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खानदान 96

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रमेश ने सफ़ारी गाड़ी बेचने की पूरी प्लांनिंग कर ली थी.. और जगह -जगह अब बताने भी लगा था,” अरे! ये अपने पास गाड़ी है.. न सफ़ारी! ये बेचनी है।”

गाँव में भी जहाँ से रमेश ने यह सफ़ारी गाड़ी ख़रीदी थी.. यह ख़बर पहुँचा दी,” इस गाड़ी को बिकवा दे ने!.. इब कोनी चलाऊं!”।

रमेश यह सफ़ारी गाड़ी जो की तेरह लाख की थी.. कम से कम पाँच लाख में बेचने के चक्कर मे था.. क्योंकि रमेश इस गाड़ी को ख़रीद कर ही साढ़े-तीन या चार लाख में लेकर आया था। सफ़ारी गाड़ी और फुल्ली लोडेड सुनकर आदमी गाड़ी खरीदने को तो तैयार हो जाता था.. पर गाड़ी के ऑरिजनल पेपर्स तो थे ही नहीं, इसलिये वहीं पर बात बिगड़ जाती थी। जिन लोगों से रमेश ने यह गाड़ी ख़रीदी थी, वे लोग इस गाड़ी को रमेश से दो लाख तक में लेने को तैयार थे.. पर रमेश किसी भी कीमत पर गाड़ी को चार लाख से नीचे निकालने को ही तैयार नहीं था.. रमेश अपना बिसनेस माइंड चला रहा था.. हर कीमत पर मुनाफा ही चाहता था।

“ आप इस गाड़ी को जितने में वे लोग कह रहे हैं.. निकाल दो! नहीं तो इसे कोई और नहीं खरीदेगा!”।

“ अपना दिमाग़ अपने पास ही रख! सब निकलेगी.. गाड़ी के पेपर्स मैं दूसरे बनवा लूँगा! दिमाग़ है.. मेरे अंदर!”।

सुनीता चाह रही थी, कि रमेश यह सफ़ारी गाड़ी उन्हीं लोगों को बेच कर छुट्टी करे… जिनसे वो इसे ख़रीद कर लाया था. क्योंकि सुनीता को गाड़ी का सच पता था। पर रमेश रंजना की अक्ल के हिसाब से चल रहा था.. और सिर्फ अपने मुनाफ़े को लेकर ही सोच रहा था।

बहुत कोशिश के बावजूद भी गाड़ी का सौदा कहीं भी तय नहीं हुआ था, पर जैसे-तैसे करके गाँव के वे लोग जिन्होंने रमेश को बेवकूफ़ बना कर गाड़ी बेची थी.. आख़िरकार ढाई लाख में गाड़ी खरीदने को तैयार हो गए थे। वे सिर्फ इतना ही चाहते थे, कि रमेश गाड़ी को ख़ुद गाँव तक छोड़कर आ जाए.. यह शर्त भी रमेश ने मानने से इनकार करते हुए, कहा था,” अरे! मैं गाड़ी छोड़ने आऊँगा, तो यहाँ बच्चे कौन देखेगा!”।

अब यह बच्चों वाली बात कुछ हज़म नहीं हुई थी, यह बात रमेश की सुनीता खड़े होकर सुन रही थी, और उसे भी हैरानी हुई थी, पर फ़ालतू की बहस न हो.. इसलिये चुप ही रहना ठीक समझा था। इस गाड़ी को बेचने के लिये रंजना से सलाह करके रोज़ ही रमेश फोन पर लगा रहता था.. बस! गाड़ी के कागज़ नहीं हैं.. इतनी सी बात रमेश की अक्ल में नही बैठ रही थी।

गाड़ी को बेचने के नाटक के चलते एक और नाटक खड़ा हो गया था.. फैक्ट्री में रमेश जब यह सफ़ारी गाड़ी निकाल रहा था.. तो गाड़ी को पीछे लेते वक्त किसी दूसरी गाड़ी में टक्कर हो गई थी.. गाड़ी वाले का नुकसान ज़्यादा होने के कारण रमेश के संग कुछ कहा-सुनी भी हुई, पर रमेश ने मामले को ठंडा न करते हुए, इस गाड़ी की टक्कर वाले मामले को थाने में पहुँचा दिया था। बात विनीत के कानों में भी पड़ गई थी।

“ दस लाख माँगे सें!”।

जिसका सुनीता को शक था, वो ही हो गया.. करवा ही बैठा, रमेश सफ़ारी का तमाशा! सफ़ारी गाड़ी का क्या हुआ.. और कौन से नाटक में जा फँसा था.. सफ़ारी का मसला.. आप भी हमारे संग इस मामले में शामिल होने के लिये जुड़े रहिये खानदान के अगले भाग के साथ। और हाँ! कैसी लग रही है, आपको हमारी कहानी.. खानदान.. और इसके किरदार। अपनी राय हमें लिखकर ज़रूर भेजें।