयी थी कि उन्होंने मेरे बच्चों पर शक नहीं किया। परमात्मा का शुक्र मनाया था मैंने। क़ानू के बाहर निकलने पर क़ानू रानी की खुशी का ठिकाना न था..मेरी गुड़िया का tv ठीक हो गया था। काली गोल-गोल आँखों में चमक आ गई थी और दिमाग़ ने फिर से नई शैतानियां प्लान कर ली थीं।मानो कह रही हो”thankew! दीदी मेरा tv एकदम ठीक हो गया है।”
क़ानू के साथ युहीं फिल्में बनाते देखते और दिखाते ज़िन्दगी चल रही थी हमारी क़ानू के साथ।