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खानदान 88

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ऑटो वाला घर के दरवाज़े पर आ गया था। पर कमाल की बात तो यह थी, कि श्रीमतीजी अपने काम में व्यस्त थीं.. उन्हें यह पता ही नहीं चला.. कि उनके पतिदेव जो पहले से ही बीमार चल रहे हैं.. कहीं जाने की तैयारी में हैं। सुनीता देखती ही रह गई थी.. कि ससुरजी को कोई रोकने वाला ही घर में से निकल कर नहीं आया था, और न ही बीमार व्यक्ति को किसी ने भी पूछा था.. सुनने में तो आता है.. कि जिसकी जेब ख़ाली होती है… उसको कोई नहीं पूछता! पर रामलालजी तो एक नहीं दो-दो फैक्ट्री के मालिक थे, और अभी तो उन्होंने अपनी वसीयत भी नहीं बनाई थी.. तो इस हिसाब से तो उनके पीछे दौड़ पड़ना चाहिए था.. आख़िर मालिक आदमी जो थे.. पर अफ़सोस..!!  रामलालजी संपत्ति के मालिक होते हुए भी.. उनके पीछे दौड़ने का किसी को भी किसी तरह का लालच नहीं था।

खैर! उस ऑटो में बैठकर रामलालजी रवाना हो गए थे.. लेकिन घर में वैसा का वैसा सन्नाटा था.. शाम होने को आई थी..” अरे! वो तो भोपाल पहुँच गया! अस्पताल में भर्ती हो गया, अपने आप!”

विनीत ने शाम को फैक्ट्री से आते ही हल्ला मचाया था। “ अच्छा! तो भोपाल जा था! देखिये बताया तो कोनी!”।

आदत अनुसार दर्शनाजी को नाटक तो करना ही था, और पता उन्हें सब था.. कि रामलालजी भोपाल अकेले ऑटो में बैठकर क्यों गए हैं। रामलालजी भोपाल पहुँचकर अच्छे नामी प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हो गए थे।” मैं दो-दो फैक्टरियों का मालिक हूँ!”।

यह बात रामलालजी ने पूरे अस्पताल में गा दी थी। डॉक्टरों को  रामलालजी का परिचय सुन बेहद ख़ुशी महसूस हुई थी.. क्योंकि वे जानते थे, बूढ़ा और कमज़ोर शरीर है.. होना-जाना कुछ भी नहीं है.. पर बिल अच्छा बनेगा, बाबाजी आमदनी का जरिया अच्छा साबित हो रहे थे.. उस प्राइवेट अस्पताल के लिये।

इधर इंदौर में दोनों बेटों को और पत्नीजी को अच्छी तरह से भोपाल और अस्पताल का पता था.. जहाँ पिताश्री एडमिट थे.. पर घर में पैसा और सारी सुविधाओं के बावजूद भी किसी परिन्दे ने अपने पिता के पास पर नहीं मारा था।

वृद्ध इंसान सब कुछ होते हुए भी अस्पताल में लाचार और अकेला था.. शर्म और अफ़सोस दोनों की ही बात थी। पर क्या कर सकते थे..परिवार में रिश्तों के तार संस्कारों और प्यार से नहीं.. नोटों से जुड़े हुए थे।

सुनीता तो देख कर ही हैरान थी, कि बाबूजी की इतनी बुरी हालात है.. वो वहाँ अस्पताल में अकेले हैं.. और यहाँ सासू माँ नए-नए कपड़े पहन कर घूम रहीं थीं। जिस घर में बेटों को ही पिता से लेना-देना नहीं था..  वहाँ बहुएं क्या कर सकतीं थीं। “ कैसी हालत है! बाबूजी की वहाँ भोपाल में!”।

सुनीता ने रमेश से एक दिन पूछा था। रमेश ने सुनीता के जवाब में तुरंत ही रामलालजी को फोन लगाकर सुनीता की बात करवा दी थी।” हम एकदम फिट होकर वापिस आएँगे! तुम देखना!”।

रामलालजी ने सुनीता को जवाब में कहा था। रामलालजी की आवाज़ तो फ़ोन पर ठीक ही लग रही थी.. तो चलो! सुनीता और रमेश को तसल्ली हो गई थी। पर रमेश को अपने पिताजी से फ़ोन पर बात न करके मिल कर आना चाहये था.. पर भई! रमेश भी अपनी तरह का बिसनेस मैन जो था.. जानता था.. पैसे तो माँ ही निकलवा सकती है.. इसलिये मुनाफ़े को देखते हुए, रमेश बाबू तो सही या ग़लत माँ की ही चमचागीरी में वयस्त थे।

“ ये वहाँ सब्ज़ी मार्किट में ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे, ऐसा लग रहा था, मानो मुझे ही उल्टा-सीधा बोल रहें हों! पता ही नहीं बाबूजी को क्या हो गया था, बार-बार इनको फ़ोन लगा रहे थे.. पर कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे”।

रमा ने सब्ज़ी मार्किट से आकर बताया.. कि रामलालजी का लगातार विनीत के पास फ़ोन आ रहा था.. वे फ़ोन पर क्या बोलना चाह रहे थे.. कुछ भी पता नहीं लग रहा था, विनीत फोन पर रामलालजी की बात को न समझते हुए.. सब्ज़ी मार्किट में ही ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे हुए थे।

“ पिताजी! बाबूजी नहीं रहे..!!!”।

क्या बात हो गई थी.. रामलालजी के साथ.. क्यों फ़ोन पर विनीत के संग बातचीत के दौरान उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी.. डॉक्टरों की रिपोर्ट के हिसाब से तो रामलालजी ठीक हो रहे थे.. फ़िर अचानक से क्या..??? पढ़ना न भूलें खानदान।