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खानदान 84

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पैर में कट लगाने के बाद रमेश को आपरेशन का टाइम अगले दिन का मिल गया था.. और सुनीता रोज़ के समय से शाम को घर आ गई थी। रमेश के साथ इतना सब-कुछ हो रहा था.. पर सुनीता ने एकबार भी इस बात की अपने मायके ख़बर नहीं की थी.. अब इसका भी कारण रमेश ही था। एक बार रमेश ने सुनीता के आगे साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था,” मैने रंजना से कह दिया है, कि दिल्ली का रिश्ता हमारे बाप की वजह से ज़बर्दस्ती हुआ है.. अपने को समझ नहीं आए वो लोग!”।

अब रमेश बाबू किसी को इज़ज़्ज-विज़्ज़त देनी तो सीखे ही नहीं थे.. जो इंसान अपने पिता को पिताजी न कहकर बाप कह कर बात कर रहा था, उसका क्या..!!

और हाँ! माँ-बेटों की आपसी बातचीत भी कुछ इसी तरह की थी..

“ रमेश! बच्चों की माँ तो याये राएगी!”।

दर्शनाजी ने रमेश से सुनीता के लिये कहा था।

“ मन्ने संभालन वाली भी तो कोई होनी चाहये!”

रमेश को रंजना बेहद पसंद थी, ज़मीन जायदाद वाली भी थी.. रमेश के ऊपर पैसा-धेला भी अच्छा ख़र्च कर देती थी..  रंजना के साथ रमेश का रोज़ का खाना-पीना और मस्ती बढ़िया चल रही थी, रमेश के पास भी फ़िलहाल रंजना के ऊपर पैसा फेंकने का इंतज़ाम था। रमेश का इरादा रंजना के साथ पूरी तरह से शादी करने का हो गया था.. और रंजना भी रमेश से सहमत थी.. भई! ऐसा- वैसा थोड़े ही था.. रमेश! फैक्ट्री का आधा मालिक था.. और अपनी पत्नी को पसन्द न करके रंजना का ही दीवाना था। रमेश इस वक्त पूरी तरह से बिज़नेस मैन साबित हो रहा था.. मुनाफ़े की जगह हाथ मारना रमेश और रामलालजी के परिवार की फ़ितरत जो थी।

उधर दूसरी तरफ़ मुकेशजी का वक्त पलट गया था..  लालची रमेश को दिल्ली से टुकड़ा मिलने की कोई भी उम्मीद नहीं थी, रमेश की नियत में ब्याह के वक्त से ही खोट था.. अपनी माँ के साथ पहले दिन से ही मिला हुआ था रमेश।

सुनीता मायके की तरफ़ से भी परेशान रहती थी।” दिल्ली से ज़बर्दस्ती रिश्ता” यह शब्द सुनीता को रास नहीं आए थे, इसलिये सुनीता ने रमेश की हालत को लेकर अपने परिवार में चर्चा करना ठीक नहीं समझा था.. और फ़िर रमेश तो पूरी तरह ही रंजना के घर का दामाद बन बैठा था.. जगह-जगह बताता फिरता था,” मेरे नए रिश्तेदार हैं!”।

सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, सुनीता ने अपने परिवार को रमेश की हालत के बारे में बताना ठीक नहीं समझा था.. और रामलालजी के परिवार को मुकेशजी से कोई ख़ास लेना-देना भी नहीं था.. पारिवारिक संस्कार जो नहीं थे।

रंजना से यारी करने के बाद जब रमेश एक बार सुनीता को लेने दिल्ली गया था..  तो बिना कुछ सोचे समझे ही रंजना को फ़ोन लगा कर मुकेशजी से कहने लगा था,” आप बात कर लीजिये एक बार! उसे अच्छा लगेगा.. बाप नहीं है.. उसका! आपकी आवाज़ सुनकर ख़ुश हो जाएगी! बच्चे जैसी है.. वो!”।

अब शब्दों का चयन तो रमेश का ऐसा ही था.. खैर मुकेशजी ने ज़्यादा कुछ न कहकर केवल इतना ही कहा था,” मुझे माफ़ कीजियेगा.. वो जो कोई भो हो! पर मैं बात नहीं करूँगा!”।

सभी बातों को मध्य- नज़र रखते हुए.. सुनीता ने अपने मायके रमेश का ज़िक्र नहीं किया था.. और तो और रमेश के उसके परिवार के प्रति रवये को देखते हुए.. और अपने लिये एक अजनबी होने का अहसास! सारी परिस्थितियों ने  सुनीता को रमेश से कहने पर मजबूर कर दिया था,” आप कभी दिल्ली मत जाना! अपनी नई रिश्तेदारी निभाओ!”।

“ कौन जा रहा है! अपने को अब उनसे कोई रिश्ता रखना भी नहीं है!”।

रमेश के शब्द थे।

पर कमाल की बात तो यह थी.. कि रंजना और उसकी माँ- बहनों का कहीं पता ही नहीं था.. रमेश के पैर की बुरी हालात की पहले दिन से सुनीता ही चिंता कर रही थी.. रमेश के नए रिश्तेदारों की कोई खोज ख़बर ही नहीं थी.. न ही

कोई अभी तक अस्पताल में ही झाँका था। सुबह से शाम तक विनीत और सुनीता ही दौड़ रहे थे।

सब कहने वाली बातें हुआ करती हैं.. धर्मपत्नी की जगह और कोई स्त्री नहीं ले सकती।

अगले दिन रमेश को O.T में ले जाना था.. सुनीता सुबह समय से अस्पताल पहुँच गई थी। डॉक्टरों ने रमेश को O.T में शिफट कर दिया था, विनीत अभी वहाँ पहुँचा ही नहीं था.. सुनीता ने घर पर फ़ोन लगाया था,” रमेश को O.T में ले गए हैं.. आपके आने में कितनी देर है!”।

“ मैं अपने ख़ातिर नो स्टार के जूते लाया हूँ!”।

अरे! रमेश की मम्मीजी कहीं नज़र क्यों नहीं आ रहीं हैं.. आयेंगी!  आयेंगी! वो भी आती ही होंगीं। रमेश की मम्मीजी के अस्पताल में नज़ारे देखने के लिये ज़रूर पढ़िये.. खानदान।