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खानदान 91

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“ संपत्ति के बारे में कोई बात नहीं करेगा!”।

दर्शनाजी ने रामलालजी के जाने के बाद अगले दिन अपनी जायदाद को लेकर कहा था.. कि गाँव की ज़मीन को लेकर अभी कोई भी बातचीत नहीं होगी। फ़िर रामलालजी की याद में थोड़े आँसू भी बहाए थे.. जिनका कोई भी मोल नहीं लग रहा था।” मैथी का आधा पराँठा खा की न निकला था.. बोले था.. आधा आन की न खा लूँगा!”।

दर्शनाजी ने रोते-रोते रामलालजी के बारे में कहा था, कि वो जब डॉक्टर के पास इंजेक्शन लगवाने जा रहे थे.. तो केवल आधा ही मैथी का पराँठा खा कर गए थे.. कह गए थे, आधा आकर खा लूँगा! पर लौटे ही नहीं! अब दर्शनाजी आँसू तो बेहिसाब बहाए जा रहीं थीं.. पर उन आँसुओं के पीछे कितना दिखावा छुपा है..  यह तो घर का हरेक सदस्य जानता था।

“ कर ! मेरा फ़ैसला!!”।

रमा इस बात की चश्मदीद गवाह थी, कि रामलालजी के जाने से एक रात पहले जिसमें की वो एकदम सीरियस हालात में थे.. दर्शनाजी ने उनके कमरे के बुरी तरह से बार-बार दरवाज़े को पीटते हुए, कहा था.. कर! मेरा फ़ैसला!!

यह बात दर्शनाजी ने कई बार बुरी तरह से दोहराई थी.. इस तमाशे में वे अकेली नहीं थीं.. रमेश भी उन्हीं के साथ खड़ा था.. रमेश ने एकबार भी अपनी माँ की इस बदतमीज़ी को रोकने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं कि थी.. और रमेश दर्शनाजी को रोकता भी क्यों, हो सकता था.. कि रामलालजी दर्शनाजी के हंगामे से डरकर उन्हें मालकिन घोषित कर ही देते.. और फ़िर माँ के लाड़ले सुपुत्र का तो पहला हिस्सा होता ही।बीमार पिता और पतिदेव की कोई कीमत नहीं थी.. लालच जोर मार रहा था।

रमा ने यह बात सासू-माँ को ज़ोर-ज़ोर से पति की याद में क्रंदन करता देख.. सुनीता को बताई थी। रमा भी कोई ऐसी वैसी खिलाड़ी नहीं थी.. रामलालजी के परिवार में चल रहे, खेल की एकदम पक्की गोट थी.. तभी तो दर्शनाजी की हर चाल को मात देते हुए.. विनीत के साथ रामलाल नामक पेड़ पर घोंसला बनाने में कामयाब हो गयी थी। और रमा अक्सर दर्शनाजी के लिये कहा भी करती थी,” तू डाल-डाल तो मैं पात-पात!”।

पर सुनीता का इस पेड़ पर घोंसला नहीं बना था.. कोशिश तो बहुत करी थी.. सुनीता ने नाटकों के बावजूद, हर बार नए सिरे से तिनका रखकर कि शायद नीड़ का निर्माण हो ही जाए.. पर इस पेड़ पर रहने वाले अन्य पक्षी बदमाश क़िस्म के थे.. हर बार घोंसला बनता देख.. ऐसा तिनका फेंक देते थे.. कि घोंसला बनते-बनते फ़िर टूट कर रह जाता था। और सुनीता हताश होकर रह जाती थी।

“ मैं भी ब्रत राखूंगी!!”।

वाह! रामलालजी की तेरहवीं से पहले एक और घर में नाटक विनीत और दर्शनाजी ने व्रत रखने का किया था.. जिसमें रात को भी व्रत का ही भोजन करना था। देखा! जीते-जी तो पतिदेव को पत्नीजी ने जमकर जूतों की माला पहनाई और फ़िर यह करवाचौथ से भी कठिन व्रत! अब जबकि वो इस दुनिया में नहीं रहे.. इसी को तो पाखंड कहते हैं.. और आजकल तो दुनिया सलाम भी पाखंडियों को ही करती है। खैर! दर्शनाजी जैसी राजनीतिज और पाखंडी महिला मिलनी मुश्किल थी.. उड़ा दिया पति को गद्दी के लिये.. और अब सबसे ज़्यादा और सबसे बेह्तरीन अफ़सोस करने का ढोंग कर रहीं थीं। यह व्रत दर्शनाजी और विनीत दोनों ने ही रखा था.. और दोनों को ही रामलालजी के जाने की सबसे ज़्यादा ख़ुशी भी थी।

“ तू ईबे बटवारा कर!”।

“ तूं राख तो ठंडी हो जाण दे!”।

रमेश अब पिता की तेरहवीं से पहले ही माँ के पीछे बटवारे को लेकर शुरू हो गया था। क्योंकी भई! अब रंजना को भी फैक्ट्री के आधे मालिक के साथ घर बसाने की जल्दी थी..  लेकिन माँ तो रमेश की उस्तादों की उस्ताद थी.. साफ़ मना कर दिया था.. कि अभी पिता को गए हुए, थोड़ा सा भी वक्त नहीं हुआ है.. और बटवारे का राग पहले ही अलापना शुरू हो गया है।

खैर! पंडितजी से पूछकर रामलालजी की तेरहवीं की तिथि तय कर दी गई थी। सुनीता ने मुकेशजी को पहले ही ख़बर कर दी थी,” पिताजी! बाबूजी नहीं रहे!”

रामलालजी जैसे उद्योगपति की तेरहवीं पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने न जाने कितनों की भीड़ लगी होगी.. कृपया आप भी सभी रामलालजी की तेरहवीं की पूजा में हमारे साथ अगले खानदान में शामिल होकर अपने श्रद्धा सुमन हमारी कहानी के वरिष्ठ किरदार को अर्पित कीजिये।