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खानदान 32

indian wedding

अपने दूसरे नम्बर के देवर की बात सुनकर दर्शनाजी ने उसको पलट कर जवाब न देते हुए बस! दादी के अफ़सोस में रोना शुरू कर दिया था। कहना तो न चाहते हैं, पर हरियाणा प्रदेश की ख़ासकर गाँवो में इतनी बुरी संस्कृति है.. कि अगर कोई बहु पलट कर बोल जाय, तो उसका पीट-पीट कर बुरा हाल कर दिया जाता है.. और तो और बहुओं को पीटकर हरियाणे के पुरुष अपने आप को बेहद बहादुर और पहलवान समझने लगते हैं। इस संस्कृति को स्वयं महिलाओं ने ही बढ़ावा दिया हुआ है, हरियाणे में.. पुरुषों से बिना मतलब पीटने की बजाय अगर सब मिलकर किसी एक पहलवान को पीट देतीं या फ़िर कोई कानूनी कार्यवाही ही कर देतीं तो इस पुरुषों द्वारा किये गए इस घटिया और गिरे हुए आचरण का वहीं पर खात्मा हो सकता था। सही दिशा में कदम उठाने के लिये बहुत बड़ी हिम्मत चाहये होती है, जो अभी हमारे समाज की महिलाओं में आनी बाकी है.. महिलाओं को जागरूक होने में अभी समय लगेगा.. लेकिन जिस दिन हमारे समाज का महिला वर्ग जागरूक हो गया.. उस दिन हिंदुस्तान का नक्शा बदल जायेगा।

खैर! दर्शनाजी अब अपने मेहमानों को संग लिये रोने का नाटक करते हुए अन्दर घर में दाख़िल हो गयीं थीं.. जहाँ पर दादी के अँतिम पूजा-पाठ का कार्यक्रम चल रहा था। दादी ने जब अपनी आख़िरी साँस ली थी. तो प्रहलाद के आने के बाद वह सोने की सीढ़ी चढ़ चुकीं थीं.. यह सौभाग्य बहुत ही कम लोगों को नसीब होता है। क़िस्मत की धनी और कर्म प्रधान तो खैर! थीं ही दादी! जो उन्होनें ज़िन्दगी की रेलगाड़ी में इतने बरस सफ़र तय किया, और लगभग आख़िरी स्टेशन आने पर ही गाड़ी में से उतरीं।

सोने की सीढ़ी चढ़ने की खुशी में अन्दर घर में दादी के नाम के लड्डू बंट रहे थे, और ढ़ोलक बजा कर दादी को अँतिम विदाई दी जा रही थी। मुकेशजी तो विनीत के साथ पुरुषों में शामिल हो गए थे.. और दर्शनाजी अनिताजी को लिये महिलाओं में ही विराजमान हो गईं थीं। महिलाओं के गुट में गाँव की औरतों के साथ-साथ दर्शनाजी के खुद के भी यानी के ससुराल वाले रिश्ते शामिल थे। अनिताजी का परिचय अब सबसे करवाते हुए दर्शनाजी अब बातों में व्यस्त हो गयीं थीं.. तभी अचानक से अनिताजी की नज़र एक महिला पर पड़ी थी.. जो हूबहू रामलालजी से मिलती-जुलती थी। और इक्तिफाक से वही महिला खुद ब खुद दर्शनाजी और अनिताजी के आगे आकर खड़ी हो गई थी,” आपको जी पहचाना नहीं, आप कौन!”।

महिला ने अनिताजी की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा था। “ अरे! यो रमेश की सास से! दिल्ली ते म्हारे गेल आरी से, दादी ख़ातिर!”।

दर्शनाजी ने महिला को समझाते हुए कहा था.. ये रमेश की सास हैं, और दादी की वजह से दिल्ली से आईं हैं।

“ माफ़ कीजियेगा, आप कौन!”।

अनिताजी ने महिला से सवाल किया था।

” अरे! यो रमेश की बुआ.. एक ए तो से! पहचाना कोनी!”।

दर्शनाजी ने पास में खड़े होने के कारण जवाब दिया था.. ये रमेश की इकलौती बुआ हैं।

“ हाँ! सोच! तो मैं भी यही रही थी, रामलाल भाईसाहब से शक्ल जो मिल रही है.. वैसे आप तो कुछ भी कहिये बिल्कुल ही रामलालजी जैसी हैं”। अनिताजी ने रमेश की बुआजी के परिचय होने के बाद उनसे कहा था।

“ नाम की ही बहन हूँ, बाकी कुछ भी कोनी”। बुआजी ने अनिताजी को दर्शनाजी की तरफ़ इशारा करते हुए बताया था..

