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खानदान 45

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दर्शनाजी सुबह-सुबह अपने प्रवचनों के साथ शुरू हो गईं थीं। जो कोई भी घटना घट जाया करती थी.. उसकी दिमाग़ में पूरी रिकॉर्डिंग कर घटित घटना को कर्म से लेकर उस पर सारे दिन अपनी बिना सिर-पैर की बक़वास जारी रखतीं थीं.. जब तक कि कोई नया मसला हत्थे नहीं चढ़ जाया करता था। इस वक़्त दिल्ली से आया फ़ोन दर्शनाजी के लिये नई और ताज़ा घटना थी.. सुबह सब्ज़ी काटते वक़्त इस घटना पर दर्शनाजी द्वारा सुन्दर शब्दों के तीर चलाए जा रहे थे.. और सुनीता से कोई भी जवाब देते नहीं बन रहा था.. जवाब देती भी कैसे, अभी सुनीता खेल में कच्ची थी.. सही ढँग से दाव- पेच सीखी ही कहाँ थी। और रामलालजी के परिवार में सभी अपने-अपने अंदाज़ के खिलाड़ी थे। खैर! एक दो दिन बाद बात आई-गई हो गई थी.. और ज़िन्दगी फ़िर दोबारा से पुराने तरीके से चल पड़ी थी। हाँ! दिल्ली से आए फ़ोन के बाद एक बात ज़रूर सुनने को मिली थी..” देख्या या बिल्ली जम कर मज़े ले रही थी.. इसका थोबड़ा जमा खिले हुआ था.. बक़वास करे थी.. देख्या फ़ोन पर कर दिया न सीधा!”।

यह शब्द दर्शनाजी और रमेश दोनों के रमा को लेकर थे.. जो यह कहना चाह रहे थे.. कि देखा! दिल्ली वालों ने कैसे माँ-बेटे को फ़ोन पर ही सीधा कर दिया था.. मज़ा आ गया। अब कुछ भी कहो!.. रमा के संग इस घर में सभी प्रकार के पहले ही नाटक हो चुके थे.. कमज़ोर परिवार से थी.. कोई बोलने वाला न था, इसीलिये जब देवर और सासू-माँ ने फ़ोन पर बढ़िया श्लोक सुने थे.. तो रमा का मन खुशी से भर गया था.. मानो उस की ख़ुद की भड़ास निकल गई हो।

“ ओ! देख!.. कितने बढ़िया भेड़िये आ रे सें!”।

रामलालजी ने टेलीविज़न पर वाइल्ड लाइफ कार्यक्रम देखते हुए दर्शनाजी को आवाज़ लगाई थी।

“ दाँत न काड़े… बडे-बडे.. तूं किसी भेड़िये से कम से के “।

दर्शनाजी ने रामलालजी को उनके बड़े-बड़े दाँत निकालकर हँसने से मना करते हुए, उन्हें भेड़िया भी बता दिया था। आसपास बैठे टेलीविजन देख रहे सभी परिवार के सदस्यों की हँसी छूट गई थी। यह कोई नई बात नहीं है.. हरियाणे में पति-पत्नी के बीच इस तरह के जुमले आम बात है। दर्शनाजी और रामलालजी में ऐसे जुमले आम ही हुआ करते थे.. वैसे नाटकों का भंडार होते हुए भी रामलालजी का परिवार इस तरह के जुमलों के कारण हँसी और ठहाकों का भी खज़ाना हुआ करता था। कभी-कभी परिवार में माहौल हँसी का भी हुआ करता था.. ऐसी बात नहीं है.. पर पल-भर में वो हँसी न जाने कब नाटक और भयंकर बदतमीज़ी का रूप ले लिया करती थी.. पता ही नहीं चलता था। अच्छे-ख़ासे कमाते-खाते परिवार के ऊपर पता ही नहीं कौन सी काली छाया मंडरा रही थी.. जो इस परिवार के ऊपर ग्रहण थी।

सेतू का क़िस्सा ख़ुद ब ख़ुद ही समाप्त हो गया था। पता ही नहीं ये रमेश की प्यार मुहब्बत की दास्ताँ पर से एकदम ही कैसे पर्दा गिर गया था। अब घर में ये सेतू चर्चा का विषय नहीं थी। कुछ भी हो रामलालजी के परिवार में एक ख़ास बात तो थी.. जो भी घटना घटित हो जाया करती थी.. उसका हर क़िस्सा ही यह परिवार दफ़न कर दिया करता था.. बस! एक दर्शनाजी को छोड़ कर जिनका टेप कभी-कभी किसी भी पुरानी घटना पर अटक कर बजने लग जाया करता था।

“ मने एक बाई की ज़रूरत से!.. तू उस छोरी सेतू ने ले आ.. घर के काम कर दिया करेगी”।

दर्शनाजी ने रमेश से सेतू को बाई का काम करवाने के लिये कहा था। और सेतू की कहानी पर से पर्दा हमेशा के लिये गिर गया था। आख़िर ये किस्सा यूँ आसानी से ख़त्म होने का क्या कारण था.. दिल्ली वालों की धमकी से परिवार डर गया था.. या फ़िर इस परिवार की डॉन दर्शनाजी ने इस रास-लीला को हरी झंडी नहीं दिखाई थी। रमेश को देखते हुए दूसरी बात ही सच लग रही थी.. आख़िर अपनी माँ का पिछलग्गू जो था.. जो मम्मी कहेंगी, वो ही तो बच्चा करेगा।

रमेश और सुनीता फ़िर एक साथ थे.. प्रहलाद अब बड़ा हो गया था.. और उसका अब छोटे स्कूल में दाखिला भी करवा दिया गया था।

सिक्का उछला था.. और वक्त पलट गया था.. सुनीता ने सपने में लौकी और अंगूर एक ही बेल पर लगे देखे थे। किसका सिक्का उछला था, और बाज़ी पलटी थी.. लौकी और अंगूर एकसाथ किस बात का संकेत थे।