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खानदान 78

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रामलालजी की तबियत दिन-रोज़ ख़राब होती जा रही थी। पेट की बीमारी ने उन्हें घेर लिया था.. आए दिन वे किसी न किसी डॉक्टर के पास खड़े ही रहते थे। ज़्यादातर डॉक्टर के पास रामलालजी को विनीत ही ले जाता था। “ तूं पानी ज़्यादा पीया कर!”

दर्शनाजी रामलालजी को सारे दिन ज़्यादा पानी पीने की हिदायत देतीं रहतीं थीं। “ पानी कोनी पिन्दा, इसलिये तो मरे है!”।

रामलालजी कम पानी पीने के कारण सारा दिन पत्नी का भाषण सुनते रहते थे। उनका पेट फूला रहता था। कई तरह के देसी इलाज भी करवाये थे.. पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ था। एक बार तो रामलालजी की खिड़की के पीछे किसी मूर्ख पंडित के कहने में आकर गड्ढा भी खुदवा दिया था.. कि इससे वे जल्दी ही ठीक हो जायेंगे। पंडितों की बातों में तो खैर! पूरा परिवार आ जाता था। विनीत भी किसी पंडित के पास हर रविवार को जाया करता था। “ बहुत लंबी लाइन रहे से पंडित धोरे!”।

विनीत घर में आकर बताता रहता था.. कि पंडित के पास बहुत लंबी लाइन लगी रहती है। बहुत काम की बात बताता है.. पंडित। वास्तुशास्त्र भी जानता है.. विनीत अक्सर ही पंडित के तारीफों के पुल बाँधता रहता था। हर इतवार को नियम से विनीत का पंडित के पास जाना बन गया था। फैक्ट्री को लेकर भी विनीत पंडित से ही सलाह मशवरा किया करता था। फैक्ट्री में कहाँ दफ़्तर होना है… और किस दिशा में क्या होने से क्या हो जाएगा.. यह सब विनीत पंडित से पूछ कर रामलालजी के अपने हिसाब से ही कान भरता रहता था। रमेश का कारोबार में कोई भी किसी भी तरह का दखल नहीं था.. रमेश अपनी माँ के साथ अलग ही दफ़्तर चला रहा था। पूरा विश्वास था.. रमेश को, कि माँ उसे आसमान की ऊँचाई तक पहुँचा ही देगी.. नहीं जानता था.. कि मइया ने ग़ुब्बारे में हवा भर रखी है.. जो समय आने पर सुई की नोक से निकल जायेगी.. और रमेश मुहँ के बल ज़मीन पर आ गिरेगा। सुनीता को इसी बात की चिंता थी.. कि आख़िर बार-बार चिल्लाने पर भी यह समझता क्यों नहीं है। पर विधि का विधान अटल था.. परमात्मा रमेश को अपने हिसाब से अक्ल देना चाहते थे.. सुनीता के हिसाब से नहीं। और वैसे भी सुनीता को भी अपने कर्म भोगने ही थे।

रामलालजी तबियत ख़राब होने के बावजूद फैक्ट्री जाए बगैर नहीं मानते थे। और पत्नी जी रामलालजी को घर में आराम नहीं करने देतीं थीं.. दर्शनाजी को रामलालजी की तबीयत से ज़्यादा फैक्ट्री के हिसाब-किताब की चिंता थी। अब मंशा भी तो यही थी.. कि या तो पति परमेश्वर जल्दी ठीक हो जाए.. या फ़िर ठिकाने लगे.. ताकि सत्ता पर राज़ उनका हो।

रामलालजी खैर! ख़ुद भी कम नहीं थे.. मोह माया छूट ही नहीं रही थी.. उनसे। शाम को फैक्ट्री से आकर थोड़ा-बहुत सामान भी ले आते थे। एक बार ऐसे ही ज़बर्दस्ती सामन लेने बाहर गए.. और मार्केट में ही कहीं अँधेरे में गड्ढे में गिर गए थे.. जिससे उनका पैर ख़राब हो गया था। और पैर में चोट लगने के बाद से रामलालजी का गाड़ी चलाना भी बन्द हो गया था.. वॉकर लेकर चलने लगे थे। रामलालजी की तबियत इतनी ज़्यादा ख़राब हो जाया करती थी.. कि उन्हें इंजेक्शन देने डॉक्टर को घर पर बुलाना पड़ता था। “ यो मटर खाते ही घोड़ा बन गया!”।

दर्शनाजी ने इंजेक्शन देते वक्त डॉक्टर को समझाया था.. कि रामलालजी मटर के चावल खाते ही मार्केट में गिर पड़े थे.. और उनका पैर ख़राब हो गया था। दर्शनाजी के उस बात को पेश करने का लहज़ा कुछ इस तरह का था.. कि डॉक्टर का हँसते-हँसते पेट ही फट गया था।

“ तूं सब-कुछ बेच की ने अमरीका चला जा.. और ठीक होकर वापिस आना!”।

आईडिया बहुत ही अच्छा था.. करोड़पति पार्टी तो थे ही.. रामलालजी! चले जाते.. अमरीका!

निकले की नहीं.. रामलालजी अमरीका के लिये.. आख़िर कारोबार भी तो संभालना था.. जानने के लिये पढ़ते रहिये.. खानदान।