केवल नाम मात्र की ही रामलालजी की बहन लगती हूँ, बाकी लेना-देना कुछ भी नहीं है, मुझसे। “ रहन दे! बस! फ़ालतू बक़वास करे है!”।

दर्शनाजी ने बुआजी को वहीं चुप करते हुए कहा था, फ़ालतू बक़वास कर रही है, ये।

“ अच्छाजी चालूं, ना ते आड़े ही झगड़ा हो जागा”।

बुआ ये कहते हुए, कि मैं यहाँ से निकलती हूँ, नहीं तो यहीं पर ननद-भाभी की जंग छिड़ जायेगी… कहकर वहाँ से चलीं गईं थीं। जाते वक्त अनिताजी को देखकर एक प्यारी सी मुस्कान ज़रूर तोहफ़े में देकर गईं, जो उन्हें हमेशा के लिये याद रह गई थी। अनिताजी कि समझ मे दर्शनाजी के संबंध अपने देवर और ननद के साथ किस तरह के हैं, समझ में आ रहे थे। अपनी सम्बधी के रिश्तों की गहराई को समझते हुए, अब अनिताजी दर्शनाजी और महिलाओं के संग आगे बढ़ीं थीं, जहाँ पर लड्डू बंट रहे थे। पुरुषों को अलग जगह लड्डू बाटें जा रहे थे, और महिलाओं को अलग।

दादी का समारोह लगभग शाम तक चला था.. और उनके सोने की चिड़िया बनने की खुशी में उनके बेटों ने ज़ोरदार दावत के साथ-साथ पूरे गाँव व रिश्तेदारों में खूब सारे लड्डू भी बांटे थे। अनिताजी और मुकेशजी भी दादी का प्रसाद यानी गाँव से लड्डू लेकर अब विनीत और दर्शनाजी के साथ दिल्ली लौट आये थे.. दर्शनाजी और विनीत इस बार बार-बार मुकेशजी के आग्रह करने के बाद भी दिल्ली न रुककर सीधे इंदौर को ही निकल गए थे।

दादी का प्रसाद लिये घर की मालकिन दर्शनाजी अब इंदौर में अपने सुपुत्र विनीत सहित दाख़िल हुईं थीं। घर के माहौल को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि मालकिन की गैरहाज़िरी में परिवार ने थोड़ी बहुत तो दीवाली मना ही डाली है, जिसमें खीर खाने के हिस्सेदार रामलालजी भी थे। वैसे कुछ भी कहिये एक अनपढ़ गँवार औरत जिसमें दो आने का सलीका न था.. पूरे घर पर काबू कर रखा था, पर कैसे!.. न तो फैक्ट्री की मालकिन ही थीं, न ही कोई और काम-धंधा ही चला रहीं थीं.. पर पूरा दिमाग़ अपना दर्शनाजी ने मैन गोटी यानी के रामलालजी पर काबू पा, और गोटियों को पूरा अपने हिसाब से कंट्रोल कर रखा था। इस दिन तो दर्शनाजी हरियाणे से आने के बाद थक गईं थीं, इसीलिये बिना किसी की क्लास लिये कि उनके पीछे से किस प्रकार का लोगों ने त्यौहार मनाया था.. अपने दिमाग़ को और शरीर दोनों को आराम देने में ही दिन बिताया था। दिल्ली से सुपर-फास्ट एक्सप्रेस उन दिनों रात भर का सफ़र तय करने के बाद सवेरे ही इंदौर लग जाया करती थी। तो सुबह से लेकर शाम तक का विश्राम काफी हुआ करता था… दर्शनाजी के लिये.. आख़िर हरियाणे की हट्टी-कट्टी जाटनी जो थी। शाम के चाय-नाश्ते के बाद अब मैडम का दिमाग़ पूरी तरह से रिफ्रेश हो चुका था.. और नज़र हर शख्स से लेकर घर के हर कोने में घूमते हुए सुनीता पर आकर टिक गई थी.. और सुनीता को देखकर मुकेशजी के कहे हुए शब्द जो उन्होंने गाड़ी में बैठकर दिल्ली स्टेशन पर कहे थे.. फ़िर से सारी रिकॉर्डिंग दिमाग़ में घूम गई थी। हालाँकि दर्शनाजी को भूलने की बीमारी बिल्कुल भी न थी। उस वक्त सुनीता को कुछ भी न बोलीं थीं, सासु-माँ। क्योंकि उनकी बिना सिर पैर की बक़वास शुरू होने का समय सवेरे का ही हुआ करता था।

