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युग पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !!

 

भोर का तारा 

उपन्यास अंश 

“प्रधान मंत्री बनने का सपना …, हाँ, …हाँ , ….यही सपना तो था …..जो मेरी आँखों में हर रोज लहक जाता था . हर रोज़ एक झुनझुने की तरह बज़-बज़ कर यह मुझे जगाता था ….सताता था ….सचेत करता था ….प्रोत्साहित करता था ….और फिर थकाता भी तो था ….बहुत-बहुत थकाता था …..!”

“तू ….? अरे …, तू  …! तेरी क्या औकात ….? तू ……तो ….!!” उल्हाने-ताने चलते ही आते . मुझे काटते-बांटते चले जाते. मेरा खून ही सुखा देते . “पिद्दी न पिद्दी का सोरबा ….!” एक शोर उठता मेरे ज़हन में. आंधी की तरह सन्नाता -मन्नाता  …! इसे रोकना  …टोकना …दुस्वार हो जाता. जहाँ मैं खड़ा था वहां से तो आसमान बहुत दूर था.

निराशा आती. मुझे समझाती कि मैं इस तरह के खतरनाक सपनों को तरजीह न दूं. मैं जो हूँ – उसी को स्वीकार लूं. छोटा हूँ तो क्या ….? संतोष पूर्वक गुजर-बसर करने में क्या कोई खोट है ? मेरी सोच सही नहीं है. आसमान को छूना – मात्र एक कल्पना है, सच्चाई नहीं है.

“पर मैं छोटा नहीं हूँ ….!” मुझे अपने सारे दिए उत्तर याद हैं. “छोटा कहाँ से हूँ ….?” मैं पूछ ही लेता. “मेरे पास …हाँ, हाँ , ….मेरे पास परमात्मा के दिए दो हाथ हैं ….विचारवान मेरा मन-प्राण …मुझे हर बार बुलाता है ….बार-बार समझाता है कि …तुम ….छोटे नहीं हो ….!” मैं हँसता. “…मेरी निराशा, मुझे डराती क्यों हो …?” मैं पूछता. “मैं डरता नहीं हूँ. मैं …..मैं ….” उत्तर तो थे मेरे पास – लेकिन तब जुबां पर आते-आते सहम जाते.

मैं ऑंखें खोल कर देखता. वास्तव में ही बहुत बड़े-बड़े लोग थे. मेरा कद-काठ तो उन के सामने कुछ भी नहीं था. लोग थे – जिन के पास बेसुमार धन था . लोग थे – जिन के पास हुनर था . लोग थे – जिन  के पास नाम था …सौहरत थी. और लोग थे – जिन के पास पावर थी  ….सत्ता थी. उन्हें ही सब झुक-झुक कर नमस्कार करते थे ….उन का ही  गुन-गान करते थे.

और न जाने कैसे-कैसे लोग थे ….जिन्हें मैं जानता तक न था …..!!

लेकिन मेरी जिज्ञासा – उन्हें जानने की जिद करती. मेरा मन बाघी हो कर उन के विगत में झांकने लगता था. मैं एक खोज में लगता – और देखता कि मैं उन बड़े-बड़े विद्वान, धनवान, मशहूर और शक्तिशाली लोगों के किस पासंग में आता था…?

“हो न , हल्के  ….?” मेरी निराशा हंसती. “फूल जैसे हो तुम, नरेन्द्र !” उपहास आता.

“तुम में  तो कोई वज़न ही नहीं है, मित्र !” हंसी के ठहाके उठते और …मुझे अधमरा कर देते.

“नेहरू जी  का जन्म ….उन की शिक्षा-दीक्षा …उन का परिवेश ….और उन का अनुभव …..तुम्हारे हाथ कैसे लग सकता है….? अपने पैरों की ज़मीन को देखो…! अपने परिवेश को भी परखो ! तुम्हारा  …….”

“मैं नहीं मानता …, भाग्य को …..!” मैं रूठ  जाता. “मैं नहीं स्वीकारता …..अपनी पराजय !” मैं द्रण स्वर में जोर से कहता. “अभी मेरा ….विकास होना है ….अभी तो मेरा …..भाग्य बनना है …अभी तो मेरे अवसर आने हैं …..और तुम कहते हो कि मैं पहले से ही जंग हार जाऊं ..? अभी मेरी उम्र कुल ६ साल की है, मित्रो ! अभी तो मैन ऑंखें ही खोली हैं. अभी तो …….”

“देख लो, अपने आस-पास को !” फिर से एक उल्हाना आता . “क्या है …..तुम लोगों के पास …..? गरीबी …..”

“नहीं,नहीं …..! गरीबी का तो नाम ही मत लो !” मैं चीख पड़ता था. “यह मात्र एक मानसिक बीमारी है.” मैं स्पस्ट कहता. “मन से तो मैं अमीर हूँ……धनवान हूँ …..बलवान हूँ ….उसी परमात्मा का बेटा हूँ …..जिस के नेहरू जी  हैं …..गाँधी जी हैं …..और राम-कृष्ण भी थे. मैं  कंगाल कहाँ से हूँ …?” मैं तन कर खड़ा हो जाता.

“बच्चे हो ……!” कोई हँसता . “नादान हो ….!!” वह कहता. “तुमने अभी  जंग देखी  कहाँ है ….?” वह उल्हाना मारता. “पसीने छूट जाते हैं , बच्चे ….जब ….तलवारें खनकती हैं ……!!”

क्रमशः – उन के जन्म दिन पर विशेष .

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