Posted on

खानदान 37

indian wedding

फैक्ट्री का कबाड़ा बेच-बेच कर रमेश के पास अब पैसे आना शुरू हो गए थे.. इन पैसों से रमेश अब प्रहलाद और अपना छोटा-मोटा ख़र्चा चला रहा था। रमेश के पास लगभग  कितने पैसे आते हैं.. यह जानकारी सुनीता को छोड़कर सारे घर को थी.. कारोबार जो था.. उनका। इन पैसों से सुनीता और रमेश की ज़िंदगी तो आगे न चल रही थी.. पर हाँ!  उड़ाना-खाना अच्छा चल रहा था। सुनीता ने रमेश से एक बार भी, या फ़िर कभी-भी साथ में बैठकर पति-पत्नी की तरह से घर बसाने की प्लानिंग नहीं की थी। रमेश का तो अपने माँ-बाप के घर को छोड़कर कोई भविष्य को लेकर प्लानिंग थी ही नहीं.. और सुनीता अपने माँ-बापू की सीख पर ही डटी हुई थी, “ कुछ भी हो झण्डा अपने हाथ में मत लेना”।

झण्डा अपने हाथ में लेने से मतलब मुकेशजी और अनिताजी का अलग होने से था। इसलिये सुनीता तो बिना अपना दिमाग़ दाएँ-बाएँ लगाए परिवार के हिसाब से ही चल रही थी। इधर रमा थोड़ा आगे खिसकने की कोशिश करती.. तो उसकी गोटी दर्शनाजी काटने के लिये तैयार बैठीं थीं। रमा और सुनीता आपस में बातें करतीं हैं.. अभी यही दर्शनाजी का ताज़ा नारा था.. इस घर में.. और यह काम करती है, यह बिल्कुल भी काम को हाथ न लगाती है.. वही महिलाओं वाली घिसी-पिटी राजनीति चल रही थी. सासू-माँ की। कभी रमा बहुत काम करने वाली बहु हो जाया करती थी, तो कभी सुनीता। यूँहीं दिन निकल रहे थे, और प्रहलाद टीना और मीना संग बड़ा हो रहा था।

रमेश माँ की छत्र-छाया में पूरी तरह से पहले से भी ज़्यादा आ गया था.. विवाह के पश्चात सुनीता की कोई छाप रमेश पर दिखाई नहीं देती थी। दर्शनाजी पति-पत्नी नाम की गाड़ी के नीचे मौका पा कर घुस गईं थीं.. और रमेश नाम के पहिये को अपनी तरह के पेच-कस लगाकर खोलने में वयस्त हो गईं थीं। सुनीता और रमेश की सोच का ताल-मेल बिल्कुल भी न बैठ पा रहा था। रमेश तो पूरे दिन एक ही नारा लगाये रखता था” इसकी हमारे लिये दो कौड़ी की औकात है, इससे बिल्कुल भी बात नहीं करनी”।

यह शब्द रमेश के मुहँ से रमा के लिये निकला करते थे.. जो वो चीख-चीख कर सुनीता से कहता रहता था। सुनीता अलग विचारों की लड़की होने के कारण रमेश को सही-गलत समझाना चाहती थी..  पर रमेश की अक्ल पर माँ की सिखाई हुई सीख और संपत्ति के नाम के अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे.. सही और गलत में फ़र्क समझना ही नहीं चाहता था, या फ़िर समझ ही नहीं रहा था.. आँख पर पट्टी बाँध कर आगे बढ़ता ही जा रहा था।

सुनीता न तो कोई गेम खेल रही थी, न ही उसको रमेश पहले दिन से सही समझ में आया था, और न ही सुनीता की नज़र परिवार की संपत्ति पर ही टिकी थी। पूरी तरह से खोई हुई सुनीता का फायदा अब दर्शनाजी ने बखूबी उठा लिया था।