अगले दिन सवेरे से ही सासु-माँ के प्रवचन शुरू हो गए थे। दर्शनाजी की ये ख़ास और पुरानी आदत थी, कि कोई भी बात उनसे उनके परिवार से या फ़िर उनको छूती हुई उनके रिश्तेदारों की ही क्यों न हो… दिमाग़ में दर्ज हुई बातों पर सवेरे से प्रवचन शुरू हो शाम तक चला करता था। आज तो नम्बर बेचारी भोली चिड़िया हर नई चाल से बेख़बर सुनीता का लग गया था। “ हमनें कोई ज़रूरत ना है, या बतान की, कि के करणा है, के नहीं करना से, हम आप देख ल्यांगे, ओ! कौन हुए हमनें कहन वाले कि हरिद्वार चलते हैं.. हमारे लोगों में यो न होया करदा”।

यहाँ पर दर्शनाजी का सीधा-सपाट निशाना मुकेशजी की तरफ़ था.. हालाँकि उन्होंने तो यूँहीं दर्शनाजी से साधारण सी और एक आम बात कही थी, पर महिला का दिमाग़ केवल और सिर्फ़ केवल पैसे के ही इर्द-गिर्द घुमा करता था। रिश्ते-नातों से कहीं ज़्यादा अहमियत इस औरत के दिमाग़ में कौड़ी की ही थी। अब तो उस बात का दर्शनाजी ने भूत ही बना डाला था.. सुनीता जान चुकी थी, कि ज़रूर पिताजी के ही मुहँ से कुछ निकल गया होगा.. पर पिताजी की कही हुई बात की किस प्रकार से वकालत करते हुए, उनकी बात को काटना है.. इस चाल को चलने में अभी कच्ची सुनीता चुप-चाप खड़ी रही, हालाँकि पिताजी के लिये हो रही बक़वास पर सुनीता को सासु-माँ पर बेहद ग़ुस्सा आ रहा था.. दर्शनाजी का बात करने का लहज़ा भी बहुत ही बदतमीज़ी भरा और गँवारों वाला था। सुनीता के मन के अन्दर यही चल रहा था,” मन कर रहा है, इस बुढ़िया का मुहँ तोड़ डालूँ”।

“ ख़बरदार! जो कारोबार के बारे में कोई बोल्या! मेरे ते बुरा कोई न होगा, ये ले बता दी”।

दर्शनाजी का बात करने का अंदाज़ बेहद धमकी भरा था.. कि उनके कारोबार के विषय में कोई भी न बोलेगा, नहीं तो भगवान जाने क्या कर डालेंगी।

एक गँवार और मूर्ख औरत की हिम्म्त की तो दाद देनी पड़ेगी.. जिसको चाहे जो भी बोलने की हिम्मत रखती थी। आख़िर इस बेवकूफ़ और निहायती बदतमीज़ औरत को परिवार ने कौन से लालच के तहत सिर पर बिठा रखा था। अकेला इंसान कुछ भी नहीं कर सकता.. सारा परिवार एक ही माला के धागे में था.. एक सुनीता ही ऐसा मोती बचा था,  अभी जो अलग रखा हुआ था।

चित भी मेरी और पट भी मेरी, अंट। मेरे बाप की .. वाली राजनीति लिये… अब कौन सी दिशा में और कौन सा कदम उठाएंगी दर्शनाजी।