सुनीता अलग तरह से खोई रहती थी.. रमेश अपना अलग ही माँ के द्वारा रामलालजी से दिलाए हुए पैसों पर अपना दिल खोल कर मस्ती भरे दिनों का आनन्द ले रहा था.. हालाँकि कोई ऐब न था.. रमेश में.. पर फ़िर भी ख़र्चे का कोई हिसाब-किताब न था, और बात-बात पर कहता भी रहता था,” हम कोई भूखे-नंगे हैं, क्या!”।

सुनीता और रमेश के रिश्ते के बीच की दरार में अब दर्शनाजी ने एक नई गोटी रमेश को पट्टी पढ़ाकर फिट करवा दी थी.. जिसके बारे में वे बखूबी जानती थीं।

कुछ दिनों से सुनीता रमेश के बर्ताव में कुछ नयापन देख रही थी.. रमेश शाम के ठीक पाँच बजे घर से बन-ठन कर निकलने लगा था। सुनीता ने इस बात पर भी कभी गौर न किया था.. और न ही कभी कोई सवाल ही रमेश से किया था। रमेश की बातों और बर्ताव से भी सुनीता को कुछ अलग न लगता था।

करवा-चौथ का त्यौहार आ रहा था.. सुनीता को भी रमेश के लिये व्रत रखना था.. “ मेहँदी लगवानी है! क्या!.. वो मेहँदी बहुत सुन्दर लगाती है”।

रमेश ने किसी मेहँदी वाली का जिक्र सुनीता से करते हुए कहा था।

“ हाँ! ठीक है! ले आना!.. लगवा कर देख लूँगी”।

सुनीता ने रमेश को उस मेहँदी वाली को लाने के लिये कह दिया था।

अगले दिन करवा-चौथ था..  शाम को ही रमेशं मेहँदी वाली ले आया था। रमेश,सुनीता और मेहँदी वाली एक ही कमरे में थे” बहुत सीधी-साधी है, मेहँदी लगानी भी बहुत अच्छी जानती है”। रमेश ने मेहँदी वाली के लिये सुनीता से कहा था।

सुनीता ने बात को ज़्यादा ख़ास महत्व न देते हुए हाथों में लग रही मेहँदी पर अपना ध्यान जमाए रखा था.. मेहँदी लगाते वक्त, मेहँदी वाली जिस अंदाज़ से रमेश की ओर देख रही थी.. उस अदा को सुनीता ने नोट कर लिया था.. पर अभी कुछ न कहा था।

प्रहलाद अब थोड़ा सा बड़ा हो गया था.. प्रहलाद को पास के छोटे प्ले स्कूल में डाल दिया गया था.. रामलालजी का कहना था,” बैठना सीख जायेगा, और रोटी खा कर घर आ जाया करेगा”।

था, तो प्रहलाद का छोटा स्कूल पर इस प्ले स्कूल में ज़्यादातर फैक्ट्री वालों के बच्चे ही पढ़ते थे। इसलिये एक दिन घर में स्कूल की तरफ़ से प्रहलाद के लिये क्रेडिट कार्ड की एक स्कीम आयी थी.. जिसमें लिखा था.. कि फलाँ इनकम के ऊपर वालों को यह क्रेडिट कार्ड दिया जायेगा। रमेश और दर्शनाजी वहीं खड़े थे.. माँ की आँख का हाँ! में इशारा पा रमेश ने वह क्रेडिट कार्ड ले लिया था।

क्रेडिट कार्ड और मेहँदी वाली ने रमेश जैसे फैक्ट्री के हिस्सेदार पर और भी चार चाँद लगा दिये थे। माँ ने बेटे की हसरतों के गुब्बारे में अब क्रेडिट कार्ड और मेहँदी वाली के पम्प से हवा भर आकाश में लम्बी उड़ान भरने के लिये ऊपर छोड़ दिया था।

रमेश का दिमाग़ अब सातवें आसमान में था.. क्या सुनीता रमेश की इस खोखली उड़ान को रोकने में कामयाब होगी.. या फ़िर गुब्बारा इतनी ऊँची उड़ान भरेगा कि सुनीता को गर्दन ऊपर कर गुब्बारे को देख पाना भी मुश्किल हो जायेगा।